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उत्तराखंड

नाकाम शराब पॉलिसी से सरकार-कारोबारी दोनों बर्बाद

हर साल 50 हजार पेटी अतिरिक्त बेचने का दबाव बढ़ रहा

एक तरफ नशे के खिलाफ मुहिम, दूसरी ओर आबकारी राजस्व लगातार बढ़ रहा

नाकाम पॉलिसी बनाने वाले सरकार के खासमखास, नीचे वालों पर ही गाज

Chetan Gurung

सरकार की नाकाम और अदूरदर्शी आबकारी नीति देवभूमि में नशाखोरी को बढ़ावा दे रही। दूसरी ओर तस्करी को जम कर उछाल मिल रहा है। अरबों का घाटा देने वाली पॉलिसी का प्रस्ताव तैयार करने और सरकार की आँखों में धूल झोंक इसको कैबिनेट से मंजूर कराने वाले अफसरों पर कोई कार्रवाई भी नहीं हो रही। दूसरी ओर पुलिस महकमे के लिए वैध और अवैध शराब की तस्करी सिर दर्द (या फिर लॉटरी) साबित हो रही। रायवाला में अंग्रेजी शराब की सैकड़ों पेटियों के पुलिस के हाथों पकड़े जाने से एक बार फिर शराब पॉलिसी की नाकामी ही बेपरदा हुई है। इस मामले में पुलिस-आबकारी महकमे खामोशी संग अपना गेम खेल रहे हैं। नाकाम पॉलिसी से सरकार और शराब कारोबारी दोनों बर्बाद, चौपट,तबाह हो रहे।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत:सख्ती-कौशल दोनों बढ़ाना होगा

शराब महकमे और धंधे को करीब से समझने वालों का साफ कहना है कि जिस तरह शराब की बिक्री का लक्ष्य सरकार हर साल बिना सोचे-समझे बेतहाशा बढ़ा रही है, उससे तीन चीजें हो रही हैं। एक-शराब की तस्करी बढ़ती जा रही है। दूसरा-शराब के धंधे में उतरे लोगों को मोटा चूना लग रहा है। तीन-सरकारी राजस्व को नुकसान बहुत भारी हो रहा। आज आलम ये है कि सालों से काम कर रहे शराब कारोबारी भी बेहद परेशान हैं। मोटा घाटा सामने देख बेचैन-परेशान हैं। सरकार को अरबों का जबर्दस्त राजस्व घाटा हो चुका है। चालू वित्तीय वर्ष में। फायदा सिर्फ एक को हो रहा है-शराब के अफसरों को। जो इस खेल में पर्दे के पीछे हैं। हर बड़ी दुकान-बार में पत्तियाँ लिए हुए हैं।

प्रमुख सचिव (आबकारी) आनंदबर्द्धन:छवि के अनुसार कड़क कदम उठाएँ

4-5 दिन पहले राजधानी के रायवाला में जो 465 पेटी शराब पकड़ी गई, उसमें पुलिस ने कह दिया है कि ये माल देहरादून से FL-2 (गोदाम) से निकला था। चालक के मुताबिक इस माल को अल्मोड़ा में उतरना था। इससे आगे पुलिस भी कुछ नहीं बोल रही। इससे मामला बहुत संदिग्ध तो लग ही रहा, साथ ही इसके पीछे दबाव डालने की हैसियत रखने वाले का नाम होने का शक जताया जा रहा है। माल रायवाला के नाम पर और उतारा जाना था अल्मोड़ा। यानि, सीधा तस्करी की आशंका। आबकारी आयुक्त सुशील कुमार इस मामले में जुबान खोलने से बच रहे हैं। इस मामले में उन्होंने `Newsspace’ से सिर्फ इतना कहा-वे कोर्ट रूम में ही कुछ कहेंगे।

इतनी लुका-छिपी इस मामले को ले कर क्यों? जब से सरकार की मौजूदा आबकारी पॉलिसी आई है, सरकारी खजाने को चूना ही लगा है। पहले तो खराब पॉलिसी, फिर लोकसभा चुनाव, फिर बारिश, फिर श्राद्ध और अब नवरात्र का त्यौहार। बीच में देहरादून में जहरीली शराब से 7 लोग मरे। सो कई दिन देसी शराब की दुकानें भी बंद। इससे भी सरकार-कारोबारी दोनों को घाटा हुआ। अब इतने दिनों की बिक्री पिटने के बाद बचा माल कैसे और कहाँ खपाए, ये सबसे बड़ा संकट दुकानदारों के सामने है। यहीं से तस्करी की राह खुलती है। ये पॉलिसी की नाकामी ही है कि आए दिन भारी मात्रा में तस्करी की शराब पकड़ी जा रही है।

रायवाला में जितनी पेटियाँ पकड़ी गई, उससे कहीं ज्यादा होने का शक जताया जा रहा है। तस्करी के पीछे विशेषज्ञ सरकार की पॉलिसी को दोषी मानते हैं। उनका मानना है कि अगर हर साल शराब से राजस्व उगाही का लक्ष्य यूं ही बढ़ता रहेगा तो तस्करी बढ़नी स्वाभाविक है। ज़्यादातर दुकानें काउंटर सेल की सीमा को कभी का पार कर चुकी हैं। हर साल उनकी सीमा रेखा आगे खिसका दी जाती है। सरकार की ओर से। बिना सोचे-समझे। आबकारी के एक अफसर ने `Newsspace’ से कहा-सरकार शराब बेचने का लक्ष्य बेहिसाब रफ्तार से बढ़ा रही। हर साल तकरीबन 50 हजार पेटी शराब अतिरिक्त बेचने का दबाव आ रहा। ये अब नामुमकिन सा आंकड़ा हो चुका है। आखिर दुकानदार इतना ज्यादा अतिरिक्त माल कहाँ बेचेगा?

दुकानदार को तो FL-2 (अंग्रेजी का गोदाम), CL-2 (देसी का गोदाम) से माल रो-धो के उठाना ही है। मजबूरी है। अब इतना अधिक माल बिकना तो है नहीं। दुकान में। लिहाजा वह इसको तस्करी के जरिये पहाड़ या फिर गांवों में खपाने की कशिश करते हैं। पुलिस की मिली भगत से इसमें उनको मदद मिलती है। ये ही माल कभी-कभी दबाव पड़ने पर या फिर तस्करों के साथ सेटिंग न होने पर पुलिस पकड़ लेती है। AC और DEO स्तर के अफसरों में ये बात उठने लगी है कि आबकारी नीति नाकाम साबित हो रही तो फिर इसके गुनहगार भी चिहनित क्यों नहीं होने चाहिए! क्यों खराब नीति के कारण बेजा दबाव वे झेले?

ये बात उठने लगी है कि सिर्फ नीचे के अधिकारी और कर्मचारी-सिपाहियों पर ही गाज क्यों गिरे? मुख्यालय में आखिर कौन अफसर लाइसेंसिंग और पॉलिसी को देखता है? कौन सरकार को पॉलिसी की ऊंच-नीच समझाता है? कौन है, जिसके खेमे के AC ही DEO और अहम सर्किल के इंस्पेक्टर हैं? कभी सरकार ने इस पर सोचा? एक बात और है। आयोग से आए इंस्पेक्टर सड़कें नाप रहे या फाइलें पीट रहे। इसके उलट बाबू या सिपाही कैडर वाले और उत्तराखंड आंदोलनकारियों के कोटे से सिपाही बन के आए लोग सर्किल के इंस्पेक्टर बन गए हैं। उनको काम करने का अंदाज भी पेशेवर तौर पर अधिक नहीं है। न ही उनके पास वह ट्रेनिंग है। इसका भी फायदा शराब तस्कर उठा रहे हैं।

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