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महाराष्ट्र:दांव पर भगत दा और उत्तराखंड की इज्जत!

उत्तराखंड राजनीती

मोदी-शाह के हिस्से का अपयश उठा लिया !

पार्टी सियासत भूल फ्लोर टेस्ट करा खोई प्रतिष्ठा फिर पा सकते हैं

Chetan Gurung

महाराष्ट्र में राज्यपाल और उत्तराखंड के हर तबके-वर्ग के बड़े भाई भगत सिंह कोश्यारी देश और विदेश तक में गलत वजह से सुर्खियों में हैं। देवेन्द्र फड़नवीस को आनन-फानन तकरीबन चोरी-छिपे अंदाज में मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला के उन्होंने बीजेपी और खास तौर पर पीएम नरेंद्र मोदी तथा बीजेपी अध्यक्ष व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हिस्से का अपयश अपने सिर ले लिया है। उनके हिस्से का हलाहल विष पी लिया है। इससे उनकी जिंदगी भर की इज्जत की कमाई दांव पर लग गई है। देवभूमि पर भी छींटे पड़ने लगे हैं। इसको साफ करने का एक ही तरीका उनके पास रह गया है। पार्टी सियासत को भूल फटाफट फ्लोर टेस्ट कराएं। खोई प्रतिष्ठा और यश फिर से पाएँ।

ये हर कोई जानता है कि कोश्यारी ने जो भी फैसला फड़नवीस को मुख्यमंत्री बनाने और बीजेपी सरकार के गठन में लिया, वह उनकी खुद की इच्छा कभी नहीं रही होगी। मोदी-शाह और बीजेपी आला कमान का फरमान न होता तो वह ऐसा और इतना विवादित कदम शायद ही उठाते। आज कोश्यारी पर देश-विदेश की मीडिया प्रहार कर रही है। लोग उनके फैसले पर अंगुली उठा रहे हैं। इससे उन उत्तराखंडियों को भी अब पीड़ा हो रही, जो उनके राज्यपाल बनाए जाने से बेहद खुश और उत्साहित थे।

कोश्यारी सियासत के दिग्गज और सूरमा खिलाड़ी हैं। सियासत और कायदे जानते हैं। उन पर दबाव न होता तो राष्ट्रपति शासन खत्म कर के बीजेपी को  सरकार बनाने के लिए कभी आमंत्रित न करते। खास तौर पर ये देखते हुए कि बीजेपी के पास वह चमत्कारिक और जरूरी नंबर है ही नहीं, जो उसको सरकार के गठन के लिए अपरिहार्य कर देता। फड़नवीस ने 170 विधायक अपने साथ होने का दावा किया था। इस पर राज्यपाल तो क्या विश्वास करते, आम आदमी तक जानता था कि ये सिर्फ फर्जी नंबर है। सिवाय राज्यपाल के।

उनका फ्लोर टेस्ट और बहुमत साबित करने के लिए बीजेपी को 14 दिन दिया जाना, एक और बहुत ही विवादित फैसला है। अगर बीजेपी के पास 170 विधायक हैं तो फिर अगले दिन ही फ्लोर टेस्ट का सामना करने को वह क्यों राजी नहीं है। वैसे तो जो आपातकालीन अंदाज में राष्ट्रपति शासन हटाया गया और देवेन्द्र सरकार को अस्तित्व में लाया गया, उससे बीजेपी पर तो दाग लग रहा है, लेकिन उत्तराखंड के `भगत दा’ पर आंच आना किसी भी देवभूमि वासी को रास नहीं आ रहा है।

अब कोश्यारी तभी बेदाग साबित होंगे और पुरानी ख्याति फिर अर्जित कर सकेंगे, जब वह फ्लोर टेस्ट फटाफट करने और नेता विधायक दल की कुर्सी पर अजीत पवार की वैधता पर भी फैसला करते हैं। उम्मीद है कि भगत दा, जो अपनी दिलेरी और बिना लाग लपेट के खरी-खरी आला कमान तक को सुनाने की हिम्मत रखते थे, उसका प्रदर्शन एक बार फिर करेंगे। उत्तराखंड और खुद की इज्जत-मान-प्रतिष्ठा को फिर से अर्जित करेंगे। खास तौर पर ये देखते हुए कि उनका सियासी सफर समाप्त हो चुका है। जिंदगी भर इज्जत और सम्मान कमाया है।

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