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उत्तराखंड

सुनिएगा सरकार:कारनामा यूटीयू का, भुगत रहे PHD शोधार्थी

दर्जनों का भविष्य कुलपति चौधरी के फरमान से दांव पर

को-ऑर्डिनेटर विद्यार्थी ने माना:ढाई साल से AC व EC की बैठक नहीं हुई  

`वाइवा’ के साथ खत्म होता है शोधार्थी का काम, आगे विवि की ज़िम्मेदारी

Chetan Gurung

उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय लगता है सिर्फ नकारात्मक और विध्वंस के लिए ही देश भर में छाप छोड़ने को बेताब है। जन्म के दौरान ही ये विवि अपने रजिस्ट्रार और परीक्षा नियंत्रक (दोनों भूमिका में इन दिनों जेल में बंद मृत्युंजय मिश्र थे) के कारनामों के कारण खूब बदनाम रह चुका है। अब विवि एक-दूसरे को निबटाने की आंतरिक सियासत और मज़ाक बन गई परीक्षाओं तथा अन्य अव्यवस्थाओं के कारण फिर से कुख्यात है। चांसलर और राज्यपाल बेबी रानी मौर्य, जो कि शालीन मानी जाती हैं, तक को विवि के कुलपति नरेंद्र चौधरी को हाल ही में कुलपतियों की बैठक में सार्वजनिक तौर पर डपटना पड़ा था। विवि और चौधरी के नए फरमान ने अब पीएचडी शोधार्थियों का पेशेवर जीवन भी तबाह करना शुरू कर दिया है। इस मामले में तुगलकी आदेशों पर सरकार भी कान नहीं दे रही है।

यूजीसी (विवि अनुदान आयोग) ने हर शोधार्थी के लिए SCI-SCIE या फिर SCOPUS में दो शोध पत्र प्रकाशित करने की शर्त साल 2009 में तय की थी। यूटीयू ने इसको साल 2015 में लागू करने का आदेश जारी किया। भले इसको अमल में नहीं लाया गया। इस बीच कई शोध कर रहे छात्र-छात्राएँ पीएचडी पूरी कर डिग्री ले के चली भी गईं। कई ऐसे भी थे जिनकी PHD चल ही रही थी। वे थीसिस जमा कर चुके थे। कई ऐसे हैं जो ढाई साल पहले वाइवा तक दे चुके हैं। इसके बाद एकेडमिक काउंसिल (AC) को इसे पास करना था। फिर एग्जीक्यूटिव काउंसिल (EC) को इसकी अंतिम मंजूरी देनी भर थी।

यहाँ आ के PHD अवार्ड करने की गाड़ी विवि की ही अकर्मण्यता के कारण ऐसी फंसी कि अब शोधार्थियों का पेशेवर भविष्य ही दांव पर लग गया है। एक तो यूटीयू UGC गाइड लाइन के खिलाफ सिर्फ SCI को ही मान रहा। SCOPUS-SCIE को नहीं। जो उसकी मनमर्जी या फिर तानाशाही है। कोई भी विवि भला कहाँ से UGC को सुपरसीड कर सकता है? इधर आलम ये है कि मौजूदा कुलपति चौधरी जब से आए हैं, लगातार विवादों में रहे हैं। उनकी कार्यकाल में विवि का स्तर कहाँ पहुँच गया, इसकी बानगी खुद राज्यपाल ने बैठक में ये कह के पेश की थी कि यूटीयू को कहाँ होना चाहिए था और कहाँ सबसे नीचे आ गया। उन्होंने पीएचडी अवार्ड किए जाने के मामले में घोटाला होने के शक में जांच बिठाई है। जांच अधिकारी ए विद्यार्थी हैं। वह एसआईटी पिथौरागढ़ के निदेशक हैं। हालांकि, PHD डिग्री रुकने की वजह अलग है।

कुलपति चौधरी ने आदेश लागू कर दिया है कि जिस भी शोधार्थी के दो शोध पत्र SCI में प्रकाशित नहीं हैं, उनको डिग्री न दी जाए। इससे बवाल और हंगामा मचा हुआ है। इस आदेश को बहुत अजीबोगरीब ढंग से अमल में लाया गया है। जो शोधार्थी डिग्री ले चुके हैं, उनके साथ तो कुछ नहीं किया जा रहा लेकिन जिनकी डिग्री विवि के स्तर पर उसकी सुस्ती और ढिलाई के कारण रुकी है, उनको डिग्री देने से अब मना किया जा रहा है। उनके लिए भी अब Science Citation index जर्नल्स में दो शोध पत्र प्रकाशित करने की शर्त थोप दी गई है। कोई भी नया आदेश हमेशा जारी होने की तारीख से लागू होता है। यूटीयू ने इसकी जद में पूर्व के भी सभी शोधार्थियों को ले लिया।

मसलन अगर किसी ने 2010-11 में रजिस्ट्रेशन कराया है। उसकी PHD चल रही है, उस पर ये बाध्यता होगी कि वह शोध पत्र प्रकाशित कराएं। उसके बाद अगर कोई आया और पहले ही डिग्री पूरा कर के चला गया, उस पर ये लागू नहीं है। शोधार्थियों के ऐतराज व तर्क को समझा और माना जा सकता है। उनका तर्क वाजिब है, `अगर AC और EC ने उनको पास कर दिया होता तो हम डिग्री ले चुके होते। तब यूटीयू क्या करता? क्या तब भी हमको दो शोध पत्र प्रकाशित करने के लिए बाध्य किया जाता?’ सवाल ये भी है कि डिग्री ले के घर जा चुके और नौकरियों में घुस चुके लोगों का यूटीयू क्या कर लेगा? विवि अपनी लापरवाही और खामी के चलते शोध छात्रों का जीवन तबाह कर रहा है।

NCR में रहने वाली एक महिला शोधार्थी के मुताबिक उसकी डिग्री दो साल पहले वाइवा होने के बाद मिल जानी चाहिए थी। विवि की लापरवाही के कारण ये नहीं मिली। अब दो शोध पत्र की शर्त थोप दी है। उनके वक्त ये बाध्यता नहीं थी। इसमें आज जुटें तो भी डेढ़ साल और लग जाएंगे। उसकी भी कोई गारंटी नहीं कि प्रकाशित हो ही जाएंगे। एक शोध छात्र के मुताबिक विवि के अकर्मण्यता का पाप हम क्यों भुगते? क्या हम 10-12 साल सिर्फ PHD में ही लगा दें? होना ये चाहिए कि जो भी शोध पत्र वाली शर्त है, वह 2015 के बाद रजिस्टर्ड शोध छात्रों पर लागू की जानी चाहिए।

पहले से शोध कर रहे छात्रों के लिए विवि का ये फैसला सिर्फ नाकाम बादशाह मोहम्मद बिन तुगलक की याद दिलाता है। अहम पहलू ये है कि घपलों-घोटालों की जांच कर रहे और PHD समन्वयक `विद्यार्थी’ पर ही सूचनाएँ छिपा के निदेशक बन जाने का शक है। उनसे `Newsspace’ की तरफ से पूछा गया-वाइवा हो जाने के कितने समय के भीतर AC और EC की बैठक हो जानी चाहिए? और PHD अवार्ड करने के लिए अंतिम चरण शोधार्थी की तरफ से क्या है? विद्यार्थी ने जवाब दिया कि शोधार्थी का काम `वाइवा’ के साथ ही खत्म हो जाता है। इसके छह महीने के भीतर AC और EC की बैठक हो जानी चाहिए। EC की मंजूरी के साथ ही PHD अवार्ड मानी जाती है। उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले ढाई साल से AC और EC की बैठक ही नहीं हुई है।

तस्वीर का असल पहलू देखिये। काम से काम 25 से 28 शोधार्थी ऐसे हैं, जो अपना वाइवा तक ढाई-दो साल पहले ही दे चुके हैं। इसका मतलब ये है कि अगर मौजूदा और पूर्व के कुलपति उदय सिंह रावत ने समय पर AC और EC बुला के थीसिस और वाइवा को मंजूरी दिला दी होती तो आज शोधार्थियों को अनिश्चित भविष्य की फिक्र में न रहना पड़ता। न ही उनको आए दिन UTU में धक्के खाने पड़ते।

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