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खट्टर-फड़नवीस पर फैसले से त्रिवेन्द्र और मजबूत!

उत्तराखंड राजनीती

The Corner View

Chetan Gurung

महाराष्ट्र और हरियाणा में बीजेपी की दशा विधान सभा चुनाव में सोच-योजना के विपरीत रही। इसके बावजूद पीएम नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का यकीन न तो देवेन्द्र फड़नवीस और न ही मनोहरलाल खट्टर पर कम हुआ। खट्टर तो मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले चुके हैं। हरियाणा में सरकारी तंत्र के लिजलिजेपन और नाकामयाबियों के चलते बीजेपी रणनीति-इच्छा के अनुरूप नतीजा हासिल नहीं कर पाई। महाराष्ट्र में भी ऐसा ही हुआ। देवेन्द्र पार्टी नेतृत्व को बेहतर नतीजा देने में असफल रहे। उल्टे बीजेपी के खाते से कई सीटें चुनाव में छिन गईं। बीजेपी-शिवसेना में लफड़ा निबट गया, जैसा कि बीजेपी चाहती है, तो देवेन्द्र ही महाराष्ट्र के एक बार फिर भाग्य विधाता बनेंगे। ये तय है।

अब ये सब क्यों लिख रहा हूँ मैं? आखिर महाराष्ट्र-हरियाणा चुनाव नतीजों से उत्तराखंड का क्या मतलब! जिनको सियासत की करीबी समझ है। या फिर जो बीजेपी की नीतियों को भली-भांति देखते-समझते और उसके विश्लेषण करते हैं, उनके पास इसका जवाब जरूर होगा। साथ ही मोदी-शाह पर जिन लोगों ने करीबी निगाहें रखी हैं, वे भी जानते हैं। खट्टर-देवेन्द्र पर मोदी-शाह का यकीन चुनावों में खराब नतीजों के बावजूद बना रहना उत्तराखंड में मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के लिए बहुत ही सकारात्मक कहा जा सकता है। उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाने की चर्चाओं को कमजोर करेगा। उनके विरोधियों को हतोत्साहित करेगा।

सियासी समीक्षकों की राय पर ध्यान देना चाहिए। उनका मानना है कि मोदी-शाह इस बात को कभी स्वीकार नहीं करेंगे कि उनके तय किए मुख्यमंत्री खट्टर और सीएम के फिर से दावेदार देवेन्द्र पर नाकामी के कारण हटने का ठप्पा लगे। इससे उन पर ज्यादा बड़ा दाग लगेगा। चारों ओर ये संदेश जाएगा कि मुख्यमंत्री के चयन में वे चूक कर गए थे। वे ऐसा कभी नहीं चाहेंगे। खट्टर ने नाकामयाब सरकार चलाई। फिर भी उनको दुबारा सरकार चलाने का मौका मिलना इसी समीकरण के चलते मुमकिन हुआ। देवेन्द्र का भी ये ही हाल रहा। देश में काँग्रेस के बुरी तरह गिरते ग्राफ का फायदा वह पार्टी को नहीं दिला पाए। एनसीपी को ले के समीक्षकों की राय चुनाव पूर्व एकदम नकारात्मक रही। फिर भी चुनावी नतीजों की तस्वीर बिगड़ गई। देवेन्द्र पार्टी को पिछली बार के बराबर सीट भी नहीं दिला पाए।

इस बात की पूरी संभावना है कि शिवसेना आखिरकार बीजेपी के साथ ही मिल के सरकार बनाएगी। तब देवेन्द्र ही फिर मुख्यमंत्री बनेंगे। भले विकल्प के तौर पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का नाम भी लिया जा रहा है। इन मिसालों के बाद ये कहीं से नहीं लग रहा कि पार्टी हाई कमान और मोदी-शाह आने वाले दिनों में उत्तराखंड को ले कर भी बड़ा सियासी फैसला करेंगे। वे त्रिवेन्द्र को हटा के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर किसी नए चेहरे को ले कर आएंगे, इस संभावना की रोशनी कहीं नहीं दिख रही है। जो नीति उन्होंने हरियाणा में लागू की। महाराष्ट्र में लागू करना चाह रहे, वही नीति वह उत्तराखंड में अमल में नहीं लाएँगे, ऐसा समीक्षक नहीं देख रहे। मौजूदा संदेश-ध्वनि तो ये ही है कि त्रिवेन्द्र की कुर्सी को खतरा नहीं है।

त्रिवेन्द्र सरकार पर बेशक फैसले करने में सुस्ती बरतने, शराब, ऊर्जा, खनन, पीडब्ल्यूडी, तकनीकी शिक्षा में कई बड़े भ्रष्टाचार के मामलों में कोई कदम न उठाने के आरोप लग रहे हैं। शराब महकमे में अरबों रुपए के घोटाले के बावजूद किसी को भी सींखचों के पीछे भेजने की कार्रवाई नहीं हुई। इसके विपरीत वे अफसर ऐश-मौज काट रहे, जिन पर घोटालों को अंजाम देने के आरोप सप्रमाण लगे। देहरादून, उधम सिंह नगर, नैनीताल, पौड़ी और हरिद्वार के जिला आबकारी अधिकारियों पर बड़े-बड़े घोटालों को अंजाम देने को ले के अंगुलियाँ उठी। इसके बावजूद एक भी अफसर के खिलाफ कोई कदम उठाना तो दूर, किसी को निलंबित या अहम कुर्सियों से हटाने का हौसला भी त्रिवेन्द्र नहीं दिखा सके।

मुख्यमंत्री ही शराब महकमे के भी मंत्री हैं। अंदाज है कि खराब और असफल शराब नीति के कारण सरकार को 10 अरब रुपए का घाटा हुआ। नीति का ड्राफ्ट बनाने और इसको हरी झंडी देने वाले अफसर मुख्यालय-शासन में आराम से बैठे हैं। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर मुख्यमंत्री के सामने ऐसी क्या मजबूरी है जो शराब घोटालों और गड़बड़ियों पर आँखें मूँद बैठे हैं। दाग तन में लगाने को राजी हैं, पर दागियों पर कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। ये वही मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस का नारा दिया हुआ है।

बहुचर्चित एनएच-74 घोटाले में आईएएस अफसरों तक पर निलंबन से नहीं हिचके। तो क्या शराब के छोटे अफसर तक आईएएस अफसरों से अधिक रुतबा रखते हैं? मुख्यमंत्री पर असर रखते हैं?आए दिन ऊर्जा निगम में घोटालों और अनियमितताओं के आरोप लगते हैं। उसके साथ ही खनन महकमा भी कमाई का प्रमुख स्रोत है। फिर भी दोनों घाटे में है। तकनीकी शिक्षा बेहाल हो चुकी है। उत्तराखंड तकनीकी विवि अपनी प्रतिष्ठा खो चुका है। छवि नकारात्मक हो चुकी है। उससे सम्बद्ध सरकारी-संघटक और एमओयू से संचालित हो रहे कॉलेजों के निदेशकों की नियुक्तियों में भारी अनियमितता सामने आ चुकी हैं। सरकार एक भी कार्रवाई इस संबंध में करने को राजी नहीं दिख रही।

इस महकमे में तानाशाही का आलम दिख रहा। टीएचडीसी-आईएचईटी टिहरी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.अरविंद कुमार सिंह को जिस तरह जबरन बर्खास्त किया गया, वह आने वाले दिनों में सरकार के लिए गले की फांस बन सकता है। ये हैरानी से कम नहीं है कि खुद सरकार और कॉलेज के बोर्ड ऑफ गवर्नर के अध्यक्ष मान रहे हैं, कि डॉ.अरविंद को बर्खास्त कर के गलती हो गई। ऊर्जा और तकनीकी शिक्षा भी मुख्यमंत्री के पास ही हैं। इसके साथ ही उन पर शराब की डिस्टलरी और बॉटलिंग प्लांट्स को मंजूरी दे के पहाड़ की भावनाओं से खिलवाड़ के आरोप हैं। इसके साथ ही कई अन्य किस्म के आरोप त्रिवेन्द्र पर लगते रहे हैं। कानून-व्यवस्था और चिकित्सा-स्वास्थ्य के मामले में ढिलाई को ले के भी। ये ही वजह है कि ये चर्चा गाहे-बागाहे उड़ती या फिर उड़ाई जाती रहती है कि त्रिवेन्द्र के विकल्प की खोज शीर्ष स्तर पर शुरू हो गई है।

कुछ लोग पार्टी के प्रवक्ता और राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी का नाम उनके विकल्प के तौर पर उड़ाते रहते हैं। बलूनी की सक्रियता भी उत्तराखंड को ले के देखते ही बनती है। त्रिवेन्द्र पर अंगुली उठाने वाले यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रदर्शन पर भी नजर रखे तो बेहतर होगा। सच्चाई ये है कि उनका प्रदर्शन और खराब आँका जा रहा है। फिर भी उनको बदलने की बात दूर-दूर तक नहीं है। ये सब देखते हुए एक ही निष्कर्ष दिख रहा है। वह ये कि खट्टर-फड़नवीस पर बीजेपी हाई कमान और मोदी-शाह की नीति त्रिवेन्द्र को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर और मजबूती से फिक्स कर सकती है।

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