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आबकारी:पिथौरागढ़ की तेजी देहरादून में खत्म क्यों?

उत्तराखंड देहरादून
मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के जीरो टालरेंस पर सवाल

इंस्पेक्टर डंगवाल सस्पेंड,DEO उपाध्याय पर साँप सूंघ जाता!

जांच पर जांच, कार्रवाई सिफर

ऐसे कैसे भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस साबित होगा त्रिवेन्द्र जी?

Chetan Gurung

सरकार ने पिथौरागढ़ में अवैध रूप से धुलान हो रही 616 पेटी अंगरेजी शराब पकड़ी जाने के बाद हलके के आबकारी इंस्पेक्टर भुवनचन्द्र डंगवाल को सस्पेंड कर दिया। महीने भर के भीतर जांच कर मामले को एक किस्म से निबटा भी दिया गया। ऐसी रफ्तार अगर सरकार के पास है तो फिर देहरादून में उसको साँप क्यों सूंघ जा रहा? इसका जवाब मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत और जिम्मेदार अफसरों से क्यों न मांगा जाना चाहिए?

FL-2 की जो शराब अवैध रूप से अन्य दुकानों में ले जाई जा रही थी, उसको असकोट (पिथौरागढ़) में पुलिस ने पकड़ा। इसमें माल ले के जा रहे ट्रक के मालिक, चालक और क्लीनर को भी आरोपी बनाया गया है। पुलिस जांच में आबकारी इंस्पेक्टर डंगवाल फंसे तो सरकार ने अविश्वासनीय गति दिखा के वाहवाही लूटने की कोशिश की। डंगवाल ने गलत किया था, ये शुरुआती जांच में खुलासा हुआ है। उसने फर्जी दस्तावेज़ बना के दुकान का बचा हुआ स्टॉक FL-2 के बजाए अन्य दुकानों में भेजने की साजिश में हिस्सेदारी की थी।

आबकारी महकमा, जो पहले ही तमाम कालिख तन पर मले हुए है, ने जैसी फटाफट कार्रवाई इस मामले में की, उससे शक का बड़ा घेरा उस पर आ पड़ रहा है कि आखिर ऐसी कार्रवाई करते समय वह पिक एंड चूज की नीति कैसी अपना सकती है? देहरादून में शराब की दुकानों को घाटे में उठवाने, लाइसेन्स फीस, सिक्योरिटी फीस, बैंक गारंटी न लेने वाले और पथरिया पीर जहरीली शराब कांड के दागी जिला आबकारी अधिकारी मनोज उपाध्याय पर कार्रवाई के नाम पर न तो कलेक्टर सी रविशंकर, न आबकारी आयुक्त सुशील कुमार, न प्रमुख सचिव आनंदबर्द्धन और न ही मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ही कुछ कर पा रहे हैं।

जिस संयुक्त आयुक्त ने आबकारी नीति बनवाई, और सरकार सीधे 1000 करोड़ के घाटे की खाई में जा गिरी, फिर कई दुकानें बंद करवा के खुली दुकानों में खेल कर गया, उसको ही आँख का तारा बनाया जाना भी तो सरकार को आरोपों से दूर नहीं जाने देता। महकमे में तीन अपर आयुक्तों के बावजूद जूनियर अफसर पर सरकार की मेहरबानी किसी के पल्ले नहीं पड़ रही है। खास तौर पर जब प्रदेश के हर बदनाम और दागी DEO-इंस्पेक्टर्स इसी संयुक्त आयुक्त के चेले और लॉबी से जुड़े हुए हैं। हर घोटाले में इसी अफसर और उसकी लॉबी के लोगों का नाम प्रमुखता से आता रहता है।

उपाध्याय का किस्सा तो हातिमताई सरीखा है। जिसमें जितना घुसो उतनी उलझनें हैं। पिछले ACS (आबकारी) डॉ.रणबीर सिंह ने इस DEO को रिटायर होने से पहले चार्जशीट खारिज कर क्लीन चिट चुपचाप दे डाली थी। उन्होंने लिखा कि सरकार ने जो आरोप उपाध्याय पर लगाए थे, उनमें बल नहीं पाया गया। ये निष्कर्ष उन्होंने जांच अधिकारी की नियुक्ति किए बिना खुद निकाला। इस क्लीन चिट पर भी जांच बैठनी चाहिए। कायदे से। मौजूदा प्रमुख सचिव (आबकारी) आनंदबर्द्धन भी लगता है किसी तरह के दबाव में हैं। इस मामले में। उनकी छवि-प्रतिष्ठा उससे अलग है, जैसा हो रहा है।

अभी तक DEO उपाध्याय और शुजआत हुसैन, राहिबा, संजय रावत सरीखे इंस्पेक्टर्स पर कोई कार्रवाई न करना, अल्मोड़ा, पौड़ी और उधमसिंघ नगर के डीईओ पर नजरें इनायत भी हैरान कर रही हैं। इन सभी के खिलाफ तमाम ठोस आरोप हैं। उपाध्याय के खिलाफ तो महकमे की जांच रिपोर्ट एक तो आ चुकी है। इसमें तमाम घोटालों और अनियमितताओं की पुष्टि हुई है। जिलाधिकारी रविशंकर के स्तर पर भी जांच हुई। अभी एक और जांच अपर आयुक्त पीएस गर्ब्याल भी कर रहे हैं। इस सबके बावजूद डीईओ बने रहने के लिए उपाध्याय की दिलेरी को सलाम करने का जी भला किसका नहीं करेगा? सरकार की जीरो भ्रष्टाचार के नारे पर कौन नहीं हैरान होगा? पथरिया पीर मौत कांड में पुलिस के लोग सस्पेंड हो के बहाल भी हो गए। डीईओ का बाल भी बांका नहीं हुआ।

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