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उत्तराखंड

उत्तराखंड क्रिकेट टीम चयन और एंटी करप्शन टीम पर अंगुली!

चयनकर्ता मनोज मुद्गल ने कहा-हालात पसंद नहीं थे, इसलिए लौट गया

यूपी के एक विवादित शख्स और पदाधिकारी का लिया नाम

हर अहम ज़िम्मेदारी यूपी के लोगों के हाथों में

CEO का चयन एपेक्स काउंसिल करती है, पर ये अस्तित्व में नहीं

Chetan Gurung

विजय हज़ारे ट्रॉफी में खेल रही उत्तराखंड क्रिकेट टीम के चयन को ले कर अंगुली जम के उठ रही है। अपने वक्त के धाकड़ विकेट कीपर बल्लेबाज और यूपी के चयनकर्ता रह चुके मनोज मुद्गल ने पूछने पर साफ तो नहीं कहा लेकिन ईशारों में `Newsspace’ से कहा-`हालात काम करने के लिए माकूल नहीं थे। सो बीच में ही लौट आया।’ उन्होंने एक ऐसे शख्स का नाम चयन में दखलअंदाजी करने वाले के तौर पर लिया, जो पिछले साल यूपी में चयन कराने के लिए पैसे मांगने के आरोप के चलते बदनाम हुआ था।

बगैर एपेक्स काउंसिल के गठन के ही CEO के तौर पर अमृत माथुर की नियुक्ति को ले कर भी क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड निशाने पर है। एसोसिएशन के पदाधिकारी दबी जुबान से माथुर की नियुक्ति नहीं होने का दावा कर रहे, लेकिन पूर्व अध्यक्ष हीरा सिंह बिष्ट और हाल ही में निर्वाचित अध्यक्ष जोत सिंह गुनसोला ने साफ कहा है कि CEO और चयंकर्ताओं की नियुक्ति तथा एंटी करप्शन यूनिट का गठन BCCI ने किया है। CAU की भूमिका इसमें कुछ नहीं थी।

CEO की नियुक्ति में अभी तकनीकी दिक्कतें हैं। बीसीसीआई में भी CEO की नियुक्ति एपेक्स काउंसिल करती है। अभी काउंसिल ही नहीं बनी है। काउंसिल में CAU के ऑफिस बेयरर के साथ ही प्लेयर्स एसोसिएशन के दो सदस्य, एक कंट्रोलर-ऑडिटर जनरल का सदस्य भी शामिल होना होता है। यही प्रक्रिया राज्य में अपनाई जानी है। अभी प्लेयर्स एसोसिएशन का ही गठन नहीं हुआ है। टीम चयन में मनमानी और पक्षपात के आरोप विजय हज़ारे ट्रॉफी टीम के साथ ही अन्य टीम के चयन में भी लगे हैं।

एक अंडर-16 खिलाड़ी को ट्रायल में तीन ओवर की गेंदबाजी में तीन विकेट मिले। उसका चयन नहीं किया गया। उसके स्थान पर जिस खिलाड़ी का चयन किया गया, उसको तीन ओवरों में एक विकेट भी नहीं मिले। आयोजकों ने इस फैसले पर ध्यान दिलाए जाने पर भी कोई तवज्जो नहीं दी। चयन को ले कर हवा गरम इसलिए भी है कि सबसे पहले आए चयनकर्ता मनोज मुदगिल बीच में ही दिल्ली लौट गए। ऐसी हवा है कि वह चयन में सिफ़ारिशों से आजिज़ आ गए थे। सिफ़ारिश करने वाले एसोसिएशन से ताल्लुक रखने वाले थे या नहीं, इस पर वह जुबान नहीं खोल रहे हैं।

इतना जरूर समझा जा रहा है कि यूपी के जिस शख्स का नाम लिया जा रहा है वह यूपीसीए के एक बड़े और अहम पदाधिकारी का खासमखास है। दोनों को राजीव शुक्ल, जो कि पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीसीसीआई-यूपीसीए के पदाधिकारी हैं, के भी करीबियों में शुमार किया जाता है। ऐसा कहा जा रहा है कि राजीव शुक्ल को उनके कारनामों के भारे में अधिक भनक नहीं है, लेकिन उनके नाम का बेजा इस्तेमाल करने से कुछ लोग चूक नहीं रहे। CAU की तरफ से भी उनको जाने-अनजाने बल दिया जा रहा है।

चयन के बीच से चले जाने पर मुद्गल ने कहा-`मैं पीसी वर्मा (पूर्व सीएयू सचिव) के बुलावे पर आया था। मुझे लगा कि काम करने में दिक्कत आ रही है, तो मैं लौट गया।’ वह क्या परिस्थितियाँ थी, जिसके कारण लौटना पड़ा, उसका खुलासा उन्होंने नहीं किया। अलबत्ता, ऑफ दी रेकॉर्ड मुद्गल ने काफी बातें कहीं, जो क्रिकेट के हक में नहीं। सूत्रों के मुताबिक सहारनपुर के अकरम नाम के एक शख्स को CAU में असामान्य तरजीह दी जा रही है। कई अहम फैसलों और एंटी करप्शन यूनिट के गठन में भी उसकी भूमिका को देखा जा रहा है। अकरम पिछले साल यूपी रणजी टीम के चयन के दौरान गलत वजह से चर्चाओं में आया था।

सूत्रों के मुताबिक मुद्गल की वैसे भी यूपीसीए के सचिव युद्धवीर सिंह से नहीं बनती है। युद्धवीर भी शुक्ल की तरह उत्तराखंड क्रिकेट में ख़ासी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। अकरम भी युद्धवीर का खास समझा जाता है। राजधानी के कई पूर्व खिलाड़ी एसोसिएशन के पदाधिकारियों के रुख से बेहद खफा हैं। उनके मुताबिक टीम मैनेजर, वेन्यू मैनेजर, को-ओर्डिनेटर, मीडिया मैनेजर, असिस्टेंट कोच, एंटी करप्शन यूनिट जैसों में उनके अनुभव का इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही सहायक चयनकर्ता भी हो सकते हैं। उनको मौका देने के बजाए बाहर के लोगों को ये जिम्मेदारियाँ दी जा रही हैं। सिर्फ कुमार थापा ही टीम मैनेजर हैं।

एक पूर्व खिलाड़ी का तर्क है कि चयनकर्ताओं के साथ स्थानीय पूर्व खिलाड़ी सहायक होते तो टीम चयन और अच्छा होता। तीन-चार ओवर की बल्लेबाजी-गेंदबाजी नेट पर देख के खिलाड़ी के बारे में सही आइडिया वे चयनकर्ता आखिर कैसे लगा सकते हैं, जिन्होंने उनको कभी पहले मैदान पर मैच में खेलते नहीं देखा। जो बाहर से कुछ दिन पहले ही आए हैं। नेट और मैच की मानसिकता में बहुत फर्क होता है। पिछले साल बीसीसीआई ने सभी एंटी करप्शन यूनिट सदस्य स्थानीय रखे थे। एक भी शिकायत किसी किस्म की नहीं आई थी। ज़िम्मेदारी मिलती तो पूर्व खिलाड़ी भी खुद को सम्मानित महसूस करते।

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