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मिठाई और मिठास के महाराजा का महाप्रयाण

उत्तराखंड देहरादून

देहरादून में रमेश जी ने ही लोगों को मिठाई का चस्का लगाया

Chetan Gurung

बचपन में पिताजी के साथ कभी-कभी बाजार जाना होता था। ऐसे हर मौके पर कुमार स्वीट शॉप बाकियों की तरह मेरी भी नजरें खींच ही लेता था। हसरत भरी निगाहों से कभी इस मिठाई भंडार को तो कभी खुद की खाली जेब को कई बार हाथ डाल के चेक किया। ये वह दौर था जब हम किशोर हो गए थे। आज के बच्चों के पास महंगी बाइक और आई-फोन भले होते हों, तब हमारे पास चवन्नी नहीं होती थी। सो मन मसोस के आगे बढ़ जाया करते थे। ताज्जुब इस लिए होता है कि मुझे मिठाई खास पसंद नहीं है। गरम जलेबी, पेठा या फिर काजू बर्फी (अब) खा लेता हूँ। फिर भी घंटाघर चौक पर हनुमान मंदिर से सटे इस दुकान को मैंने हमेशा अपने आकर्षण का केंद्र पाया। शायद इस लिए भी कि ये दुकान तब देहरादून के चंद खास प्रतीक चिह्नों में शामिल हुआ करता था।

जैसे क्वालिटी रेस्तरां, प्रिंस होटल, मधुबन होटल, बिंदाल पुल, प्रभात सिनेमा। वैसे ही कुमार स्वीट शॉप। शहर का सबसे स्वादिष्ट और शुगर-डायबिटिक को भी खींचने वाला। उन दिनों लोग इस दुकान पर ऐसे टूट पड़ते थे, मानो मुफ्त में मिठाई मिल रही हो। खास और बड़ा त्योहार हो तो दिन में ही शटर गिर जाता था। कई दिनों से मिठाइयाँ बड़ी मेहनत से रात-दिन तैयार की जाती थी। त्यौहार आता था तो चंद घंटों में सब खत्म। हाँ, यहाँ का मेंगों शेक आज भी पुराने लोग याद किया करते हैं। अगर किसी के घर में कुमार स्वीट शॉप का डिब्बा दिखे तो उसकी हैसियत बढ़ जाया करती थी। जी हाँ। शहर में तब मिठाई की और कोई दुकान हुआ करती भी थी तो उनकी हैसियत गाँव के हलवाई की दुकान से ज्यादा नहीं हुआ करी थी। गुणवत्ता और स्वाद का मतलब सिर्फ कुमार की मिठाई होती थी।

आज कई स्वीट शॉप राजधानी में हैं। खूब बड़े और राष्ट्रीय चेन तक का हिस्सा। कुमार स्वीट शॉप MDDA कॉम्प्लेक्स, जो राजपुर रोड पर धारा पुलिस चौकी के सामने हैं, को वे आज भी चुनौती नहीं दे पाए हैं। न नाम में न कारोबार में। जब चकराता रोड को चौड़ा करने का अभियान चला तो ये मिठाई भंडार भी हटा। मेरा कुमार स्वीट शॉप के स्वामी रमेश कुमार वर्मा से बहुत अधिक मिलना नहीं होता था। फिर भी जब कभी मिलना हुआ तो वह हमेशा बेहद अपनत्व भरे अंदाज में मिले। सौम्य मुस्कुराहट उनके चेहरे से कभी नहीं हटती थी। मुझे पता नहीं चला कि मेरे साथ उनका ऐसा प्रिय बर्ताव क्यों रहा?

मुझसे उनका न कभी कोई काम पड़ा न कोई उम्मीद ही थी। साल 2007 में मैं उत्तरांचल प्रेस क्लब का अध्यक्ष चुनाव लड़ रहा था। दिसंबर 30 की सर्द रात में 12.15 बजे नतीजे घोषित हुए। दोस्त पत्रकारों ने खुशी में कंधे पर उठा लिया था। ढ़ोल-नगाड़े बज उठे थे। न जाने किस दोस्त का बंदोबस्त था। आज तक नहीं पता। इसी बीच मैंने देखा कि देसी घी के लड्डू भी कोई बाँट रहा। मैं घबराया कि ये कौन है? कहीं सुबह बिल न थमा दे। बहुत बाद में पता चला। रमेश जी ने भिजवाई थी। मेरे चुनाव लड़ने की जानकारी उनको चल चुकी थी। बिना मुझे बताए उनका ये अहसान मुझे हमेशा याद रहा और रहेगा।

उनके बेटे नितिन में अपने पिता के सारे गुण मौजूद हैं। कुमार स्वीट शॉप के साथ ही कुमार वेजिटेरियन काफी सालों से वही संभाल रहे थे। नितिन का व्हाट्स एप कुछ दिन पहले मेरे मोबाइल स्क्रीन पर चमका। उसमें रमेश जी के महाप्रयाण की सूचना थी। ये निश्चित रूप से हर उस शख्स के लिए हृदय विदारक सूचना थी, जो उनको करीब से जानते थे या फिर सिर्फ नाम सुना भर था। जो उनसे एक बार मिला, हमेशा के लिए उनके व्यवहार और मुस्कान के कारण उनका ही हो गया। उनको कैंसर हो गया था। 72 साल की अवस्था थी। हिमालयन इंस्टीट्यूट में उनका लंबे समय से ईलाज चल रहा था। मिठाई और मिठास के इस महानायक को हार्दिक श्रद्धांजली।

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