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SC-HC में सरकार की खिल्ली, डांट पड़ी तो गंभीर आरोप वापिस

Tech उत्तराखंड

आरोप झूठे साबित तो प्रो.अरविंद की बहाली आदेश क्यों नहीं?  

हर जगह भद पिटवाने वाले निदेशक Mer पर कार्रवाई क्यों नहीं?

देसी शराब के ठेके की तरह चल रहा बेकायदा तकनीकी शिक्षा मंत्रालय

Chetan Gurung

ये सिर्फ सरकारी तंत्र और सरकार की खिल्ली उड़ना ही कहा जाएगा। जन्म के कुछ अरसे बाद से ही कुख्याति बटोरता रहा THDC-IHET टिहरी के काम चलाऊ निदेशक KKS Mer ने पहले तो प्रो.अरविंद कुमार सिंह को TEQUIP की BoG में प्रस्ताव ला के बर्खास्त कर दिया। जब सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कठोर फटकार पड़ी और नौबत संगीन होने की आई तो सहम के वे तीन अहम आरोप ही खत्म कर दिए जिनके कारण प्रो.अरविंद की नौकरी खाई गई थी। ताज्जुब इस पर है की हाई कोर्ट से ले के सुप्रीम कोर्ट तक सरकार की किरकिरी कराने के बावजूद Mer के खिलाफ मुख्यमंत्री (वह तकनीकी शिक्षा मंत्री भी हैं) त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कोई कठोर कार्रवाई करना तो दूर, जवाब तलब तक नहीं किया है। न ही उनसे निदेशक का जिम्मा ही वापिस लिया है।

Mer गोपेश्वर के निदेशक हैं। उनकी खुद की नियुक्ति दागदार है। एसोसिएट प्रोफेसर होने के बावजूद उनको पौड़ी से गोपेश्वर भेज के निदेशक बनाया गया। फिर पाँच साल गुजरने के बावजूद उनको प्रतिनियुक्ति पर पक्का निदेशक बना दिया गया। फिर जब जीएस तोमर को THDC-आईएचईटी से हटाया गया तो उनको टिहरी भी सौंप दी। वहाँ काम चलाऊ होने के बावजूद उन्होंने कॉलेज की TEQUIP की BoG बुला के प्रो. सिंह को बर्खास्त कर दिया। इस BoG को न तो ये अधिकार था न ही ये बैठक के एजेंडे का हिस्सा था। खुद BoG के प्रमुख डॉ. कोठारी ने कार्रवाई पर अंगुली उठा दी थी। डॉ.सिंह की बर्खास्तगी सिर्फ इस बात की मिसाल कही जा सकती है कि तकनीकी शिक्षा महकमा अब परचून या देसी शराब के ठेके की तरह चल रहा है। जहां कोई कायदा-कानून नहीं।

कामचलाऊ निदेशक को कभी भी ऐसे अहम और बड़े ही नहीं नीति आधारित फैसले लेने या कराने के हक नहीं होते हैं। इस फैसले ने सरकार और मुख्यमंत्री की प्रशासनिक छवि को धक्का पहुंचाया। ऐसा कहना बिल्कुल भी अतिश्योक्ति नहीं है। डॉ.सिंह पर जो आरोप लगे थे, उनमें उनको पोस्ट के विपरीत अयोग्य होना, पोस्ट ही सृजित न होना और नियुक्ति ही गड़बड़ भी शामिल थे। ये बर्खास्तगी आदेश 30 अगस्त 19 को जारी किया गया था। इसके बाद जब राज्य और देश की सर्वोच्च अदालत में सरकार के साथ ही यूटीयू और THDC-IHET प्रबंधन की जबर्दस्त खिंचाई हुई तो कॉलेज प्रबंधन ने पलटी मार ली है। अब कामचलाऊ निदेशक Mer ने 22 अक्टूबर 19 को प्रो. अरविंद को फिर चिट्ठी जारी की है।

इस चिट्ठी में उन्होंने ये तीनों बड़े और अहम आरोप वापिस ले लेने की जानकारी डॉ. अरविंद को दी है। अब सवाल ये उठ रहा है कि अगर तीनों अहम आरोप ही वापिस हो गए तो फिर प्रो.अरविंद की बर्खास्तगी क्यों और कैसे हो गई? क्यों उनको तत्काल बहाल नहीं किया जा रहा है? अब जो आरोप उन पर हैं, वे न सिर्फ हास्यास्पद हैं बल्कि अदालत में शायद ही टिक सके। मसलन, अरविंद पर आरोप हैं कि उनके पढ़ाने की काबिलियत संतोषजनक नहीं है। कॉलेज के खिलाफ गतिविधियां रहती हैं। अनुशासन ठीक नहीं हैं। ये आरोप उस प्रोफसर पर हैं, जिन्होंने आठ साल के कार्यकाल में से साढ़े पाँच साल तो सिर्फ जबरन-तानाशाहीपूर्ण निलंबन में गुजर दिए। जो कॉलेज में ही न रहे हों, उन पर ये आरोप भला कैसे व्यावहारिक कहे जा सकते हैं?

अगर ये आरोप सही भी हैं तो सिर्फ अनुशासनहीनता के मामले में सीधे फर्जी BoG के जरिये कैसे किसी स्थायी प्रोफेसर की नौकरी छीनी जा सकती है? अनुशासनहीनता का आरोप है भी तो कॉलेज प्रबंधन ने क्यों प्रो.सिंह को कोई कारण बताओ नोटिस नहीं दिया? इसके साथ ही THDC जो कि कॉलेज की वास्तविक मालिक है, ने RTI में साफ कहा है कि कॉलेज आज भी उस MoU से चल रहा है,  जो उसके और राज्य सरकार के बीच हुआ है। सरकार और कॉलेज प्रबंधन पर MoU के खिलाफ जा के काम करने के आरोप हैं। कामचालू निदेशक पाँच महीने में सिर्फ पाँच दिन कॉलेज आए। दो बार स्टाफ से भीषण झगड़ा कर बैठे। अदालतों में सरकार के छीछालेदर और विवादित निदेशक होने के बावजूद Mer पर सरकार की नजरें ईनायत सिर्फ और सिर्फ मुख्यमंत्री के लिए अपयश और विरोधियों को संबल प्रदान करने का कारण बन रहा है।

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