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म्यांमार में राकेश शर्मा का जलवा:विद्रोहियों से आवभगत कराई, पालकी में लौटे

उत्तराखंड देहरादून

पूर्व मुख्य सचिव और कर्नल कोठियाल का अन्य के साथ किया था अपहरण

`Newsspace’ के साथ बांटे हिरासत के रोमांचक अनुभव

Chetan Gurung

म्यांमार के क्याकटो शहर के करीब विद्रोही गुट अराकान आर्मी के हाथों अपहृत होने के बावजूद उत्तराखंड के पूर्व मुख्य सचिव राकेश शर्मा ने न सिर्फ होश और हौसला बनाए रखा बल्कि वापसी में उनकी पालकी का लुत्फ भी उठाया। इस हादसे में एक भारतीय कंसल्टेंट वीनू गोपाल की विद्रोहियों की हिरासत के दौरान दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से मौत हो गई। 3 नवंबर (इसी महीने) को शर्मा और 10 अन्य लोगों का अपहरण तब कर लिया गया था, जब वे जेट स्पीड बोट से पलेटेवा से क्याकटों लौट रहे थे। उनके साथ स्थानीय सांसद यू वे टिन (चिन प्रांत) भी दूसरी बोट पर थे। उनको भी पकड़ लिया गया।

तकरीबन 9 घंटे तक विद्रोहियों के चंगुल में रहे शर्मा ने `Newsspace’ से उस रोंगटे खड़े करने वाले हादसे का जिक्र करते हुए कहा-`हमको उन्होंने गलतफहमी में और कुछ हद तक चेतावनी देने के लिए अपहृत किया कि उनकी मंजूरी के बगैर उनके प्रभाव वाले क्षेत्र में कोई भी कंपनी काम न करें’। शर्मा वहाँ कलादान मल्टी मॉडल ट्रांसिट ट्रांसपोर्टेशन प्रोजेक्ट के सिलसिले में टीम के साथ थे। वहाँ RPP और EPI कंपनी मिजोरम से म्यांमार तक की सड़क प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं।

पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह राकेश की सेवा कई राज्य सरकारें और केंद्र सरकार के साथ ही बड़ी और निजी कंपनियाँ भी कंसल्टेंट के तौर पर ले रही हैं। इनमें सिक्किम, मिजोरम और मणिपुर भी विशेष रूप से शामिल हैं। उनको शानदार टास्क मास्टर और कल्पनाशील नौकरशाह के तौर पर उत्तराखंड में सेवा के दौरान अद्भुत ख्याति हासिल थी। म्यांमार में विद्रोहियों के चंगुल में फँसने के दौरान गोपाल की मौत के बारे शर्मा ने कहा कि गोपाल को शायद शुगर, दिल और अन्य बीमारियों की समस्या थी। साथ ही घंटों पैदल चलने की थकान और घबराहट के कारण भी उनकी मौत हो गई।

शर्मा के मुताबिक विद्रोहियों के कमांडर ने उनसे माफी मांगते हुए साफ कहा कि उनको पता नहीं था कि बोट पर भारतीय शामिल थे। विद्रोहियों ने गोपाल के मौत पर भी अफसोस जताया। आवभगत भी खूब की और खाने-पीने का पूरा ख्याल रखा। जब भारत सरकार को अपने लोगों के अपहृत होने की जानकारी मिली तो खलबली मच गई। तत्काल ही विदेश मंत्रालय और म्यांमार में स्थित भारतीय दूतावास सक्रिय हो गया। इसके चलते विद्रोहियों को चंद घंटों के भीतर ही शर्मा समेत सभी भारतियों को रिहा करना पड़ा। सिर्फ म्यानमार के सांसद को पकड़े रखा।

शर्मा के मुताबिक विद्रोहियों ने जब उनको रिहा किया तो वह घंटों तक पैदल चलने के कारण बुरी तरह थक चुके थे। बाकी लोगों का हाल भी उनकी तरह ही था। वे डर के मारे खामोश थे, लेकिन शर्मा के अनुसार उन्होंने साफ बोल दिया कि वे अब वापसी में फिर से इतना लंबा सफर तय नहीं कर सकते हैं। उनके लिए कुछ परिवहन व्यवस्था की जाए। उनकी गुजारिश पर विद्रोहियों ने पालकियों का इंतजाम किया। उसमें बैठ कर ही वे सभी अपहृत वापिस सुरक्षित लौटे। उनका स्वागत करने के लिए विदेश मंत्रालय और दूतावास के अफसर मौजूद थे।

क्याकटों से तकरीबन दो घंटे की ड्राइव पर स्थित सिट्वे इलाके में अपहरण की घटना को अंजाम दिया गया था। अराकान आर्मी के प्रवक्ता खइंग थूखा ने भी बयान जारी किया कि भारतियों का अपहरण उनको चोट पहुंचाने की नीयत से कतई नहीं किया गया था। वे सिर्फ सुरक्षा कारणों से पूछताछ करना चाहते थे। उनके मुताबिक उनको जब पता चला कि भारतीय कंपनियाँ विकास कार्यों के लिए म्यांमार आई हैं, तो उन्होंने किसी को भी परेशान नहीं किया।

खुद शर्मा ने कहा कि विद्रोहियों का रुख कहीं से भी जान के खतरे को पैदा करने वाला नहीं दिख रहा था। शर्मा के साथ ही विजय कुमार, नांगशानबॉक शुईएम, दिवंगत गोपाल और उत्तराखंड के ही पूर्व कर्नल अजय कोठियाल शामिल थे। अराकान आर्मी की भिड़ंत म्यानमार सेना के साथ होती रहती है। शर्मा 6 नवंबर को दिल्ली लौटे।

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