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नौकरशाही के खेल में उलझ न जाइए त्रिवेन्द्र जी

उत्तराखंड देहरादून

DEO उपाध्याय की चार्जशीट फ़ाइल गायब!

15 दिन हो गए फिर भी प्रमुख सचिव तक नहीं पहुंची

शराब वालों पर मेहरबानियों का वर्ल्ड रेकॉर्ड बन गया

संयुक्त सचिव कवीन्द्र की क्या गुस्ताखी? सिस्टम ही तो बताया था

इंसाफ का डंडा कहीं भारी तो कहीं बहुत हल्का!

Chetan Gurung

त्रिवेन्द्र सिंह रावत उत्तराखंड के सबसे तकदीर वाले और बेहद शक्तिशाली मुख्यमंत्री हैं। इसमें कोई शक किसी को नहीं है। उनके पास वह सारे अधिकार हैं, जिसका इस्तेमाल वह कर सकते हैं और खुल के करने पर कोई टोकने वाला नहीं है। उनकी सियासी विरोधी भी मानते हैं कि एनडी तिवाड़ी के बाद वह अगले मुख्यमंत्री होंगे, जो पाँच साल कुर्सी पर गुजारेंगे। ऐसे में उनके पास पूरा वक्त और अख़्तियार है कि सही और कठोर फैसले अवाम-निजाम के हक में करें। अपनी छवि-प्रतिष्ठा को निखारें। ये तभी होगा जब वह नौकरशाहों को ईशारों पर काम करने के लिए मजबूर करें। ये बात इसलिए उठ रही है कि सरकार में जिसकी लाठी उसकी भैंस का ट्रेंड चल पड़ा है। वीडियो में घूसखोर अफसरों के नाम लिए जा रहे, लेकिन उनका कुछ नहीं बिगड़ रहा। ऑडियो पर कार्रवाई हो जा रही। अगर माई-बाप नहीं है। पीडबल्यूडी के इंजीनियरों-पुलिस के दारोगाओं पर कार्रवाई हो रही, लेकिन शराब के दागी अफसरों पर नजर टेढ़ी तक नहीं की जा रही। आखिर इसकी वजह? प्रमुख सचिव (आबकारी) आनंदवर्धन का कहना है कि उनके पास देहरादून के DEO मनोज उपाध्याय को चार्जशीट देने के फ़ाइल 15 दिन बाद भी नहीं आई। आयुक्त कार्यालय इसे कभी की शासन को सौंप चुका है। मतलब आरोपियों-दागियों को बचाने का घनघोर काला खेल उफान पर चल रहा।

डीईओ उपाध्याय के खिलाफ 44 गंभीरतम आरोपों से सज्जित चार्जशीट शासन में पखवाड़े से ज्यादा वक्त से है। ये ऐसे आरोप हैं कि कोई भी अफसर इसमें निलंबित तो फौरन हो जाए, बल्कि बर्खास्त भी किया जा सकता है। पुलिस मुकदमे अलग दर्ज किए जा सकते हैं। जांच भी एक नहीं। संयुक्त आयुक्त और अपर आयुक्त के स्तर की। जो खुद इस महकमे के ही हैं। एक-एक खेल जानते हैं। दोनों जांच में दोषी और आरोपी पाए गए हैं। आयुक्त (आबकारी) सुशील कुमार तक चार्जशीट की फ़ाइल को कभी का मंजूर कर चुके हैं। चार्जशीट देने का हक शासन को है। सो उसको फ़ाइल भेजी गई। वहाँ लगता है कि किस तरह सरकार के जीरो टालरेंस नीति को कबाड़ किया जाए, इस पर काम चल रहा। प्रमुख सचिव आनंदबर्धन के मुताबिक उनके पास अभी डीईओ को चार्जशीट वाली फ़ाइल नहीं पहुंची है। जब आएगी तब कुछ बोल पाएंगे। तो फिर ये फ़ाइल सचिवालय में कौन दाब के बैठ गया? इतने दिनों से? अब तक तो फ़ाइल मुख्यमंत्री तक पहुँच के कार्रवाई हो चुकी होती। अगर बीसी खंडूड़ी के मुख्यमंत्रित्व का दौर होता। जिसके पास ये फ़ाइल है, उसको चिह्नित कर दंडित जरूर करना चाहिए।

शासन की दलील इस फ़ाइल को लटकाए रखने में अजीब है। गहन परीक्षण करने के बाद ही चार्जशीट दी जाएगी। क्या और कैसा परीक्षण? अपने महकमे के जांच अधिकारियों की निष्ठा पर शक है या काबिलियत पर? या फिर बचाने की मुहिम चल रही? अल्मोड़ा के डीईओ दुर्गेश्वर त्रिपाठी हो या फिर उधम सिंह नगर के डीईओ आलोक साह। बड़े-बड़े दाग ले के घूम रहे। सरकार है कि सूक्ष्मदर्शी ले के भी इनको नहीं देख पा रही। दोनों ठाठ से मलाईदार-रसोखदार कुर्सियों पर काबिज हैं। हरिद्वार के डीईओ रहे प्रशांत का तो वीडियो सभी देख चुके हैं। इसमें ठेकेदार आरोप लगा रहे कि कौन अफसर कितना पैसा उनसे ऐंठता है। इस अफसर पर भी कोई जांच न कार्रवाई की जा रही। मुख्यमंत्री के पास जो मामले पहुँच रहे। जिनकी वह खुद समीक्षा कर रहे, उसमें वह किसी को बख्श नहीं रहे। इससे जाहिर होता है कि उनके पास नौकरशाह सही तथ्य पहुंचा ही नहीं रहे।

सरकार की जीरो टालरेंस नीति में शिक्षा महकमे के संयुक्त सचिव कवीन्द्र सिंह को लटका दिया गया। उनको महकमाविहीन कर दिया। ऑडियो जिसने भी सुना वह समझ जाएगा कि कवीन्द्र ने गलत कुछ नहीं कहा। वह शासन में काम का सिस्टम समझा रहे थे। बिल्कुल उसी तरह जैसे अमित शाह एनआरसी की CHRONOLOGY समझा चुके हैं। देश को। इस ऑडियो में कवीन्द्र कहीं पैसा मांग नहीं रहे। फिर भी बात सरकार की छवि पर आई तो मुख्यमंत्री ने उनको तत्काल हटा दिया। बहुत अच्छा किया। ऐसा सभी मामलों में क्यों नहीं? इससे पहले आबकारी की एक महिला इंस्पेक्टर विष्णु को भी ऐसा ऑडियो सामने आने पर मुख्यालय से अटेच कर दिया था, जिसमें यही साबित नहीं हो रहा कि आखिर बात किन दोनों के बीच हो रही? जो पुरुष दूसरी तरफ है, वह शराब का लाइसेन्स धारक भी है या नहीं।

खास बात ये है कि न संयुक्त सचिव और न आबकारी इंस्पेक्टर के मामले में कोई परीक्षण किया गया। फिर शराब वालों पर इतनी नजरें इनायत क्यों हो रही होगी? ये देवभूमि के लोग जरूर जानना चाहते हैं। ये भी नहीं भूला जाना चाहिए कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर ही पीडबल्यूडी के इंजीनियरों और पथरियापीर मामले में पुलिस दारोगाओं के साथ ही आबकारी के ही कई लोग निलंबित किए जा चुके हैं। उपाध्याय, त्रिपाठी, आलोक और प्रशांत के मामले में शायद मुख्यमंत्री को सही तथ्यों से अवगत ही नहीं कराया गया। उनके संज्ञान में हकीकत आती तो उनका रेकॉर्ड बख्शने वाला तो नहीं दिखा है। वैसे बीजेपी और मुख्यमंत्री कार्यालय के कई लोगों को शराब के अफसरों के एक धड़े ने जबर्दस्त असर में लिया हुआ है। शासन, बीजेपी और सीएमओ पर उनकी जबर्दस्त घेरेबंदी सिर्फ और सिर्फ मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा पर प्रहार करेगी। इसलिए त्रिवेन्द्र कब तक इस मामले पर कार्रवाई की चाबुक बरसाएँगे, इस पर नजर सभी की है।

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