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रूड़की जहरीली शराब नरसंहार:जीरो टालरेंस की धज्जियां

उत्तराखंड
मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के जीरो टालरेंस पर सवाल

ऐलान के 7 महीने बाद तक जांच अधिकारी ही नियुक्त नहीं

जिसको जांच सौंपी उसको DEO बना नैनीताल भेज दिया

संयुक्त आयुक्त पंत 17 साल से देहरादून में ही

DEO उपाध्याय पर हाथ डालने का दम सरकार में नहीं!

इंस्पेक्टर शुजआत-राहिबा आखिर सेवा में कैसे?

सरकार में दबी हुई है डीईओ-इंस्पेक्टर की तबादला फ़ाइल

Chetan Gurung

इस साल फरवरी में रूड़की और सटे हुए यूपी के सहारनपुर में 100 से ज्यादा मौत सिर्फ जहरीली शराब पीने से हो गई थी। उत्तराखंड की त्रिवेन्द्र सरकार पर हमेशा के लिए ये बदनुमा धब्बा कहा जाएगा। हैरानी की बात ये है कि इतने बड़े कांड की जांच सात महीने तक शुरू ही नहीं की गई। लोगों को इस बारे में सरकार गुमराह करती रही कि जांच शुरू हो गई है। जब एक वकील विकेश नेगी ने RTI लगाई तब जा के इस साजिश कहो या फिर सरकार की जबर्दस्त लापरवाही, का खुलासा हुआ। गज़ब ये है कि जिस जांच अधिकारी राजीव चौहान ने काम शुरू भी नहीं किया, उसको नैनीताल में डीईओ की प्राइज़ पोस्टिंग दे दी गई।

रूड़की में जब जहरीली शराब पी के मौतों का सिलसिला शुरू हुआ तो पूरे देश की मीडिया का ध्यान इस पर गया था। यूपी और उत्तराखंड सरकार के लिए ये बहुत बड़ी नाकामी थी। यूपी सरकार ने तो फिर भी काफी बड़ी तादाद में न सिर्फ अफसरों को निलंबित किया बल्कि जांच भी शुरू करा दी। उत्तराखंड सरकार ने जांच का ऐलान भर किया। कुछ पुलिस और आबकारी अफसरों-कार्मिकों को निलंबित जरूर किया। जांच के बाद जब रिपोर्ट आई नहीं तब इसकी प्रगति जानने के लिए अधिवक्ता नेगी ने आरटीआई लगाई। इसमें जहरीली शराब मौत कांड के सात महीने गुजर जाने के बाद जवाब मिला कि जांच अभी शुरू तक नहीं हुई है। अब इसकी जांच अन्य अधिकारी को सौंपी गई है। आज आठ महीने के बाद भी रूड़की जहरीली शराब मौत कांड की रिपोर्ट सरकार के पास नहीं है।

इस कांड से सरकार और उत्तराखंड के बदनामी देश भर में हुई। विपक्षी दलों और मीडिया ने इसको नरसंहार का दर्जा दिया। सरकार आखिर इस मामले को क्यों गंभीरता से नहीं ले रही या फिर क्यों मामले को दबवाने का आरोप सहने को तैयार है, समझ से बाहर है। आरोप हैं कि शराब लॉबी और कुछ सियासी नेता, जो बीजेपी और मुख्यमंत्री के भी करीबी हैं, को इन दागी अफसरों ने अपने मोहपाश में बांधा हुआ है। इसका ही असर समझा जा रहा है कि मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस के अपने नारे को गड्ढे में डालने और बदनामी का दामन ओढ़ने तक से परहेज नहीं कर रहे हैं।

तमाम घोटालों-धांधलियों, सरकारी खजाने को अरबों का चूना लगाने के कारण बदनाम शराब महकमा न तो सुधरता दिख रहा, न सरकार ही इस दिशा में कुछ सुधारात्मक उपाय में दिलचस्पी दिखाती नजर आ रही है। सीधे मुख्यमंत्री की देखरेख में चल रहा ये मंत्रालय सबसे बर्बाद और भ्रष्ट साबित हो चुका है। महकमे में क्या नहीं हो रहा? पॉलिसी ऐसी बनाई गई, जिसने सरकार को 1000 करोड़ के नीचे ला दिया। दुकानों को बिना लाइसेन्स शुल्क के, बहुत कम कीमत पर सौंप दिया गया। पिछले साल के डिफ़ाल्टर्स को भी दुकानें दे दी गईं।

शुजआत हुसैन, राहिबा सरीखे उर्दू अनुवादक इंस्पेक्टर बन के सत्ता चला रहे, जबकि अदालत उनके खिलाफ फरमान दे चुकी हैं। वे सेवा में ही नहीं रह सकते। देहरादून के DEO मनोज उपाध्याय के खिलाफ रिपोर्ट पर रिपोर्ट आ रहीं। पथरिया पीर जहरीली शराब कांड-मौतों के बावजूद इस अफसर पर हाथ डालने की हिम्मत सरकार की नहीं हो रही। पुलिस और शराब महकमे में ही कई अफसरों पर भले गाज गिरी। त्रिवेन्द्र सरकार के जीरो टालरेंस पर उपाध्याय दाग बन के सवार है। महकमे में जिस संयुक्त आयुक्त को शराब पॉलिसी बनाने का जिम्मा सौंपा गया था। तीन सीनियर अफसरों के बावजूद जो महकमे में वर्चस्व कायम रखे हुए है, उसके खिलाफ भी सरकार मुंह बाएँ खड़ी है।

न मुख्यमंत्री न ही प्रमुख सचिव और आबकारी आयुक्त ये जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर पॉलिसी ऐसी कैसे बन गई, जो इतना बड़ा झटका सरकार को दे गई। इस सवाल का जवाब भी सरकार को देना चाहिए कि आखिर देहरादून के DEO उपाध्याय से क्या लाड़ है? क्यों उनकी हर शिकायतों और भ्रष्टाचार तथा घोटालों को आँख मूँद के मंजूरी दी जा रही है? मुख्यालय में बैठे संयुक्त आयुक्त टीके पंत ही महकमे के सर्वेसर्वा किस्म के बने हुए हैं। पिछले 17 सालों से वह देहरादून कैसे जमे हुए हैं? इंस्पेक्टर से ले के आज तक वह राजधानी में ही हैं। क्या उनके लिए तबादला नियमावली जैसा कोई नियम नहीं है?

आबकारी महकमे को तबादला कानून से बाहर रखने में एक बड़ी वजह ये भी बताई जाती है। कुछ अफसरों को देहरादून से बाहर न जाने देने के लिए जोड़-तोड़ कर ये खेल सफाई से किया गया। साथ ही डीईओ और इंस्पेक्टर्स के तबादलों में मोटा खेल चलने के कारण भी तबादला कानून को महकमे से दूर रखा गया। सीनियर और अपर आयुक्तों की मौजूदगी के बावजूद पॉलिसी और तबादला ड्राफ्ट बनाने में पंत की अहम भूमिका रहती है। सरकार पर ये भी आरोप लग रहे हैं कि डीईओ और इंस्पेक्टर्स के तबादलों की फ़ाइल पर अभी तक मंजूरी न दिए जाने की वजह सेटिंग का खेल चालू होना है। मुख्यमंत्री इस फ़ाइल को कब मंजूरी देते हैं, इस पर सभी की नजरें हैं।

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