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मसूरी

दून-मसूरी का सौंदर्य तो लुट चुका,बदसूरती से ही बचा लें

The Corner View

चेतन गुरुंग  

उत्तराखंड राज्य तो बन गया। हो गया एकदम उल्टा। पहाड़ का विकास तो क्या होना था, विनाश जैसा हो गया। जिस पहाड़ को लोग साफ हवा और सुकून के लिए पसंद करते थे। छुट्टियों में वहाँ वक्त गुज़ारना पसंद करते थे। ट्रेकिंग पर जाते थे, वह आज बरबादी के कगार पर दिख रहा है। पलायन तो रुका नहीं, शहर की गंदगी वहाँ पहुँच चुकी है। बीयर और शराब के खाली बोतलें जहां-तहां फेंकी दिख जाती हैं। सरकार का ज़ोर भी पहाड़ में अधिक से अधिक शराब बिकवाना-उसको प्रोत्साहन देना दिखता है। पहाड़ लोगों की मौज और तफरीह की जगह बन के रह गया है। मैं एक वीडियो देख रहा था। केदारनाथ धाम परिसर में कुछ महिला और पुरुष नगाड़े की थाप पर भांगड़ा कर रहे। ये आस्था का सिर्फ मज़ाक है। आप तीर्थ में दर्शन के लिए भक्ति भाव से आए हैं या फिर तफरीह के लिए। सिर्फ पर्यटन के लिहाज से। यात्रा सीजन में चार धाम यात्रा करने आए और पर्यटन के मकसद से आए लोगों की गाड़ियाँ घंटों लंबे जाम में पहाड़ों में फंस रहीं। होटल और दुकानदार मनमाने दामों पर कमरे और सामान बेच रहे। स्थानीय प्रशासन के लिए हालात को संभाल पाना मुमकिन नहीं दिख रहा।

पहाड़ को करीब से देखने और समझने वाले ये सब देख के अब कह रहे हैं कि बहुत हो गया। पहाड़ की ब्रांडिंग अब और जरूरी नहीं। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि नैनीताल, मसूरी और चार धाम यात्रा को ले कर सरकार खूब प्रचार-प्रसार तो कर रही। इस पर कतई ध्यान नहीं दे रही कि जो लोग यहाँ इस प्रचार जाल में फंस कर या फिर धार्मिक भावनाओं से भर के आ रहे हैं, उनकी यात्रा को आखिर कैसे सुखद और सुगम बनाया जाए। पहाड़ ही क्यों, सभी मैदानी शहरों का हाल देखें। ढाई-तीन दशक पहले के देहरादून और आज के इसी शहर को तुलनात्मक तौर पर देखें तो सोचने को मजबूर हो जाता हूँ कि इस शानदार और खूबसूरत शहर को आखिर हो क्या गया है। क्यों ये बदरंग और प्रदूषण का मारा हो गया है। सैन्य छावनी और ओल्ड राजपुर वाला इलाका छोड़ दिया जाए तो देहरादून शहर ही नहीं इसके बाहरी इलाके भी बुरी तरह शहरीकरण की भेंट चढ़ गया दिखता है।

अपने वक्त के धाकड़ आईएएस अफसर विजेंद्र पॉल ने मुझे हाल ही में कहा-सरकार को कुछ करना चाहिए। मसूरी डायवर्जन से मसूरी तक का रास्ता अब ऐसा हो गया है, मानो गाजियाबाद-दिल्ली रोड। ये अतिश्योक्ति हो सकती है। फिर भी विचारोत्तेजक है। पॉल का ईशारा ये है कि इस मार्ग पर कभी हरे जंगल, ताजी-साफ हवा और खुला पन था। वहाँ आज ऊंची ईमारतें और बंगले, मकान,रेस्तरां के साथ ही जबर्दस्त ट्रैफिक दिखता है। अब इस मार्ग पर बेफिक्र हो कर न पैदल चल सकते। न ही गाड़ी चला सकते हैं। तूफानी रफ्तार से गाड़ियों का रेला लगातार चलता है। अभी भी वक्त है। सरकार और उसकी कथित एजेंसी एमडीडीए को इस इलाके की खूबसूरती और पर्यावरण को बचाए रखने के लिए ठोस-ईमानदार कोशिश करनी चाहिए। यहाँ धड़ल्ले से हो रही प्लॉटिंग तथा लोगों की पसंद का इलाका हो जाने के कारण जमीन माफिया की चाँदी कट रही। जो जमीन कभी कौड़ियों के भाव नहीं बिका करती थीं, वह आज करोड़ों के भाव जा रही। निर्माण पर रोक लगा के ही इस ईलाके के बिगड़ रहे स्वरूप को और विकृत होने से बचाया जा सकता है।

दून शहर में उत्तराखंड गठन से पहले बहुत कम गाड़ियाँ दिखा करती थीं। सड़कों की चौड़ाई बहुत कम थी। फ्लाई ओवर थे नहीं। फिर भी यातायात कोई समस्या नहीं थी। नजारा ये है अब कि शहर में चार पहिया तो दूर दो पहिया वाहन चलना बहुत मुश्किल हो गया है। चकराता रोड और राजपुर रोड को तो पार कर पाना पैदल चलने वालों के लिए चुनौती बन चुका है। खूबसूरत और लीची-आम-अमरूद के बाग-बागीचे उजड़ चुके हैं। डालनवाला को बाग-बागीचों और वसंत विहार को खुले इलाके के कारण जाना-पसंद किया जाता था। दोनों जगह से दोनों खासियत गायब हो चुकी हैं। सरकार की लापरवाही से ज्यादा भ्रष्टाचार और सियासत से जुड़े लोगों और नौकरशाह-माफिया की दुरभिसंधि इसके लिए जिम्मेदार है। जिस दिलाराम चौक से राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और तमाम मंत्री, नौकरशाह आए दिन गुजरते हैं, वहाँ कभी मोड़ पर पूर्व मंत्री मोहम्मद असलम खान का बंगला था। जो लीची के घने बागीचे में बहुत खूबसूरत लगता था। मैं कई बार उनके घर गया भी। अब वहाँ शॉपिंग कॉम्प्लेक्स है। न उद्यान, न वन महकमे को और न ही एमडीडीए को कुछ दिखा।

शहर ही नहीं आसपास के गांवों में भी ज़मीनों की कीमत इतनी बढ़ गई हैं कि लोग बिल्डर्स को बेच के मोटा माल कमा रहे हैं। मशहूर अंग्रेजी लेखक रस्किन बॉन्ड और मरहूम अभिनेता टॉम आल्टर के किस्से-कहानियों में अपनी खूबसूरती के कारण जिक्र पाने वाला दून शहर ऊंची ईमारतों से बदरंग हो गया है। बॉन्ड मसूरी रहते हैं। मेरे दोस्त टॉम मसूरी-ओल्ड राजपुर रहे। भले अभिनय के सिलसिले में उनको मुंबई ज्यादा रहना पड़ा। दून घाटी में शहरीकरण ने ऐसा दामन फैला लिया है कि दिल्ली,मुंबई, बंगलौर, कोलकाता से आने वालों को लगता है मानो वे अपने ही शहर में फिर आ गए हैं। हरिद्वार, उधमसिंह नगर और नैनीताल-हल्द्वानी सरीखे मैदानी शहरों का हाल भी जुदा नहीं है। फिक्र की बात ये है कि सरकार के पास इस समस्या का हल तलाशने का कोई ब्ल्यू प्रिंट दिखता भी नहीं है। जहां तक गंभीरता के साथ सोचने और सरोकार रखने वालों की राय का सवाल है, वे देहरादून और बाकी मैदानी शहरों के साथ ही मसूरी-नैनीताल पर मानव दबाव को दूर करने को खास जरूरत मानते हैं। मसूरी-नैनीताल अब इस हैसियत में हैं ही नहीं कि पर्यटन सीजन में अधिक पर्यटकों के बोझ को सह सके।

ये कहना आसान तो लगता है कि सरकार साल भर के पर्यटन को प्रोत्साहित करे, लेकिन जब छुट्टियाँ ही न हो तो आखिर पर्यटक आएंगे कैसे। फिर पहाड़ी ईलाकों का रुख मैदानी जिलों में भीषण और जानलेवा गर्मी के कारण किया जाता है। इसलिए सर्दियों या बरसात के दिनों में पर्यटकों के आने की उम्मीद करना अनुचित ही होगा।  इससे बेहतर उपाय ये होगा कि सरकार नए पहाड़ी पर्यटन केन्द्रों को विकसित करें। उत्तराखंड कुदरती खूबसूरती से भरा हुआ है। कई मामलों में यूरोप के कई पर्यटक केन्द्रों को नैसर्गिक सौन्दर्य के मामले में चुनौती देता है। उनको अगर पर्यटन के नक्शे पर तरीके से लाया जाए तो बेहतर होगा। ये भूलना नहीं चाहिए कि मसूरी और नैनीताल की स्थापना और विकास ब्रिटिश राज में हुआ। देश की आजादी के बाद कोई नया हिल स्टेशन विकसित नहीं हुआ है।

टिहरी और उत्तरकाशी के पर्यटन स्थल विकसित और प्रोत्साहित किए जाने की दरकार है। सरकार ये सब न जाने कब करेगी, लेकिन इस बीच नैनीताल में स्थित हाई कोर्ट को कहीं और स्थापित कर लोगों को राहत देने के लिए खुद उच्च न्यायालय ने शानदार और अनुकरणीय पहल की है। नैनीताल में उच्च न्यायालय के कारण भी काफी बोझ रहता है। चाहे वह होटलों के कमरों की कीमत हो या फिर परिवहन तथा यातायात दबाव का। ये राय रखने वालों की कोई कमी नहीं है कि उच्च न्यायालय को अगर नैनीताल से बाहर निकाला जाए तो सभी के लिए अच्छा होगा। अगर इसको रुद्रपुर की तरफ या फिर काशीपुर-जसपुर की तरफ ले जाया जाए तो न सिर्फ वे इलाके विकसित होंगे बल्कि लोगों को जो दिक्कतों का सामना उच्च न्यायालय से मुताल्लिक कार्यों के कारण नैनीताल में करना पड़ता है, वह भी कम हो जाएगा। काशीपुर-जसपुर वे इलाके हैं, जहां अभी भी न सिर्फ जमीन पर्याप्त रूप से उपलब्ध हैं, बल्कि कुमाऊँ और गढ़वाल के साथ ही देहरादून-हरिद्वार के लोगों के लिए भी कहीं करीब और सुविधाजनक है।

गैरसैण को गर्मियों की राजधानी के तौर पर विकसित करने की सरकार की कोशिश भले महज दिखावा हो लेकिन हकीकत ये भी है कि राजधानी के तौर पर जो दबाव देहरादून नहीं झेल पा रहा है, वह गैरसैण सह लेगा, ये सोचना ज्यादती होगी। ये छोटा सा पहाड़ी शहर पर्याप्त पानी, बेहतर परिवहन और संचार कनेक्टिविटी, आवास और बेहतर स्कूल-चिकित्सा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं से कहीं दूर है। फिर जो सड़कें चार धाम यात्रा और पर्यटन के कारण अभी घंटों और कई किमी लंबे जाम से बदनाम हैं, वे बारिश के दिनों में भूस्खलन के खतरों से भी घिरी रहेंगीं। आए साल भीषण आपदा किस कदर लोगों की जान और संपत्ति को लील रही, सभी को पता है। इस साल भी बारिश और आपदा ने पहाड़ में तबाही मचा डाली है। सरकार को इन सभी पहलुओं पर गौर कर समस्याओं को दूर करने पर काम करना चाहिए।

1 comment

Raj September 1, 2019 at 2:35 am

Very good story. It all on government to save masoorie because I saws on photograph of 1980 it was clear and clean but now day’s worse condition there.

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