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96 में नौकरी खत्म, फिर सेवा में कैसे आबकारी इंस्पेक्टर सुजाअत हुसैन-राहिबा इकबाल?

देहरादून

दोनों को हर सरकार का पूरा संरक्षण आखिर कैसे?

हाई कोर्ट के `को वारंटो’ का भी जवाब नहीं दे रही जीरो टालरेंस सरकार

डीईओ और इंस्पेक्टर लॉबी के आगे सरकार नतमस्तक!

Chetan Gurung

देहरादून के निलंबित आबकारी इंस्पेक्टर सुजाअत हुसैन और कुमाऊँ में ही नौकरी करती रहने वाली इंस्पेक्टर राहिबा इकबाल की सेवा 1996 में तभी खत्म हो गई थी, जब उनकी निर्धारित एक साल की अवधि पूरी हो गई थी। दोनों को उर्दू अनुवादक/कनिष्ठ लिपिक (सुपर न्यूमरो) पद पर अस्थाई और तदर्थ के तौर पर 1995 में रखा गया था। दोनों कभी हाई कोर्ट के स्टे और कभी सरकार की जबर्दस्त मेहरबानी से न सिर्फ नौकरी कर रहे हैं बल्कि पूरी धमक रखे हुए हैं।

आदेश में साफ है कि गढ़वाल-कुमाऊँ में भी उर्दू अनुवादक नियुक्त नहीं होंगे। फिर भी सुजाअत-रहिबा नियुक्त हुए।

उस वक्त की उत्तर प्रदेश सरकार ने ये भी साफ किया था कि उर्दू अनुवादक के पद बुंदेलखंड के साथ ही गढ़वाल और कुमायूं मण्डल में नहीं हैं। फिर भी दोनों कैसे देहरादून और अल्मोड़ा में तैनाती पा गए? ये अहम सवाल है। जुलाई-19 में एक पिटिशन पर नैनीताल हाई कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार से `को वारंटो’ पर पूछा है कि दोनों किस हैसियत से सेवा में हैं? इसका जवाब जीरो टालरेंस वाली त्रिवेन्द्र सरकार ने अभी तक दाखिल नहीं किया है। जो सीधा-सीधा गलत ढंग से सेवा में आए या फिर सेवा कर रहे लोगों पर सरकार की मेहरबानी है।

स्टे पर सेवा आगे बढ़ी थी, लेकिन अभी तक चल रही।

राजधानी में जहरीली शराब से 7 लोगों की पथरिया पीर मोहल्ले में मौत के बाद सुजाअत को निलंबित किया हुआ है। उसके और राहिबा के खिलाफ हाई कोर्ट गए देहरादून के वकील विकेश सिंह नेगी का दावा है कि सुजाअत जब तकनीकी रूप से सेवा में ही नहीं है तो उसको निलंबित भी आखिर कैसे किया जा सकता है? उसको तत्काल सिर्फ बर्खास्त कर अपनी गलती सुधारी जा सकती है। दोनों के खिलाफ तमाम दस्तावेज़ उनके पास है। जो उन्होंने `Newsspace’ को भी मुहैया कराए। नेगी ने एक और इंस्पेक्टर संजय रावत की आय से अधिक संपत्ति का मामला भी उठाया है। पीएमओ को लिखे पत्र में उन्होंने रावत की संपत्ति की शिकायत भी की है।

सुजाअत की तैनाती सालों से देहरादून में ही है। उनके पास शहर के ही सर्किल हैं। आबकारी महकमे को कब्जे में ले के बैठी खास लॉबी के खासमखास में उनको शुमार किया जाता है। उनको और राहिबा को 17 मई 1995 में एक साल के लिए अस्थाई/तदर्थ के तौर पर नियुक्त किया गया था। तब उत्तर प्रदेश में मुलायम सरकार थी। इस लिहाज से ठीक एक साल बाद उनकी सेवा खत्म हो चुकी हैं। उर्दू के जानकारों के भरण-पोषण के लिए ये फैसले सरकार ने तब लिए थे।  इसके बाद कभी सरकार की लापरवाही, कभी सेटिंग और कभी इलाहाबाद हाई कोर्ट के स्टे से दोनों की नौकरी धड़ल्ले से चल रही।

2007 में सुजाअत ने हाई कोर्ट में `नॉट प्रेस’ दाखिल किया और कहा कि महकमे ने उनकी मांगों को स्वीकार कर लिया है। इसके मंजूर होते ही सुजाअत पर 1995 का वह आदेश स्वतः लागू हो जाता है, जिसमें उनको और राहिबा को एक साल के लिए तैनात किया गया था। पहले की सरकारों ने जो मेहरबानी दोनों पर की सो की, लेकिन जीरो टालरेंस वाली त्रिवेन्द्र सिंह रावत की अगुवाई वाली सरकार भी दोनों के खिलाफ कोई कार्रवाई करने की जहमत उठाने को राजी नहीं है।

जैसी नजरें इनायत देहरादून, अल्मोड़ा और उधम सिंह नगर के डीईओ पर की जा रही हैं, उससे ज्यादा उर्दू अनुवादक से बने इंस्पेक्टर पर की जा रही हैं। हाई कोर्ट के को वारंटो का जवाब न दिया जाना इसकी जीती जागती मिसाल है। 

5 फरवरी 2010 में उस वक्त के प्रमुख सचिव और आबकारी आयुक्त डॉ. रणबीर सिंह ने भी एक आदेश में ये कहा कि उच्च न्यायालय का फैसला आने तक सेवा में रहेंगे। इसके बाद सरकार इस मुद्दे को भूल गई है। नेगी के मुताबिक इस मामले के शिकायत पीएमओ भी की गई है। वहाँ से भी राज्य सरकार से जवाब मांगा गया है। जो नहीं दिया जा रहा है। राज्य सरकार से भी उन्होंने जवाब मांगा है। वह इसको दबाए बैठी है।

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