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जो 40 में नहीं थे, वे विजय हज़ारे टीम में

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लोकल टीम मैनेजरों पर भी अंगुली

पुराने सीनियर्स आखिर कब आएंगे काम?

बीसीसीआई से आने वाली है असली एंटी करप्शन टीम

Chetan Gurung

विजय हज़ारे ट्रॉफी में खेल रही उत्तराखंड टीम के चयन को ले कर एक और खुलासा हुआ है। टीम में शामिल अवनीश सुधा और दीक्षांश नेगी शुरुआत में घोषित 40 खिलाड़ियों की टीम में भी नहीं थे। दोनों को बाद में कब कैंप में शामिल किया गया और किस आधार पर टीम में आ गए, ये भी रहस्य है।

प्लेट ग्रुप में खेल रही उत्तराखंड टीम के चयन के लिए शुरू में 40 खिलाड़ियों के नामों का ऐलान किया गया था। न तो सुधा न ही नेगी संभावितों में शामिल थे। बाद में आखिर किस आधार पर और किसकी सिफ़ारिश पर वे टीम में आए, ये कोई नहीं जानता है। दोनों युवा हैं और प्रतिभावान हो सकते हैं, लेकिन चयन का तरीका ऐसा रहा कि क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के कर्ता-धर्ताओं पर अंगुली उठनी स्वाभाविक है।

चयन को ले के वैसे ही CAU पर आरोप लग रहे हैं। एसोसिएशन और क्रिकेट संचालन में भी अपरिपक्वता सामने आ रही है। ये आरोप तो नहीं लगाए जा सकते हैं कि इसके पीछे भ्रष्टाचार छिपा है, पर ये जग जाहिर हो चुका है कि उत्तराखंड के पूर्व और सीनियर क्रिकेटर्स की जम के उपेक्षा हो रही है। जिन लोगों ने दो-दो दशक क्रिकेट को दिए, आज बीसीसीआई मान्यता मिलने के बाद वे निराश हो के घर बैठ गए हैं।

पूर्व क्रिकेट खिलाड़ियों को उम्मीद थी कि CAU उनको भी अहम जिम्मेदारियाँ भले न दे लेकिन ऐसी जिम्मेदारियाँ जरूर देगी, जिसको वे अंजाम दे सकते हैं। वे निराश हैं। `Newsspace’ के साथ दिल का दर्द बांटते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि माना वे बीसीसीआई मानकों के कारण चयनकर्ता या प्रशिक्षक नहीं बन सकते हैं, लेकिन क्या असिस्टेंट कोच, लोकल टीम मैनेजर (बाहरी टीमों के साथ स्थानीय प्रबन्धक) और अन्य छोटे तथा सामान्य कार्य भी करने के लायक नहीं हैं?

उनको इस बात की पीड़ा है कि बाहर से विजय हज़ारे ट्रॉफी खेलने आई टीमों के साथ जो लोकल मैनेजर हैं, उनको खुद क्रिकेट की दुनिया के लोग नहीं पहचानते हैं। उनका चयन किस आधार पर और किसने किए, ये भी रहस्य बन चुका है। कई तो ऐसे लोगों को अहम ज़िम्मेदारी दी गई है, जिनकी पृष्ठ भूमि क्रिकेट की न हो के फुटबाल की है। वे कहते हैं कि देहरादून में ही रौतेला, मनीष गुरुंग, मदन उनियाल, अनिल घिल्डियाल, मनोज रावत, आनंद थापा, सुनील बांगिया, अवनीश वर्मा समेत कई खिलाड़ी हैं।

इनसे कुछ नहीं तो असिस्टेंट कोच और लोकल टीम मैनेजर के साथ ही एंटी करप्शन टीम का काम लिया जा सकता था। CAU ने उनसे संपर्क तक करने की कोशिश नहीं की। हर पल CAU के कार्यों में नजर आने वाले भूपेन्द्र बरी अब कहीं नहीं दिख रहे। वह भी एसोसिएशन में उपेक्षा के कारण नाराज बताए जाते हैं। टीम के चयन में पक्षपात के आरोप तो शुरू से ही लग रहे हैं। राज्य के पहले चयनकर्ता और पूर्व धाकड़ रणजी खिलाड़ी मनोज मुद्गल के वापिस दिल्ली लौट जाने की वजह भी चयन में बेवजह दखल बहुत होना बताया जाता है।

मनोज ने `Newsspace’ से कहा-मैं पाँच दिनों में ही लौट आया। इससे आप कारण खुद तलाश सकते हैं। कोई चयनकर्ता भला क्यों अचानक ही इतना अहम जिम्मा छोड़ के बीच में ही लौट जाएगा! उन्होंने आगे कहा। अभी प्रदेश में एक भी कमेटी का गठन नहीं किया गया है। इसमें अपेक्स काउंसिल भी शामिल है। इसके गठन के बगैर ही CAU के CEO के तौर पर अमृत माथुर को नियुक्त कर दिया गया। हैरानी की बात ये है कि CAU के पूर्व अध्यक्ष हीरा सिंह बिष्ट और मौजूदा अध्यक्ष जोत सिंह गुनसोला सीईओ की कुर्सी पर माथुर की नियुक्ति का मसला बीसीसीआई के माथे डाल रहे हैं।

उत्तराखंड क्रिकेट टीम के चयन से ले के सभी व्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार पर नजदीकी नजर के लिए BCCI की तरफ से एंटी करप्शन यूनिट के प्रभारी को देहरादून भेजा जा रहा है। वह 10 अक्टूबर को देहरादून पहुंचेंगे। इस दौरान वह भ्रष्टाचार और अन्य आरोपों की जांच करेंगे।

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