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उत्तराखंड

पकड़ी गई शराब पर पुलिस-आबकारी में ठनने की नौबत

मालिक की चुप्पी से पहाड़ों में तस्करी का अंदेशा

35 पेटी शराब कम पाए जाने को ले के पुलिस पर सवाल

आबकारी आयुक्त सुशील ने तलब की रिपोर्ट

पुलिस गुड वर्क साबित करने में जुटी

Chetan Gurung

रायवाला से पहले नेपाली फार्म के करीब पकड़ी गई शराब को ले कर पुलिस और आबकारी महकमे में ठनने के आसार दिख रहे हैं। पुलिस ने 3 दिन पहले शराब की पेटियों से भरे ट्रक को पकड़ के अवैध होने का दावा किया था। आबकारी महकमे के अफसर दबे स्वर इसको रायवाला ठेके की शराब बता रहे हैं, लेकिन खुल के कुछ नहीं बोल रहे। ये अंदेशा जताया जा रहा है कि ये शराब पहाड़ में तस्करी के जरिये ले जाने की कोशिश का हिस्सा था, जिसको पुलिस ने पकड़ के नाकाम कर दिया। 3 दिन गुजर जाने के बावजूद आबकारी महकमे की चुप्पी इस मामले को रहस्यमय बना रही है।

सवाल तो पुलिस पर भी उठ रहे हैं। ट्रक में 465 पेटी अँग्रेजी शराब थी। आबकारी महकमे के अफसरों का कहना है कि ट्रक में एक बार में 500 से कम पेटियाँ नहीं ले जाई जाती है। देहरादून के FL-2 से 500 पेटी ही माल निकला है। फिर पुलिस ने पकड़ा तो 35 पेटियाँ कहाँ गायब हो गईं? क्या पुलिस ने ही इसमें खेल कर दिया? या फिर ट्रक के चालक-क्लीनर ने हाथ की सफाई दिखा दी? हैरत की बात ये है कि इस मामले में अभी तक आबकारी महकमे की तरफ से कोई अधिकृत बयान नहीं आया है।

इन दिनों जम के बदनाम आबकारी महकमे के डीईओ मनोज उपाध्याय खामोशी अपनाए हुए हैं। उनके खिलाफ वैसे भी तमाम भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को ले के जांच चल रही है। `Newsspace’ ने आयुक्त सुशील कुमार सिंह से भी संपर्क किया। उन्होंने बताया कि `इस बारे में डीईओ से रिपोर्ट तलब की गई है। रिपोर्ट मिलने के बाद ही इस बारे में कुछ कहा जा सकता है’। ये ऐसा मामला है, जिसमें महकमे के अफसरों के साथ ही माल के मालिक और पुलिस पर भी शक की अंगुली उठ रही है। ये समझा जा रहा है कि माल FL-2 से नियमों के मुताबिक उठाया गया। अगर ऐसा है तो फिर मालिक क्यों खुल के विरोध नहीं कर रहा है? क्यों पुलिस की थ्योरी (अवैध शराब कोटद्वार के रास्ते पहाड़ों में भेजी जा रही थी) को चुप रह के बल दे रहे हैं?

माल बूंदी सेठ का बताया जा रहा है, लेकिन पुलिस कार्रवाई पर कोई भी विरोध के सुर नहीं निकल रहे हैं। कहा जा रहा है कि इसकी एक वजह गलत ढंग से माल को ले जाने की कोशिश है। पुलिस ने माल तब पकड़ा जब माल को निर्धारित नंबर के ट्रक से उतार के दूसरे नंबर के ट्रक पर लादा जा रहा था। नियमों के मुताबिक ऐसा नहीं किया जा सकता है। अगर तय गाड़ी में कोई समस्या हो तो आबकारी महकमे को सूचित कर के ही दूसरी गाड़ी में माल ढोया जा सकता है। जो मालिक ने नहीं किया।

पहले ही इन दिनों बदनामी की कालिख मुंह पर पोत के बैठे आबकारी महकमे के हिस्से इस पुलिस कार्रवाई से और बदनामी आई है। पुलिस के इस दावे को भी सही माना जा रहा है कि FL-2 से नियमानुसार शराब निकाल के इसको पहाड़ों में तस्करी के जरिये भेजा जा रहा था। पंचायत चुनावों में वैसे भी शराब की मांग बहुत बढ़ी हुई है। इसके मुक़ाबले आपूर्ति नहीं हो पा रही है। जिस तरह इस मामले में किसी के खिलाफ अभी तक कार्रवाई नहीं हुई है, उससे ये भी अंदाज लगाया जा रहा है कि ये शराब कहीं किसी सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़े शख्स की न हो।

इस बात को ले कर एक बार फिर सरकार के दामन में दाग लग रहे हैं कि इतने घोटालों, आरोपों और तस्करी पर अंकुश न लग पाने के बावजूद सरकार आखिर डीईओ उपाध्याय को किस तरह इतनी छूट कार्रवाई न कर के दे रही है। उपाध्याय के खिलाफ अपर आयुक्त स्तर की जांच भी घोटालों को ले के बिठाई गई है। ऐसी हवा है कि सरकार में उपाध्याय और महकमे के एक संयुक्त आयुक्त, जो हर अहम काम में दखल रखते हैं, के खिलाफ सरकार बेहद उदार, नरम रुख अपनाए हुए है। इसके पीछे की वजहों को तलाशा जा रहा है। पुलिस पकड़ी गई शराब को अवैध और तस्करी में इस्तेमाल साबित करने के लिए जी जान लगा रही है। आबकारी महकमा इसको FL-2 से बा-कायदा निर्गम का हिस्सा साबित कर खुद को दागी होने से बचाने में जुटा है।

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