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स्थिर `CM’ मिला तो `स्थिर-बेहतर DM’ भी मिले..

उत्तराखंड देहरादून राजनीती

साफ छवि और प्रतिष्ठा वाले जिलाधिकारियों को पूरी छूट

अब मंत्रिपरिषद-सचिवालय को चाहिए रफ्तार  

The Corner View

Chetan Gurung

उत्तराखंड में सिर्फ एक मुख्यमंत्री (मरहूम नारायण दत्त तिवारी) को पाँच साल काम करने का मौका मिला। नौकरशाही में देखा जाए तो सुभाष कुमार ही लंबे समय तक एक पद (आयुक्त) पर बने रहे। जिलाधिकारियों के साथ तो खास तौर पर सरकार का रुख हमेशा शेयर बाजार वाला रहा। जिसमें दम (ज़ोर-पैसा, वैसे इसके कोई सुबूत कभी नहीं मिले), उसको कुर्सी। स्थिरता की कोई गारंटी नहीं। कभी भी हटा दिए गए। मुख्यमंत्री चाहे कोई भी रहे। कलेक्टरों को ले के सभी का रुख समान रहा। ये कम बड़ी बात नहीं कि पहली बार ऐसा हुआ है जब जिलाधिकारियों की न तो नियुक्ति को ले के अंगुली उठी न ही उनको ये आशंका साथ में दी गई कि वे कभी भी हटाए जा सकते हैं। कलेक्टरों को मिल रही तारीफ और उनके काम इसकी मिसाल है। जिलाधिकारियों की पोस्टिंग के मामले में मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को जिलों में स्वच्छ प्रशासन देने की सोच के लिए पूरे नंबर दिए जाने चाहिए।

अधिकांश कलेक्टर अपनी कार्य शैली और नई पहल के कारण सुर्खियों में हैं। उनके साथ अहम बात ये है कि वे विवादों से दूर रहते हैं। न उनकी पोस्टिंग्स पर अंगुली उठी न ही उनको ले कर स्थानीय स्तर पर कोई आरोप लग रहे हैं। ये कम बड़ी बात नहीं। जिन कलेक्टरों की लोकप्रियता और कार्य शैली प्रशंसा पा रही उनमें भदौरिया दंपत्ति (नितिन सिंह-अल्मोड़ा और स्वाति-चमोली), मंगेश घिल्डीयाल (रुद्रप्रयाग), धीराज सिंह गर्ब्याल (पौड़ी), आशीष चौहान (उत्तरकाशी) नीरज खैरवाल (उधम सिंह नगर), दीपेंद्र चौधरी (हरिद्वार), सविन बंसल (नैनीताल) और विजय जोगदंड (पिथौरागढ़) प्रमुख हैं।

भदौरिया दंपत्ति की सादगी और मंगेश की लोगों से सीधे जुड़ने तथा धीराज की विकास और नई चीजों के प्रति सोच उनको खास बना रही। नीरज को तेज तर्रार समझा जाता है। साथ ही किसी भी तरह के दबावों में न आने की प्रतिष्ठा रखते हैं। नेताओं-मंत्रियों के साथ ही आला नौकरशाह भी उन पर ऐसा कोई अनैतिक दबाव नहीं डाल पाते हैं, जो उनको पसंद नहीं। सविन भी उनसे बहुत अलग छवि नहीं रखते हैं। उनको इसलिए भी याद किया जाता है कि राज्य मंत्री रेखा आर्य से वह खुली बैठक में जिलाधिकारी होते हुए भिड़ चुके हैं। इसको नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है कि इसके बावजूद मुख्यमंत्री ने उनको नैनीताल जैसा बड़ा जिला सौंप दिया।

दीपेन्द्र को मुख्यमंत्री का बहुत विश्वासपात्र और खरा कलेक्टर समझा जाता है। उनको हरिद्वार का कलेक्टर बनाया जाना इसको साबित करता है। इससे पहले वह नैनीताल, पौड़ी, चंपावत में कलेक्टर रह चुके हैं। दीपेन्द्र को एक बार देहरादून के कलेक्टर बनाए जाने की भी खूब चर्चा थी। मंगेश और स्वाति को आम लोगों के साथ जुड़ के और उनके बीच पैठ जमा के काम करने के लिए खूब पहचान मिली है। नए कलेक्टर्स न सिर्फ युवा हैं बल्कि उनमें कुछ कर गुजरने की लालसा भी दिखती है। नितिन को उनके आत्मीय बर्ताव के कारण अल्मोड़ा में खूब नाम मिल रहा है।  

षणमुगम (टिहरी), रंजना राजगुरु (बागेश्वर) और सी रविशंकर (देहरादून) भी बढ़िया प्रतिष्ठा रख रहे हैं। विवादों से नाता रखने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं दिखती है। इससे पहले हरिद्वार-नैनीताल के जिलाधिकारी रहने के दौरान मौजूदा कुम्भ मेलाधिकारी दीपक रावत ने अपनी कार्य शैली से न सिर्फ सरकारी महकमों को दुरुस्त और चेतावनी मोड में रखा था, बल्कि सरकार के लिए नंबर भी जुटाए थे। वह खूब लोकप्रिय रहे। मेलाधिकारी के तौर पर भी उनकी नियुक्ति को सरकार का अच्छा कदम समझा जा रहा है। वह आज भी उतने ही सक्रिय दिख रहे, जितना कलेक्टर रहने के दौरान हुआ करते थे। वैसे वह अब प्रभारी सचिव स्तर पर आ चुके हैं। बीजेपी सियासत में मजबूत पकड़ रखते हैं। ये देखने वाली बात होगी कि वह देहरादून का कलेक्टर बनाए जाते हैं या नहीं।

कलेक्टरों के काम करने के अंदाज में इन दिनों भरपूर आत्म विश्वास झलकता है। वे किसी दबाव में काम कर रहे हैं, ऐसा कहीं से नहीं लगता है। कुछ पूर्व जिलाधिकारियों (अब शासन में तैनात हैं) के मुताबिक पिछली सरकारों में उनके लिए मुख्यमंत्री कार्यालय से सीधे फरमान आया करते थे। अलाना-फलाना को भेज रहे या फ़ाइल आई है। काम हो जाना चाहिए। जिन्होंने नहीं किए, वे पैदल हुए। उनको कोल्ड स्टोर में डाल देने की धमकियाँ मिला करती थीं। मौजूदा कलेक्टर्स का एकदम उल्टा कहना है-`हमको सिर्फ ये फरमान मिलता है कि जो सही है, वही करो। वरना बचोगे नहीं’।

एनडी तिवारी राज में आर्येन्द्र शर्मा, बीसी खंडूड़ी राज में प्रभात कुमार सारंगी, विजय बहुगुणा राज में उनके बेटे साकेत और हरीश रावत राज में रणजीत सिंह रावत को खुश किए बिना कलेक्टर की कुर्सी पाना दिन में सपना देखना सरीखा हुआ करता था। कुछ ही नौकरशाह अपनी छवि और काम के बूते अच्छी कुर्सी पा सके थे। नित्यानन्द स्वामी (मरहूम) और भगत सिंह कोश्यारी (अन्तरिम सरकार में सीएम) के शासन में ऐसा अलबत्ता नहीं हुआ। मुख्य सचिव, सचिव मुख्यमंत्री और कार्मिक सचिव की राय को उस दौर में अधिक सम्मान मिला करता था। दोनों मुख्यमंत्री नौकरशाही के मामलों में इन तीनों पर अधिक निर्भर रहते थे। उनको शासन और प्रशासन का अनुभव था भी नहीं।

आला नौकरशाह (अजय विक्रम सिंह-मधुकर गुप्ता-दोनों मुख्य सचिव और सुभाष कुमार-उस वक्त के सचिव मुख्यमंत्री व कार्मिक सचिव) भी ऐसे थे, जिन पर मुख्यमंत्री आँख मूँद के यकीन कर सकते थे। आज ऐसे नौकरशाह नहीं रह गए हैं। त्रिवेन्द्र राज में जिलाधिकारियों के सिर पर हर वक्त हटा दिए जाने के खतरे की तलवार हटा दी गई है। पूर्व में ऐसे किस्से कई हैं जब कलेक्टरों को महीने भर में ही हटा दिया गया। छह महीने का अरसा गुजरना कलेक्टरों के लिए उपलब्धि होती थी। कड़क और रूखे किस्म के सुरेन्द्र सिंह रावत को छह महीने के भीतर उधम सिंह नगर के जिलाधिकारी की कुर्सी से खंडूड़ी सरकार ने हटा दिया था। रावत किसी भी किस्म का गलत-अनैतिक दबाव नहीं मानते थे।

आज प्रभारी सचिव रंजीत सिन्हा अहम महकमे लिए बैठे हैं, लेकिन उनको कलेक्टर बनाने के बाद चार्ज लेने से पहले ही हटा दिया गया था। ऐसा ही प्रभारी सचिव आशीष जोशी के साथ भी हुआ था। जो निश्चित रूप से अपमानजनक होने के साथ ही हतोत्साहित करने वाला था। त्रिवेन्द्र अच्छा काम ये कर रहे हैं कि जिन अच्छी छवि और नतीजे दे रहे कलेक्टरों को हटाया गया, उनको या तो और अच्छे और अहम जिले में कलेक्टर बनाया गया, या फिर शासन में अच्छी पोस्टिंग दी गई। खास बात ये भी है कि जिलों में सरकार की छवि बनाने और बिगाड़ने में कलेक्टरों की भूमिका बहुत अहम रहती है।

ये बात अलग है कि त्रिवेन्द्र की प्रतिष्ठा सचिवालय में प्रभारी सचिव, सचिव, प्रमुख सचिव और ऊपर की पोस्टिंग्स के मामले में न जाने क्यों वैसी बेदाग नहीं है, जो जिलों को ले के है। सचिवालय में बड़े नौकरशाहों को भी महकमों की भीड़ रखने के बावजूद खाली बैठे देखा जा सकता है। ज़्यादातर को दफ्तर से अमूमन गायब देखा जा रहा है। कार्य संस्कृति सचिवालय में नहीं दिखती है। नौकरशाहों में सरकार का वैसा भय और दबाव नहीं दिखता जो काम करने के लिए उनको मजबूर कर सके। नौकरशाहों के महकमों के बँटवारे में भी सामंजस्य नहीं दिखता है। साथ ही दागी अफसरों पर डंडा बरसता भी नहीं दिख रहा है। मंत्रियों में भी वैसी रफ्तार नहीं दिखती, जो सरकार और राज्य को विकास की पटरी पर सरपट दौड़ाए। कई तो विवादों में अधिक घिरे हैं या फिर घूमने-फिरने में। या फिर समारोहों के उद्घाटनों में। उनको भी रफ्तार दिए जाने की दरकार है।

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