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सुप्रीम कोर्ट ने मंजूर किया CAU की मान्यता पर दायर वाद

उत्तराखंड खेल

27 नवंबर को पहली सुनवाई होगी, तारीख तय की

उत्तराखंड क्रिकेट में भूचाल के आसार कायम

उत्तरांचल क्रिकेट एसोसिएशन को मिल सकता है उत्तराखंड CA का साथ

Chetan Gurung

सुप्रीम कोर्ट से बड़ी खबर उत्तराखंड क्रिकेट को ले कर आई। देश की सर्वोच्च अदालत ने मान लिया कि क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड पर धांधली करने और कायदों-कानून को तोड़ने के जो आरोप लगे हैं, उनमें दम है, और इस पर सुनवाई जरूरी है। अदालत ने तकरीबन 10 मिनट की बहस के बाद ही यूसीए के तरफ से दर्ज वाद को स्वीकार कर लिया। अगले महीने ही 27 नवंबर को सुनवाई की तारीख भी दे दी गई है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद एक बार फिर उत्तराखंड क्रिकेट में भूकंपीय हलचल तय है। ये माना जा रहा है कि CAU को इस सुनवाई के दौरान काफी कठिन पलों से गुजरना पड़ेगा।

खास तौर पर ये देखते हुए कि दस्तावेजी मामलों में CAU का पलड़ा बाकी अन्य उन सभी एसोसिएशन के मुक़ाबले बहुत हल्का है, जो BCCI संबद्धता की लड़ाई में थे। देखा जाए तो अंशुमन गायकवाड और सबा करीम की रिपोर्ट भी CAU के खिलाफ थी। उसको सबसे बड़ा फायदा अगर मिला तो राज्य सरकार की तरफ से मिली आर्थिक मदद की चिट्ठी और समर्थन का। ये बात अलग है कि मान्यता मिलने के बाद पहले विजय हज़ारे ट्रॉफी मैच में न तो मुख्यमंत्री और न ही खेल मंत्री या खेल सचिव को ही राजीव गांधी स्टेडियम में देखा गया।

उनकी जगह दिखे UPCA के निदेशक और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला तथा यूपी रणजी टीम के चयन में दलाली के कारण कुख्याति बटोरने वाला सहारनपुर का ही शख्स, जो शुक्ला के बहुत करीबी कहा जाता है। इतना ही नहीं CAU के कर्ता-धर्ताओं के साथ दशकों गुजारने और कंधे से कंधा मिला के खड़े होने-साथ देने वालों को भी इस मौके पर देखा नहीं गया था। इसके बाद एक के बाद एक आरोपों की तूफानी बौछार CAU पर इस कदर हुई है कि आज देश भर में सिर्फ CAU की चर्चा है। CAU के सचिव माहिम वर्मा और उनके पिता पीसी वर्मा पूरी तरह सिर्फ शुक्ला के साथ दिखते हैं। सूत्रों के अनुसार माहिम को बीसीसीआई उपाध्यक्ष की कुर्सी शुक्ला ने सिर्फ इस लिए दिलवाई कि वह जो चाहेंगे, वही होगा। बाद में क्या होता है, ये भले भविष्य ही जानता है।

सुप्रीम कोर्ट में UCA की तरफ से पेश अधिवक्ता की दलील के बाद आज जैसे ही मामला सुनवाई योग्य मान लिया गया, क्रिकेट जगत में हलचल शुरू हो गई है। सुनवाई का मतलब है कि CAU के एक-एक पन्ने और दस्तावेजों की बारीकी से जांच और परीक्षण होंगे। इसमें राज्य सरकार भी पार्टी बनेगी, ये तय है। रजिस्ट्रार ऑफिस में जमा दस्तावेजों में बहुत घालमेल होने से CAU के लिए सर्वोच्च अदालत के सामने पैरवी करना और दलीलें पेश करना इतना आसान नहीं होगा। ये मामला तो सीधे ही धोखाधड़ी का हिस्सा बन सकता है कि माहिम ने सदस्य भी होने से पहले उन दस्तावेजों पर दस्तखत किए, जिसमें राजीव शुक्ला, सुधीर शुक्ला, यतीन्द्र कुमार, रविनाथ रमन, हरबंस कपूर सदस्य बनाए गए थे।

ये सभी दस्तावेज़ `Newsspace’ के पास हैं। इसके साथ ही माहिम साल 2008 में संयुक्त सचिव बनाए गए। वह तब भी सदस्य नहीं थे। फिर अगले साल 2009 में वह विधिवत सदस्य बने। जो खुद सदस्य तक नहीं, वह एसोसिएशन के दस्तावेजों पर कैसे दस्तखत कर रहे थे? सुप्रीम कोर्ट में ये मामला भी प्रमुखता के साथ रखा जा रहा है कि जो नौकरशाह सरकार में खेल सचिव और निदेशक हो, वही एसोसिएशन में भी उपाध्यक्ष कैसे रहे। फिर कैसे उसी एसोसिएशन को सरकारी अनुदान मिला, जिसमे वह पदाधिकारी थे। ये मामला भी तेजी पकड़ गया या सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गंभीरता दिखाई तो CAU पर तो जो असर पड़ेगा, वह पड़ेगा ही। उत्तराखंड क्रिकेट में एक बार फिर भारी उथल-पुथल दिखनी तय है।

इस बात की संभावना भी जताई जा रही है कि जो उत्तरांचल क्रिकेट एसोसिएशन अकेले सुप्रीम कोर्ट गई है, उसको उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन का समर्थन भी मिल सकता है। उस सूरत में दोनों एसोसिएशन मिल के कोर्ट में उतर सकती है, जो CAU के लिए काफी परेशानी का आलम पैदा कर सकता है। फिलहाल, दोनों एसोसिएशन अलग-अलग काम कर रही हैं और उम्मीदों का दामन छोड़ा नहीं है। CAU के लिए ये मुकदमा जीतना इसलिए भी जीने-मरने का सवाल है कि ऐसा न होने पर सिर्फ उसकी ही नहीं राजीव शुक्ला की अपनी क्रिकेट सियासत भी ध्वस्त हो जाने का खतरा रहेगा।    

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