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`सुर्खियां तो कोश्यारी की तकदीर में लिखी हैं’

उत्तराखंड देश राजनीती

स्वामी के सीएम बनने से शुरू हुआ तो फिर निर्बाध चल रहा

महाराष्ट्र के राज्यपाल के तौर पर मशहूरी के शीर्ष पर

Chetan Gurung

महाराष्ट्र में भीषण सियासी संकट कहें या फिर चालें, शीर्ष पर है। इसके केंद्र में भले पीएम नरेंद्र मोदी-गृह मंत्री अमित शाह हों, लेकिन सुर्खियां लूट रहे भगत सिंह कोश्यारी। राज्यपाल के तौर पर वह 24 घंटे मीडिया की नजरों में हैं। उनकी एक-एक गतिविधि और फैसले पर जमाने की नजर गड़ी हुई हैं। वह अपने फैसले से कब सभी को चौंका दें, कोई नहीं जानता है। एनसीपी के शरद पवार को सियासत और खास तौर पर महाराष्ट्र का सियासी उस्ताद कहा जाता है, लेकिन जो कोश्यारी को करीब से या फिर लंबे समय से जानते हैं, उनको पता है कि कोश्यारी दांव पेंचों के मामले में पवार से कहीं भी कम नहीं हैं। सच तो ये है कि उन्होंने शरद को अपनी गोपनीय चालों से गरम किया हुआ है।

उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ तो कोश्यारी मुख्यमंत्री बनने के दावेदारों में प्रमुख रूप से शुमार थे। केदार सिंह फोनिया और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक भी नित्यानन्द स्वामी (जो पहले अन्तरिम सरकार के मुख्यमंत्री बने, अब मरहूम) के साथ होड़ में थे। इसके बावजूद किसी को ये उम्मीद नहीं थी कि कोश्यारी उस वक्त शपथ ग्रहण समारोह का ही बहिष्कार कर देंगे, जब स्वामी मंच पर मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले रहे होंगे। तब यूपी के मुख्यमंत्री और आज के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह देहरादून के परेड मैदान पर मौजूद थे। आधी रात को हो रहे इस शपथ ग्रहण समारोह में कोश्यारी की गैर मौजूदगी ने आने वाले तूफान की भनक दे दी थी।

कोश्यारी ने अलग से मंत्री पद की शपथ बाद में ली, लेकिन स्वामी को निबटाने में उनकी बहुत अहम भूमिका रही। जिस दिन स्वामी का बहुचर्चित इंटरव्यू `अमर उजाला’ में छपा और उनकी कुर्सी चली गई, उस दिन सुबह-सुबह सभी असंतुष्टों का भारी जमावाड़ा उनके उसी बंगले में था, जो बाद में मंत्री के तौर पर प्रकाश पंत को मिला। कोश्यारी मुख्यमंत्री बने लेकिन असंतोष और धड़ेबाजी के कारण ही उत्तराखंड राज्य बना के देने के बावजूद बीजेपी पहला ही विधानसभा चुनाव अप्रत्याशित रूप से हार गई थी। दरअसल पार्टी का हर क्षत्रप खुद मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देख रहा था। उसने दूसरे को निबटवाने के फेर में पार्टी को ही निबटा डाला। ये ये बात साल 2002 की है।

पाँच साल बाद जब बीजेपी सरकार में लौटी तो एक बार फिर कोश्यारी मुख्यमंत्री पद के मुख्य दावेदार थे। उनकी जगह सांसद बीसी खंडूड़ी को होटल पैसिफिक में आला कमान ने कल्याण सिंह को भेज के मुख्यमंत्री बनवा डाला। कोश्यारी मन मसोस के रह गए, लेकिन उन्होंने खंडूड़ी की नाक में ऐसा दम कर के रखा कि उनको बीच राह में हटना पड़ा। मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत तब कोश्यारी के बेहद खास और विश्वासपात्रों में शुमार थे। कोश्यारी को हालांकि निशंक ने झटका दे डाला। हाई कमान ने नए मुख्यमंत्री के लिए नाम सुझाने को कहा तो खंडूड़ी ने निशंक के कंधे पर हाथ रख दिया। निशंक ने सभी से गुजारिश की कि कोश्यारी पर हामी न हो तो उनको दूसरे विकल्प के तौर पर मुख्यमंत्री के लिए पेश किया जाए।

ये दांव काम कर गया। कोश्यारी एक बार फिर खाली हाथ रहे। निशंक मुख्यमंत्री बन गए। खार खाए और बेहद खफा कोश्यारी ने फिर धोबी दांव मारा। उन्होंने अबकी बीसी के साथ मिल के निशंक को बाहर का रास्ता दिखा दिया। निशंक को जब मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाने का फैसला दिल्ली में हुआ तब चुनाव को छह महीने शेष रह गए थे। मुख्यमंत्री बदले जाने की सुगबुगाहट तक नहीं थी। निशंक टिहरी में अंत्योदय यात्रा पर थे, जब उनको हटाने का फैसला हुआ। इस बार फिर खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने। कोश्यारी फिर पिछड़ गए। ढाई साल पहले फिर बीजेपी सत्ता में आई तो कोश्यारी हमेशा की तरह फिर से मुख्यमंत्री के प्रमुख दावेदार थे। ये बात अलग है कि इस बार वे खामोशी से अपना मौका देख रहे थे। हाई कमान ने उनके बजाए त्रिवेन्द्र पर दांव खेल के उनको झटका दे दिया। वह दूसरे विकल्प के तौर पर भी नहीं गिने गए।

प्रकाश पंत को दूसरे विकल्प के तौर पर देखा गया। जब सभी को लगा कि कोश्यारी का सियासी किस्सा खत्म, तो अचानक वह महाराष्ट्र सरीखे हिंदुवादी राज्य की छवि वाले राज्य के राज्यपाल बना दिए गए। इससे वाकई पूरी बीजेपी तक चौंक गई। इसके बाद से कोश्यारी लगातार सुर्खियों में हैं। भगत दा के तौर पर लोगों में लोकप्रिय और खरी-खरी बोलने वाले कोश्यारी अभी कई दिन और सुर्खियों में रहेंगे ये तय है। भविष्य में भी जब-जब महाराष्ट्र सियासत का नाम लिया जाएगा, कोश्यारी लोगों को भरपूर याद आएंगे।

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