News Space

उत्तराखंड क्रिकेट:सचिव माहिम का इस्तीफा या नाटक!

Uncategorized उत्तराखंड खेल देहरादून

BCCI उपाध्यक्ष होते ही CAU पद खुद समाप्त!

कौन है जो नए सचिव का चुनाव नहीं होने दे रहा?

यूपी के शुक्ला-वर्मा लॉबी का पूरा दबदबा 

अध्यक्ष गुनसोला सिर्फ रबर स्टम्प!

CEO माथुर के आगे किसी की हैसियत नहीं

Chetan Gurung

उत्तराखंड क्रिकेट को चलाने की ज़िम्मेदारी क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड को हासिल है, लेकिन ये संस्था विवादों और गुटबाजियों के साथ ही चालबाजियों के लिए कुख्याति हासिल कर रही है। अध्यक्ष जोत सिंह गुनसोला को रबर स्टांप के तौर पर माना जा रहा है।  यूपी के शुक्ला गुट के खासमखास पीसी वर्मा और उनके बेटे माहिम वर्मा, BCCI उपाध्यक्ष चुने जाने के बावजूद उत्तराखंड क्रिकेट में जबरन दखल दे रहे हैं। आलम ये है कि CEO-चयनकर्ता और CAU के लोगों में कोई तालमेल ही नहीं है। अपनी-अपनी ढफली और अपना-अपना राग चल रहा।

CAU के जन्म से अध्यक्ष रहे हीरा सिंह बिष्ट आज पूरी तरह दरकिनार कर दिए गए हैं। बिष्ट ने ही उत्तराखंड क्रिकेट को खाद-पानी दिया और पीसी वर्मा को आगे बढ़ाया। कभी वर्मा को क्रिकेट में उनका दत्तक पुत्र का दर्जा हासिल था। जब एनडी तिवाड़ी सरकार में बिष्ट कैबिनेट मंत्री थे तो उन्होंने वर्मा को श्रम संविदा बोर्ड का अध्यक्ष भी बनाया था। बिष्ट के पास श्रम मंत्रालय भी था। CAU को जैसे ही BCCI की मान्यता मिली, बिष्ट को भुला दिया गया। आज बिष्ट को ये तक पता नहीं होता कि आखिर एसोसिएशन में चल क्या रहा है।

खास बात ये है कि CAU अध्यक्ष गुनसोला भी उनके राजनीतिक शिष्य हैं। गुनसोला को अव्वल तो एसोसिएशन के अहम फैसलों में प्रमुखता नहीं दी जा रही, दूसरा ये कि उनकी हैसियत शुक्ला-वर्मा लॉबी की हाँ में हाँ मिलाने वाली रह गई है। माहिम को राजीव शुक्ला ने BCCI में खुद की जगह उपाध्यक्ष बनवा दिया है। एसोसिएशन के अहम लोगों के मुताबिक इसके साथ ही CAU सचिव की कुर्सी से माहिम का इस्तीफा खुद बा खुद हो गया है। कोई भी व्यक्ति राज्य ईकाई के साथ ही BCCI में एक साथ सदस्य तक नहीं हो सकता है।

इसके बावजूद अभी तक माहिम को ले कर वर्मा लॉबी ये प्रचारित करने की कोशिश कर रहा है कि माहिम ने इस्तीफा तो दे दिया है, लेकिन उसको मंजूर नहीं किया गया है। AGM में इस पर फैसला होगा। ऐसा कहा जाना सिर्फ क्रिकेट भ्रष्टाचार और साजिश का हिस्सा है। जो ऐसा कह रहे उनको या तो नियमों की जानकारी नहीं है या फिर उनके दिमाग में कुछ और ही खेल चल रहा है। इस्तीफा तो दे या न दें, मान लिया जाता है। मंजूर होने तक का तो खेल ही नहीं होता। सूत्रों के मुताबिक BCCI में जाने के बावजूद UP-वर्मा लॉबी उत्तराखंड क्रिकेट का मोह नहीं छोड़ पा रही। वह उत्तराखंड में पूरी तरह अपना कब्जा बनाए रखना चाह रही।

नियम कहता है कि माहिम अब सचिव नहीं हैं। न ही उनको अब उत्तराखंड क्रिकेट में दखल देने और सचिव की तरह बयान देने का नैतिक व आधिकारिक हक रह गया है। BCCI अध्यक्ष बनने के बाद सौरव गांगुली ने भी क्रिकेट बोर्ड ऑफ बंगाल और वहाँ की क्रिकेट में दखल देना छोड़ सा दिया है। सूत्रों के मुताबिक माना जा रहा है कि वर्मा लॉबी ये देख रही है कि कहीं राजीव शुक्ला की किसी तरह BCCI में वापसी की राह खुल जाती है तो माहिम को ही उनके लिए इस्तीफा दे के कुर्सी खाली करना होगा।

ऐसी सूरत में उनके लिए CAU सचिव जैसी अहम कुर्सी जरूरी है। ऐसा न हो कि न BCCI में रह पाए और न ही CAU सचिव की कुर्सी बची रहे। इसके चलते ही सचिव पर नए चेहरे को लाने के लिए अभी तक चुनाव नहीं हो पाया है। ये सवाल एसोसिएशन में ही उठ रहा है कि आखिर कौन है जो सचिव का चुनाव न तो होने देना चाहता है न ही माहिम को उत्तराखंड से अब मुक्त करने दे रहा। एक अंगुली पीसी वर्मा को ले के भी एसोसिएशन के भीतर से उठ रही है। उनके बारे में कहा जा रहा है कि वह बेटे को उत्तराखंड में काम करने के लिए खुली छूट चाहते हैं। साथ ही एसोसिएशन में कुछ न होने के बावजूद हर फैसले में दखल दे रहे।

ऐसे माहौल में सुप्रीम कोर्ट में अगले दो दिन बहुत ही अहम हैं। उत्तराखंड क्रिकेट में जो बवाल और विवाद चल रहे, उस पर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। CAU पर रजिस्ट्रार ऑफिस को गलत जानकारी देने, विजय हज़ारे ट्रॉफी के चयन में गड़बड़ी करने, घूसख़ोरी, अहम पदों पर नियुक्तियों में पारदर्शिता न रखने के साथ ही आजीवन सदस्यता गलत ढंग से दिए जाने और चुनाव में धांधली समेत दर्जनों आरोप इतनी कम अवधि में लग चुके हैं। खुद सुप्रीम कोर्ट की कमेटी CoA ने उत्तराखंड क्रिकेट और माहिम को ले के सुप्रीम कोर्ट को नकारात्मक रिपोर्ट सौंपी है। उस पर भी विचार किया जा सकता है। जहां तक CAU के कामकाज का सवाल है, इसको इतने से ही समझा जा सकता है कि ये देहरादून में ही तीन स्थानों से संचालित हो रहा है।

CEO माथुर भी शुक्ला गुट के हैं और चयनकर्ताओं की नियुक्ति भी शुक्ला के ईशारे पर ही हुई है। माथुर हो या चयनकर्ता, CAU के कथित अध्यक्ष या किसी भी अन्य को कोई अहमियत ही नहीं दे रहे। वे सभी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं और शुक्ला लॉबी के सशक्त चेहरे हैं। उत्तराखंड में किसी की हैसियत नहीं है कि वह यूपी-शुक्ला लॉबी का बाल भी बांका कर सके। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के भतीजे संजय रावत को भले CAU में जगह दी गई है, लेकिन उनकी हैसियत भी सिर्फ `यस मैन’ वाली ही है। CAU के एक पदाधिकारी के मुताबिक माथुर का दबदबा किस कदर है, इसको समझने के लिए इतना काफी है कि वह कभी भी एसोसिएशन के कान्वेंट रोड स्थित दफ्तर में नहीं आते हैं। अध्यक्ष हो या सचिव, उनको ही माथुर के पास जाना पड़ता है।

चयनकर्ता और प्रशिक्षक भी CEO को ही सीधे रिपोर्ट करते हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है कि माथुर की क्रिकेट पृष्ठ भूमि के सामने CAU का कोई भी पदाधिकारी दूर-दूर तक नहीं टिकता है। साथ ही माथुर को शुक्ला ही ले के आए हैं। शुक्ला के साथ ही सहारनपुर में रहने वाले उनके खास शिष्य ही उत्तराखंड में जबर्दस्त दबदबा रखे हुए हैं। वे यहाँ के हर फैसले में दखल रख रहे हैं। गुनसोला अध्यक्ष हैं लेकिन न उनको एसोसिएशन की गतिविधियों की जानकारी रहती है न उनको क्रिकेट दुनिया के खेल-चाल-साजिश का ही अंदाज है। यही वजह है कि उनको न वर्मा लॉबी न माथुर लॉबी ही तवज्जो दे रही। इस सबके चलते अगर किसी का नुक्सान हो रहा है तो सिर्फ क्रिकेट और क्रिकेट प्रतिभाओं को। इसकी परवाह किसी को नहीं है।  

Related posts

उत्तराखंड:भ्रष्टाचार में डूबती देवभूमि और नौकरशाह

Chetan Gurung

किसकी शह पर आखिर ऐसी बेधड़क-बेफिक्र-बेशर्म हैं किट्टी माफिया

Chetan Gurung

शराब के अफसरों पर बरसेगा अब डंडा-चाबुक

Chetan Gurung

Leave a Comment