News Space

त्रिवेन्द्र सरकार सोती रह गई, केंद्र ने बेच दिया THDC

उत्तराखंड

जिस राज्य का पानी-जवानी-जमीन उसको भनक तक नहीं

राज्य सरकार को आखिर अवाम की आवाज़ क्यों नहीं उठानी चाहिए?

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल जैसी दशा है मंत्री कौशिक का बयान

किस काम के ऐसे मंत्री-सांसद?

Chetan Gurung

मोदी सरकार ने टिहरी के THDC प्रोजेक्ट को NTPC के हाथों बेच डाला है। हैरत की बात है कि जिस राज्य में ये प्रोजेक्ट है, और जिसका इस प्रोजेक्ट से पूरा वास्ता है, उसको इसकी भनक तक नहीं है। सवाल बनता है। जिस राज्य का पानी, जवानी और जमीन इस्तेमाल हो रहा हो, उसको क्या केंद्र विश्वास में कतई नहीं लेगा? ये सूरतेहाल तब है, जब उत्तराखंड में भी केंद्र की तरह बीजेपी की ही सरकार है। सरकार के प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक ने विधान सभा सत्र के दौरान कहा-राज्य सरकार के पास इस विनिवेश की आधिकारिक रिपोर्ट नहीं है। ये बयान सिर्फ और सिर्फ राज्य सरकार की बेचारगी और केंद्र की नजरों में फूटी कौड़ी की हैसियत न होने की दशा को दर्शाती है।

गौर करिए कि जब जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटने की चर्चा हुई ही थी तो वहाँ के राज्यपाल ने क्या कहा था? अचानक वहाँ से पर्यटकों को बाहर किए जाने और फौज का जमावाड़ा बढ़ा दिये जाने पर पत्रकारों से बातचीत में राज्यपाल ने दावा किया था-`धारा-370 हटाने जैसा कुछ नहीं होने वाला है।’ अगले दिन ये धारा हट गई थी। कहने का मतलब ये है कि मोदी सरकार की कार्यशैली ऐसी है कि वह जो भी छोटे-बड़े फैसले करती है, उसमें किसी की परवाह नहीं करती है। ऐसे में त्रिवेन्द्र सरकार का ये कहना कि THDC विनिवेश पर अभी उसके पास केंद्र से कुछ नहीं आया है, केंद्र की तरफ से उसको नजर अंदाज किए जाने की मिसाल है।

THDC को बेचे जाने पर देश भर में बवाल है, लेकिन उत्तराखंड में जैसी खामोशी का आलम अवाम से ले के मीडिया तक में है, वह हैरान करता है। कहने को इस प्रोजेक्ट में केंद्र सरकार का 75 और UP सरकार का 25 फीसदी अंश है। ऐसा इसलिए है कि जब प्रोजेक्ट बना था, तब उत्तराखंड राज्य का गठन नहीं हुआ था। ये यूपी का हिस्सा था। ये उत्तराखंड सरकार-यहाँ की मीडिया और आम जनमानस की निराशाजनक लापरवाही की बदतरीन मिसाल है कि अपने राज्य में इतना अहम और बड़ा प्रोजेक्ट है, लेकिन अपनी कोई भी भागीदारी इसमें नहीं है। यही वजह है कि जब प्रोजेक्ट को बेचा जा रहा है तो उत्तराखंड के लोगों को तो दूर सरकार तक को इसका एहसास नहीं हो पाया।

THDC प्रोजेक्ट में पूरा पानी राज्य का ही है। बेशक ये देश की धरोहर है, लेकिन नैतिक और विधिक तौर पर इसका स्वामी उत्तराखंड है। जमीन भी यहीं की है। प्रोजेक्ट के लिए जो जमीन ली गई, उसमें कइयों ने खुशी-खुशी दी तो कइयों से जबरन ली गई। जमीन अधिग्रहण और विस्थापन के मुद्दों को ले के क्या-क्या आंदोलन नहीं हुए थे। इसके अलावा प्रोजेक्ट से पैदा होने वाली बिजली से 12.5 फीसदी अंश उत्तराखंड सरकार को मिलता है। प्रोजेक्ट में काम करने वाले अधिकांश कर्मचारी और श्रमिक टिहरी-उत्तराखंड के हैं। अभी भी कई बड़े मुद्दे उनके खत्म हुए नहीं हैं।

THDC-IHET, जो देश का सबसे बड़ा जल विद्युत इंजीनियरिंग से जुड़ा कॉलेज है, ही कई अहम मसलों से जूझ रहा है। कई कानूनी पेंच इस कॉलेज को ले के फंसे हुए हैं। ऐसे में इसका बिक जाना देश के लिए तो चर्चाओं का विषय निश्चित रूप से है ही, राज्य सरकार के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। ये बात दीगर है कि इस मामले में त्रिवेन्द्र सरकार या फिर हमारे उत्तराखंड या फिर टिहरी के सांसद महारानी माला राज्यलक्ष्मी की हिम्मत पीएम नरेंद्र मोदी या फिर केंद्र सरकार के किसी अन्य अहम शख्स से बात भी करने की होगी, उसकी गुंजाइश शून्य है। उनको तो खुद प्रोजेक्ट बिक जाने की खबर मीडिया से लगी।

उत्तराखंड से डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक केंद्र में कैबिनेट मंत्री हैं। उनका भी एक पंक्ति का बयान इस मामले में नहीं आया है। इससे जाहिर हो जाता है कि उत्तराखंड की हैसियत केंद्र सरकार के सामने कितनी दयनीय बन के रह चुकी है। पहाड़ की अस्मिता और समस्याओं से वे किस कदर आँखें मूँद चुके हैं। या फिर केंद्र के सामने असहाय हैं।

Related posts

आने वाली है नौकरियों की बहार,तैयार रहें

admin

THDC-IHET डायरेक्टर..यानि नई बोतल पुरानी शराब

admin

ऐसी CPU से अच्छा इसको भंग कर दें

admin

Leave a Comment