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उत्तराखंड क्रिकेट:आसान नहीं CAU के लिए सुप्रीम कोर्ट में बचना

उत्तराखंड खेल देहरादून

दस्तावेजों में हेर-फेर पर मुश्किलों में घिर सकते हैं कर्ता-धर्ता

CEO-चयनकर्ताओं-प्रशिक्षकों की नियुक्तियों पर भी जवाब देना होगा

इसी महीने 27-28 नवंबर को है सर्वोच्च अदालत में सुनवाई

विवादों के महासागर में डूबे हुए हैं उत्तराखंड क्रिकेट के माई-बाप

Chetan Gurung

सुप्रीम कोर्ट में ये महीना उत्तराखंड क्रिकेट के लिए भी बेहद अहम है। खास तौर पर राज्य में क्रिकेट को ठेकेदारी के अंदाज में चला रहे क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के ओफिशियल्स के लिए सर्वोच्च अदालत में ये जवाब देना बहुत भारी पड़ेगा कि आखिर उन्होंने तमाम दस्तावेजों में इस कदर भारी हेर-फेर क्यों की? क्यों रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटी ऑफिस में स्ंदिग्ध सूचनाएँ और दस्तावेज़ जमा किए? इसका जवाब देना भी बहुत भारी पड़ेगा कि आखिर CEO की कुर्सी पर अमृत माथुर के नियुक्ति किसने की? इसके लिए क्या प्रक्रिया अपनाई गई?

इसके साथ ही चयनकर्ताओं और प्रशिक्षकों के साथ ही मैनेजरों की नियुक्ति और खिलाड़ियों के चयन की प्रक्रिया पर भी सवाल उठने की पूरी संभावना है। संदेह जताया जा रहा है कि CAU के पास इन कठिन सवालों के जवाब शायद ही हों। CAU ने रजिस्ट्रार ऑफिस में जो दस्तावेज़ जमा किए, उनमें तमाम खामियां सामने आ रही हैं। जिस सूची को ले के CAU के चुनाव हुए, वही शक के दायरे में आ गई हैं। खास तौर पर बीजेपी विधायक और साल 2004 में आजीवन सदस्य बनाए गए हरबंस कपूर के इस बयान के बाद कि उनको न सदस्य बनाए जाने और न निकाले जाने (अगर निकाला है) और न ही CAU के चुनाव होने की कोई जानकारी है।

CAU ने जो सूची रजिस्ट्रार ऑफिस में जमा की है, उसमें और भी कई विसंगतियाँ हैं। एसोसिएशन के लोगों को शायद अंदाज नहीं था कि परचून या पान की दुकान के अंदाज से BCCI की राज्य ईकाई को चलाना आसान नहीं होगा। CAU पर आरोप है कि उसके सचिव माहिम वर्मा और उनके पिता पीसी वर्मा पूरी तरह UPCA के ईशारे पर काम कर रहे हैं। विजय हज़ारे ट्रॉफी, मुश्ताक अली ट्रॉफी और अन्य प्रतियोगिताओं के ट्रायल बेदाग-अविवादित नहीं रहे। CEO अमृत माथुर और चयनकर्ता कहाँ से आए? किसने उनको नियुक्त किया? क्या प्रक्रिया अपनाई गई?

इसका जवाब CAU में किसी के पास नहीं है। अध्यक्ष जोत सिंह गुनसोला कुछ और बोल रहे और पूर्व अध्यक्ष हीरा सिंह बिष्ट कुछ और। आलम ये है कि कुर्सी और ताकत की लड़ाई CAU में छिड़ चुकी है। अध्यक्ष और पूर्व अध्यक्ष एक तरफ हैं। दूसरी तरफ पिता-पुत्र की जोड़ी और यूपी लॉबी है। माहिम को जिस तरह बीसीसीआई भवन और अन्य स्थानों पर यूपीसीए के राजीव शुक्ला के साथ हर पल देखा गया, उससे आरोप सही लगते हैं कि शुक्ला ही उत्तराखंड क्रिकेट को पर्दे के पीछे से चलाने की कोशिश कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट में CAU पर लगे उत्तरांचल और उत्तराखंड क्रिकेट संघ के आरोपों से ही दिक्कत नहीं होगी। अब भंग कर दी गई विनोद राय की अध्यक्षता वाली CoA की रिपोर्ट भी CAU के लिए संकट बन सकती है। CoA ने भी तमाम गंभीर आरोप CAU पर लगाए थे। साथ ही माहिम के BCCI में प्रतिनिधित्व को ही नामुमकिन बताया था। इसके बावजूद माहिम न सिर्फ बीसीसीआई उपाध्यक्ष चुने गए, बल्कि आज तक भी CAU के सचिव की कुर्सी न छोड़ के दोहरे पद पर जमे हुए हैं। ये भी मुद्दा याची एसोसिएशन को मजबूती प्रदान करेगा।

इस महीने सुप्रीम कोर्ट कुछ न कुछ फैसला या तदर्थ आदेश जरूर देगा, ऐसा यकीन किया जा रहा है। ये भी मुमकिन है कि तमाम सुबूतों और मसलों को देखते हुए CAU को सुप्रीम कोर्ट में कहीं कड़वे फैसले या आदेश का सामना न करना पड़े।

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