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उत्तराखंड

उत्तराखंड:भ्रष्टाचार में डूबती देवभूमि और नौकरशाह

The Corner View

चेतन गुरुंग

नौकरशाही और भ्रष्टाचार का एक-दूसरे से बहुत करीबी रिश्ता पूरी दुनिया में रहा है। भारत इससे अछूता नहीं। जब उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना की गई थी तब उत्तर प्रदेश का तंत्र सामने था। उत्तराखंड (तब गढ़वाल-कुमायूं-हरिद्वार-उधमसिंह नगर) के लोग जब किसी काम से सरकारी दफ्तरों में जाते थे, या फिर लखनऊ में सचिवालय, कभी-कभार जाते थे, तो आम शिकायत रहती थी कि बिना लिए-दिए कुछ काम ही नहीं होता। इससे आजिज़ आ चुके थे पहाड़ के लोग। सभी को लगता था अपना अलग राज्य होता तो विकास के साथ ही भ्रष्टाचार मुक्त सरकारी तंत्र भी आएगा। 8-9 नवंबर 2000 की मध्य रात जब राज्य की पहली अन्तरिम सरकार मुख्यमंत्री नित्यानन्द स्वामी की अगुवाई में शपथ ले रही थी, तो नाच-गा और झूम रहे, एक-दूसरे को बधाई दे रहे लोगों में खुशी और अपार उत्साह को सहज महसूस किया जा सकता था।

बहुत जल्दी ये गलत फहमी दूर होने लगी थी कि नया और अपनापन का सुगंध लिए हुए उत्तराखंड भ्रष्टाचार से मुक्त और दूर रहेगा। लोग भूल गए कि जिस यूपी संस्कृति से बच के आने की खुशी मनाई और सोची जा रही, वही लोग उत्तराखंड सरकार में आ गए हैं। शुरुआत शराब डिस्टलरी को मंजूरी से हुई। खूब बवाल हुआ। स्वामी ने नशा मुक्त राज्य का नारा दिया था। उन पर ही आरोप लग गए। दो मुख्यमंत्रियों (स्वामी के बाद भगत सिंह कोश्यारी भी मुख्यमंत्री बने, जो आज महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं) वाली अन्तरिम बीजेपी सरकार से ही घोटालों की गंध मिलने लगी थी। जब 2002 में काँग्रेस की सरकार एनडी तिवारी की अगुवाई में ओएनजीसी के केडीएमआईपीई सभागार में शपथ ले रही थी, तभी ये एहसास भी हो गया था कि तिवारी सरकार मुख्यमंत्री के तमाम सियासी, सरकारी अनुभव और अद्भुत विद्वता के बावजूद किस तरह चलेगी।

फिर एक के बाद एक भ्रष्टाचार के मामलों का खुलासा होता गया। दारोगा, पटवारी, आयुर्वेदिक चिकित्सक, खेल, सिडकुल, कंप्यूटर खरीद, लघु सिंचाई घोटालों ने तराई से ले के पहाड़ में चीन, नेपाल सीमा तक का तापमान गरम कर दिया था। हकीकत ये है कि इस तरह की शर्मनाक और हताश करने वाली मिसालों ने ही उत्तराखंड आंदोलन के दौरान पुलिस की गोलियां तक सहने और शहादत देने वालों के परिवारों में निराशा उत्पन्न कर दी थी। इसकी एक वजह ये भी थी कि उस दौरान सियासी नेतृत्व बहुत कमजोर था। अन्तरिम सरकार में स्वामी को उनके अंदरूनी विरोधियों ने कभी काम करने नहीं दिया। तिवारी को उनके ऊंचे कद के बावजूद हरीश रावत खेमे ने एक पल भी सुकून की सांस लेने नहीं दिया। वह सरकार बचाने में ही व्यस्त रहे। सियासी नेतृत्व की कमजोरी का भरपूर फायदा कई नौकरशाहों ने जम कर उठाया। उन्होंने मनमानी और भ्रष्टाचार में कोर-कसर नहीं छोड़ी।

DGP के तौर पर MA Ganpati (बाएँ) और मौजूदा DGP Anil Raturi (दाएँ) की प्रतिष्ठा और छवि का जवाब नहीं। साथ में DGLO अशोक कुमार (एकदम दाएँ) हैं।

तिवारी ने सिर्फ जैनी सेक्स स्कैंडल के दौरान कूटनीतिक चातुर्य दिखाया था।  उन्होंने उस वक्त के राजस्व मंत्री और आज के वन-आयुष मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत से विधान सभा सत्र के दौरान खुद इस्तीफे का ऐलान बेहद चालाकी से कराने में सफलता पाई थी। हरक पर आसामी युवती जैनी के शारीरिक शोषण का आरोप लगा था। इसकी सीबीआई जांच बैठी थी। मैंने ही इस कांड पर लगातार एक के बाद एक पेज-1 स्टोरी की श्रन्खला चलाई थी। दारोगा भर्ती, सिडकुल और आयुर्वेदिक के साथ ही खेल घोटालाओं पर भी जम कर कंप्यूटर के की-बोर्ड को पीटा था। ऐसा एक भी घोटाला नहीं था, जिसमें नौकरशाह या फिर महकमे के अफसर खेल न कर रहे हों। सरकार उन पर अंकुश लगाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई थी। इसका खामियाजा तिवारी और काँग्रेस ने भुगता। 2007 में विधानसभा चुनाव में काँग्रेस सत्ता से बाहर हुई। फिर बीजेपी ने कुर्सी संभाली।

अगर पटवारी भर्ती घोटाले को छोड़ दिया जाए तो बाकी घोटालों में सिर्फ और सिर्फ नौकरशाहों के नाम ही प्रमुखता से आए थे। पौड़ी के पटवारी भर्ती घोटाले में शायद 80 लोगों की नौकरी मेरी पेज-1 स्टोरियों ने ले ली थी। डीएम एसके लांबा निलंबित फिर बाद में बर्खास्त हुए। वह सचिव हो चुके थे। इसका चार्ज लेने से पहले ही वह बर्खास्त हो गए। बाद में उनकी तरफ से मुझे एक करोड़ रुपए की मान हानि का नोटिस भी मिला था। इसका मैंने कोई जवाब नहीं दिया था। सीडीओ कुँवर राजकुमार की प्रविष्टि खराब हो गई थी। एडीएम (तब विनोद चंद्र रावत) भी निलंबित हुए थे। राजकुमार के लिए इसके कारण बाद में पीसीएस कोटे से आईएएस में चयन हासिल करना बहुत टेढ़ी खीर साबित हुआ था। रावत कभी आईएएस नहीं बन पाए। सिडकुल घोटाला राज्य का पहला सबसे बड़ा घोटाला था। मेरी इस पर की गई स्टोरी के कारण मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी ने जांच आयोग तक बिठा दिया था। इस घोटाले में सिडकुल के उस वक्त के एमडी संजीव चोपड़ा, पराग गुप्ता, आलोक वर्मा पर दाग लगे थे। वर्मा और चोपड़ा उसके बाद वापिस अपने मूल काडर लौट गए थे। पश्चिम बंगाल काडर के चोपड़ा इन दिनों एलबीएस एकेडमी में निदेशक हैं। वर्मा यूपी में हैं। पराग भी उनके मूल काडर ऊड़ीसा के लिए कार्यमुक्त कर दिए गए थे। वह इन दिनों एसीएस हैं।

सिडकुल के बेहद प्रभावशाली जीएम रक्षित जैन को बर्खास्त कर दिया गया था। दारोगा भर्ती घोटाला ने देश भर में देवभूमि को बदनाम कर दिया था। उस वक्त के डीजीपी प्रेम दत्त रतूड़ी को रातों-रात सरकार ने हटा दिया था। बहुत ही प्रभावशाली ट्रैक रेकॉर्ड वाले आईजीपी राकेश मित्तल, जो 22 साल पूरे होते-होते आईपीएस बन गए थे, निलंबित कर दिए गए थे। तब उनकी 7 साल की नौकरी बची हुई थी। उनका अगला डीजीपी बनना तो तय था ही, रेकॉर्ड ऐसा था कि सीबीआई और आईबी प्रमुख बनने की भी होड़ में होते। भर्ती हुई एक महिला समेत आठ दारोगा इस मामले में बर्खास्त किए गए थे। मित्तल बाद में बहाल हुए, लेकिन डीजीपी नहीं बन पाए। कभी चमकदार भविष्य वाले मित्तल कमांडेंट जनरल (होमगार्ड) से रिटायर हो गए। कंप्यूटर खरीद घोटाले में घिर कर शानदार-दमदार आईएएस अफसर अमरेन्द्र सिन्हा ने अपना कैरियर चौपट करा लिया।

कंप्यूटर खरीद पर कड़क-तेज तर्रार नौकरशाह विजेंद्र पाल ने प्रारंभिक जांच की थी। इस रिपोर्ट पर जब सरकार ने डेढ़ साल में भी कार्रवाई नहीं की, तो वह रिपोर्ट उन्होंने मेरे मांगने पर मुझे सौंप दी। अगले दिन वह अखबार में पहले पन्ने पर पहली लीड थी। हेडिंग भी काफी आक्रामक था। अखबार मार्केट में आने के कुछ ही देर बाद मुझे मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक का फोन सुबह-सुबह आया था। उन्होंने पूछा कि खबर में कितनी सच्चाई है? उनकी चिंता का कारण मैं जल्दी पता करने में सफल हो गया। अमरेन्द्र को एकाध दिन में ही प्रमुख सचिव (मुख्यमंत्री) बनाने के आदेश होने वाले थे। मेरी रिपोर्ट के बाद ये लटक गया फिर सिन्हा केंद्र सरकार चले गए। मैं आज भी मानता हूँ। वह यारों के यार और बेहद प्रतिभावान थे। बस गल्तियों ने उनका कैरियर खराब कर दिया। दरअसल जांच रिपोर्ट बहुत ही आक्रामक और संवेदनशील थी। सिन्हा ने काफी कोशिश की थी कि खबर का खंडन छाप दूँ। ऐसी ही कोशिश आलोक वर्मा ने भी की थी। मेरे से नहीं हो पाया। अपनी सुबूत आधारित खबर को कैसे झुठला देता?

ये सब इसलिए लिख रहा हूँ कि आज के दौर के भी कई नौकरशाह ऐसे हैं, जो अतीत के अपने अपने वरिष्ठों की गल्तियों और लालच से सबक नहीं ले रहे हैं। वे ऐसा कर के सिर्फ और सिर्फ अपना भविष्य अंधकारमय कर रहे हैं। इसमें सरकार की भी पूरी गलती है। हाल ही में एक ऐसे नौकरशाह को सरकार ने अहम महकमा थमा दिया, जिसको खुद उनकी आईएएस बिरादरी नापसंद करती है। जो घोटाले में फंसे थे। जिसके खिलाफ मुख्य सचिव रहने के दौरान सुभाष कुमार ने प्रविष्टि खराब करने और एक सालाना वेतन वृद्धि रोकने के आदेश सरकार की तरफ से दिए थे। बाद में दौड़-धूप कर के इस नौकरशाह ने अपनी सजा को काफी कम कराने में सफलता पा ली। आज भी उनके किस्से खुद साथ के नौकरशाह बयां करते हैं। हैरानी होती है कि जीरो टालरेंस वाले मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत राज में उसका कैसे पुनर्वास हो गया! कई नौकरशाह ऐसे भी हैं, जो खुद पर लगे तमाम पिछले आरोपों से सबक नहीं ले रहे हैं। उनके हर फैसले के पीछे खास और निजी एजेंडा रहता है। इनमें करियर की शुरुआती दौर वाले से ले के बेहद वरिष्ठ तक शामिल हैं। ऐसों की तादाद दो-तीन में नहीं दर्जन भर में है। आज अगर ये कहा जा रहा है कि ये हमारे सपनों का उत्तराखंड नहीं है, तो इसके पीछे नौकरशाह और सियासी नेतृत्व समान रूप से जिम्मेदार है।

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