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देहरादून DEO की कुर्सी पर सस्पेंडेड-शराब कांड वाले भी दांव मारने के फेर में

उत्तराखंड

खास लॉबी अपनों को अहम जिलों में फिट करने की कोशिश में

मुख्यमंत्री शराब महकमे की सफाई अभियान में जुटे हैं  

मास्टर माइंड संयुक्त आयुक्त पर बिजली गिरती है या बचते हैं

खास लॉबी की साजिश से सरकारी खजाने को अरबों का घाटा

चेतन गुरुंग

शराब महकमे में जबर्दस्त फेरबदल की आहट से सबसे अधिक बेचैन असिस्टेंट कमिश्नर (जो जिलों में DEO बनते हैं) हैं। जो अहम जिलों में हैं, वे कुर्सी बचाने में और जो महत्वहीन पोस्टिंग्स पर हैं, वे देहरादून या फिर अन्य तीन अहम जिलों (हरिद्वार, उधमसिंह नगर और नैनीताल) के लिए अभी से पासे फेंकने और बाज़ियाँ चलने में जुट गए हैं। देहरादून से ले के दिल्ली तक दौड़-धूप की जा रही है। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की प्रतिष्ठा दबाव और सिफ़ारिशों के जाल में न फँसने की है। देखना दिलचस्प रहेगा कि वह शराब महकमे के सुरूर से वाकई खुद को कितनी खूबसूरती से बचा पाएंगे।

तमाम घोटालों और अनियमितताओं से नाराज मुख्यमंत्री देहरादून समेत तकरीबन सभी अहम जिलों के डीईओ को जमीन दिखाना चाहते हैं। ऐसा उनके करीबी और नौकरशाह बता रहे हैं। आज आयुक्त सुशील कुमार से होते हुए प्रमुख सचिव आनंदबर्द्धन के जरिये फेरबदल की फ़ाइल उपलब्ध असिस्टेंट कमिश्नरों के नामों के साथ मुख्यमंत्री तक पहुँच गई। त्रिवेन्द्र आबकारी महकमे के मंत्री भी हैं। जिस तरह देहरादून और हरिद्वार, उधम सिंह नगर, नैनीताल, पौड़ी में फर्जी बैंक गारंटी और सिक्योरिटी घोटाला सामने आया, राजस्व दबाए बैठने वालों को दुकान इस साल भी फिर सौंप दी गई, उसकी खबर मुख्यमंत्री तक बाखूबी पहुँच चुकी है।

मुख्यमंत्री उस्ताद समझे जाने वाले डीईओ के लिए सख्त मिजाज हेड मास्टर साबित हो सकते हैं। महकमे की जांच रिपोर्ट में बुरी तरह घिरने वाले देहरादून के डीईओ मनोज उपाध्याय के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की गई है। उन्होंने दुकानों को एक किस्म से लुटवा डाला था। पिछले साल ऐसे ही मामलों में वह सस्पेंड हुए थे। उनके खिलाफ जिलाधिकारी सी रविशंकर ने भी सख्त कदम उठाते हुए हफ्ते भर में जवाब तलब किया है। सूत्रों के मुताबिक एक संयुक्त आयुक्त (जिसकी महकमे में तूती बोलती है, और सभी प्रमुख जिलों में उसके ही विश्वासपात्र डीईओ हैं), गोटियाँ खेलने में व्यस्त हो चुके हैं।

उसकी कोशिश है कि अपनी लॉबी के डीईओ अगर हट जाते हैं तो उसकी ही लॉबी के अन्य डीईओ उनकी जगह आ जाए। महकमे में सालों से उसकी ही लॉबी का दबदबा है। इसके चलते सरकार को पिछले साल अरबों की राजस्व क्षति का सामना करना पड़ा। इस साल भी एक हजार करोड़ का नुकसान तय दिख रहा है। सरकार के पास महकमे में असंदिग्ध काबिलियत वाले अफसरों की किल्लत बहुत ज्यादा है। उधम सिंह नगर के डीईओ आलोक साह पर पिछले साल ही दुकान शिफ्ट कर देने और मामला हाई कोर्ट तक जाने के आरोप हैं। जिलाधिकारी नीरज खैरवाल इस मामले में उनसे खफा रहे थे।

हरिद्वार के डीईओ रहने के दौरान दो बार सस्पेंड हो चुके प्रशान्त कुमार देहरादून के डीईओ बनने की जुगत में बताए जाते हैं। लॉबी और महकमे का मास्टर माइंड संयुक्त आयुक्त उपाध्याय के हटने की सूरत में उनको लाने की सोच रहे हैं। यहाँ न हो सके तो फिर हरिद्वार में फिट करने की कोशिशें चल रही। ऐसा सूत्र बता रहे हैं। प्रशांत का रेकॉर्ड ऐसा है कि देहरादून तो छोड़ो शायद ही किसी छोटे जिले के डीईओ बन सके। वह पिछले साल फर्जी बैंक गारंटी और दुकानों को मिट्टी के भाव उठवा डालने के कारण सस्पेंड किए गए थे। वह हाई कोर्ट से स्टे ला के जमे हुए थे। इस साल हरिद्वार में जहरीली शराब पी के सौ से ज्यादा लोग उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में मारे गए थे। तब प्रशांत दूसरी बार सस्पेंड कर देहरादून मुख्यालय बिठा दिए गए।

अभी हरिद्वार जहरीली शराब मौत मामले की जांच चल ही रही है। पूर्व मुख्य सचिव नृप सिंह नपल्च्याल घटना की जांच कर रहे हैं। अल्मोड़ा के डीईओ दुर्गेश्वर त्रिपाठी भी तराई में डीईओ बनना चाहते हैं। उन पर भी नैनीताल का डीईओ रहने के दौरान छह करोड़ का गोलमाल सरकारी खजाने में करने का आरोप है। उनको इसके बावजूद अल्मोड़ा का डीईओ बनाया जाना ही कम हैरत भरा नहीं है। नैनीताल के डीईओ राजीव चौहान और पौड़ी के डीईओ तपन पांडे भी खास लॉबी से जुड़े हैं। जब सारी लड़ाई हारती देखेंगे तो लॉबी की आखिरी कोशिश इन दोनों को तीनों तराई जिलों में बतौर डीईओ फिट कराने की होगी। तपन ने उपायुक्त पर प्रमोशन छोड़ दिया था। फिर भी उनको मलाईदार कुर्सी दी गई। कोई अफसर क्यों कर प्रमोशन छोड़ेगा? लॉबी अहम कुर्सियों पर कब्जे के लिए इस कदर दौड़-धूप कर रही है कि अब वे दफ्तर में भी कम ही नजर आ रहे हैं।

इस बीच ये सुझाव भी उठ कर सामने आ रहे हैं कि मुख्यमंत्री जब तक मास्टर माइंड संयुक्त आयुक्त को काबू में नहीं करते हैं, तब तक उनके विश्वासपात्र खेल खेलते रहेंगे। इस संयुक्त आयुक्त के पास लायसेंसिग का काम तो है ही, सरकार लगातार उसकी बनाई पॉलिसी पर आँख मूँद के भरोसा करती रही है। एवज में उसने सरकारी खजाने को अरबों का चूने पर चूना लगाया है। त्रिवेन्द्र उसके इंद्रजाल या मायाजाल में फँस गए या नहीं, ये तबादला सूची से जाहिर हो जाएगा। खास बात ये है कि जिलों में और मुख्यालय में कई योग्य असिस्टेंट कमिश्नर सालों से बेकार बैठे मक्खियाँ मार रहे हैं। वे माई बाप न होने का खामियाजा भुगत रहे हैं।

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