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बाबू मोशाय सौरव गांगुली का भी उत्तराखंड पर एसिड टेस्ट

खेल

भ्रष्टाचार-अनियमितताओं पर सख्त कदम उठाएंगे या बह जाएंगे?

खुद भी आखिर कब CAB की अध्यक्षता छोड़ेंगे?

Chetan Gurung

भारतीय क्रिकेट के बाबू मोशाय सौरव गांगुली उत्तराखंड से जुड़े गंभीर मसलों पर एसिड टेस्ट का सामना करेंगे। यहाँ क्रिकेट में जन्म के पहले महीने में ही भ्रष्टाचार और अनियमितताओं तथा तानाशाही-अराजकता ने कदम जमा लिए हैं। ये सवाल हर आँख में उठ रहे हैं कि अपनी पाक-साफ छवि का ख्याल रखते हुए क्या गांगुली उत्तराखंड पर सख्त और त्वरित कदम उठाएंगे या फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करेंगे?

गांगुली के बीसीसीआई अध्यक्ष बनने के बाद ये हवा खूब चल रही कि अब बीसीसीआई और भारतीय क्रिकेट में साफ-सफाई का दौर शुरू होगा। सिर्फ बोर्ड में नहीं बल्कि राज्यों की क्रिकेट ईकाइयों में भी ईमानदारी और भ्रष्टाचार मुक्त क्रिकेट प्रशासन अस्तित्व में आएगा। अभी तक तो गांगुली के रहते हुए भी ये सब दूर की कौड़ी लग रही है। खुद दादा ने क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल के अध्यक्ष की कुर्सी नहीं छोड़ी है।

क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के सचिव माहिम वर्मा ने बीसीसीआई उपाध्यक्ष बनते ही इस्तीफा दे दिया है। इसके बावजूद वह न सिर्फ सचिव की हैसियत से उत्तराखंड से संबन्धित मामलों पर बयान बाजी कर रहे बल्कि सीएयू ने जिस तरह अभी तक नए सचिव का चुनाव रोका हुआ है, उससे उसकी मंशा शक के दायरे में है। माहिम के इस्तीफे के बावजूद आखिर सचिव पद पर नए चेहरे को लाने में क्या दिक्कत है?

पहले ही CAU असंख्य आरोपों से घिरा हुआ है। उस पर CEO अमृत माथुर, प्रशिक्षकों, चयनकर्ताओं तथा वेन्यू मैनेजरों की नियुक्तियाँ पारदर्शी ढंग से न करने, टीमों के चयन में पारदर्शिता का सर्वथा अभाव और घूस खा के चयन करने, तीन-तीन दफ्तर चलाने, टीमों के खराब प्रदर्शन, रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटी ऑफिस को झूठे दस्तावेज़ जमा करने, फर्जी वॉटर लिस्ट तैयार करने के गंभीर आपराधिक आरोप हैं।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित प्रशासकों की समिति (COA) ने अपनी रिपोर्ट में उत्तराखंड में हुए चुनाव पर अंगुली उठाते हुए इसको पूरी तरह UPCA के राजीव शुक्ला के साए में हुआ बताया गया है। साथ ही माहिम के बीसीसीआई में प्रवेश को हितों का टकराव करार दिया है। CAU को ले के आरोप है कि इसमें पूरी तरह से उत्तर प्रदेश और उसमें भी कानपुर लॉबी पूरी तरह हावी होने के साथ ही भरपूर मनमानी कर रही है।

इसके साथ ही इतनी जल्दी CAU में वर्मा लॉबी, जोत सिंह गुनसोला-हीरा सिंह बिष्ट तथा सीईओ अमृत माथुर लॉबी उभर आई है। अभी तक वर्मा लॉबी, जिसके पीची शुक्ला का जबर्दस्त हाथ है, का ही दबदबा रहा है। CAU पर प्लेयर्स एसोसिएशन के गठन के बगैर ही वहाँ से दो पूर्व खिलाड़ियों को प्रदेश में क्रिकेट का संचालन करने वाली एपेक्स काउंसिल में गलत ढंग से शामिल  करने के आरोप हैं। सुप्रीम कोर्ट में 27-28 नवंबर को उत्तराखंड में धांधली और धोखाधड़ी के साथ ही जालसाजी के मामलों में भी सुनवाई होनी है।

ये साफ लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में CAU के साथ ही BCCI के लोगों को भी उत्तराखंड के मुद्दों पर झाड़ पड़ सकती है। ऐसा होता है तो ये अचंभे की बात नहीं होगी। ये देखना अहम होगा कि उत्तराखंड मामले में फैसला गांगुली सुप्रीम कोर्ट में तारीख से पहले कर लेंगे या धीमे-धीमे करते रहेंगे। अलबत्ता, मौजूदा हालात देख के ये कहा जा सकता है कि जल्दी सुधारात्मक कदम नहीं उठाए जाते हैं तो CAU-BCCI और उत्तराखंड क्रिकेट का इतिहास काले अक्षरों में लिखा जाएगा। गांगुली इतना देखने और सुनने के बावजूद कदम नहीं उठाते हैं तो ये माना जाएगा कि वह भी अपनी सीट बचाने के लिए राज्यों के साथ कोई विवाद पालने के मूड में नहीं हैं। उनकी दिलचस्पी भी क्रिकेट की बेहतरी से ज्यादा बोर्ड में समीकरण बेहतर करने और बनाए रखने में ज्यादा है।  

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