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खराब टीम चयन:रणजी ट्रॉफी में बदतरीन प्रदर्शन..

उत्तराखंड खेल देहरादून

CAU के ओहदेदार हवाई सफर-पाँच सितारा होटलों का लुत्फ लूट रहे

तनुष एकेडमी पर मेहरबानी, 55 लाख का भुगतान

किसकी खोज है मेहमान खिलाड़ी? उन्होंने सिर्फ नाक ही कटवाई

लोकपाल की नियुक्ति-समितियों का गठन क्यों नहीं?

Chetan Gurung

रणजी ट्रॉफी में उत्तराखंड ने चार में से चार मैच लुटवा दिया। फतह-शिकस्त खेल का हिस्सा है। सवाल इस लिए उठ रहे कि तीन मैच पारी और रन से शर्मनाक ढंग से हारे। एक मैच जो बारिश के कारण 3 दिन का रह गया था, वह 10 विकेट से गंवा डाला। इस बदतरीन प्रदर्शन की वजह क्या हो सकती है? उत्तराखंड के क्रिकेट प्रेमी अपनी टीम के इस तरह हथियार डाल देने और लगातार खराब प्रदर्शन करते हुए अपमानजनक ढंग से हारने के कारण निराश-हताश है। इससे ज्यादा वह गुस्से में है। वह सवाल पूछ रहा है। कौन ऐसे मेहमान खिलाड़ियों को डील कर के ले आया? वे कौन प्रशिक्षक हैं, जिन्होंने टीम का चयन किया। क्या उन पर किसी का नाजायज दबाव था? या उनकी खिलाड़ियों को चुनने की योग्यता-क्षमता ही बेहद खराब है?

आज एक किस्म से दूसरे दिन ही असम ने भी उत्तराखंड को एक पारी और 90 रनों से मात दे डाली। दूसरी पारी में तो टीम तीन अंकों का स्कोर भी नहीं बना पाई। अब तक के चारों मैचों में मेहमान खिलाड़ियों ने इतना खराब प्रदर्शन किया कि उसकी मिसाल नहीं। उन्मुक्त चंद और तन्मय श्रीवास्तव को उनकी मूल टीमों ने बाहर किया हुआ था। हम उनके द्वार पर जा के न जाने क्या सोच के उनको ले आए। ऐसा लग रहा जैसे कोई डील कर के लाए हों उनको। ऐसा थोड़ी था कि देश में उनसे बेहतर मेहमान खिलाड़ियों की कमी थी।

दोनों बारी-बारी से उत्तराखंड के कप्तान बनाए गए। पहले उन्मुक्त बने। तीनों मैच बुरी तरह हारे तो तन्मय को कमान दी। तकदीर सिर्फ कप्तानी से थोड़ी बदल जाती है। सो तन्मय की अगुवाई में और बुरी तरह टीम हार गई। रणजी  ट्रॉफी में उत्तराखंड का प्रदर्शन ऐसा चल रहा मानों पनसारियों को टीम में शामिल कर लिया है। उनके हाथों में बल्ला-बॉल थमा दिया गया हो। फिर विरोधी टीमों से भिड़ने के लिए मैदान में उतार डाला हो। ऐसा भी नहीं कि प्रशिक्षकों को टीम चुनने की तमीज नहीं है। ऐसा लगता है कि वे टीम चुनने में किसी दबाव में हैं। मैच देख के लग रहा कि मैदान में शेरों के सामने मिमियाते मेमने उतारे जा रहे। जो सिर्फ हलाल हो रहे।

टीमों के चयन को ले के किस तरह के आरोप शुरू से लग रहे हैं, दुनिया जान चुकी है। क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड इस मामले में देश भर में बदनाम हो चुकी है। इतनी जल्दी ये सब होना उत्तराखंड और यहाँ की प्रतिभाओं के लिए दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। एसोसिएशन में किस तरह के लोग घुस गए हैं। किस तरह का फर्जीवाड़ा उन्होंने रजिस्ट्रार ऑफिस में कर चुके हैं। चुनाव में किया। ये सभी जानते हैं। जिस माहिम वर्मा को बीसीसीआई में उपाध्यक्ष बनाया गया है, वह तमाम फर्जीवाड़े में शामिल है। साल 2009 में सदस्य बनने से पहले वह 2008 में संयुक्त सचिव और उससे पहले बिना कुछ पद ग्रहण किए ही उन दस्तावेजों पर दस्तखत कर चुके हैं, जिसमें राजीव शुक्ला-रविनाथ रमन और कई अहम नामों को सदस्यता दी गई।

माहिम के खिलाफ खुद सुप्रीम कोर्ट की प्रशासकों की समिति के अध्यक्ष विनोद राय ने सर्वोच्च अदालत को रिपोर्ट दी थी कि माहिम को BCCI में रखा नहीं जा सकता है। इन सब मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट में इसी महीने सुनवाई होनी है। एक राज्य जो चार महीने पहले ही क्रिकेट की दुनिया में जन्मा, उसका सुप्रीम कोर्ट में घपलों के मामले में तलब हो जाना, दुर्भाग्य ही है। टीमों के चयन में इतने आरोप घपलों और घूस खोरी के लगे हैं कि रणजी ट्रॉफी में उत्तराखंड के प्रदर्शन से सिर्फ अंजान लोग ही चौंक सकते हैं।

CAU का हाल देखिये। अध्यक्ष जोत सिंह गुनसोला की क्रिकेट पृष्ठभूमि नहीं है, ये सभी जानते हैं। सचिव की कुर्सी माहिम के हटने के बाद से खाली है। माहिम भी क्रिकेट पृष्ठ भूमि से दूर हैं। उनके हटने के बाद उनकी ज़िम्मेदारी संयुक्त सचिव अवनीश वर्मा को नहीं दिया गया है। जो किसी की समझ में नहीं आ रहा है। कोषाध्यक्ष पृथ्वी सिंह नेगी साफ कह चुके हैं कि खर्चों के बिल तमाम गड़बड़ियों से भरे हैं। उन्होंने ऐतराज जताया। इसके बावजूद आपत्तियों को हटाए बिना उनको अध्यक्ष ने मंजूरी दे दी। जो गंभीर वित्तीय अनियमितता की ओर ईशारा कर रहा है।

उपाध्यक्ष संजय रावत, जो मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के करीबी रिश्तेदार हैं, भी एसोसिएशन में चल रहे खेल से नाखुश हैं। वह तकरीबन दरकिनार ही हैं। पूर्व अध्यक्ष और चार दशकों तक उत्तराखंड में क्रिकेट की अलख जलाए रखने वाले हीरा सिंह बिष्ट खुले आम अपनी नाराजगी तीखे तेवरों के साथ CAU के प्रति जाहिर करने से नहीं हिचकते हैं। आरोप हैं कि एसोसिएशन यूपी से और राजीव शुक्ला के ईशारे पर ही चल रही है। उत्तराखंड के पीसी वर्मा-माहिम वर्मा उनकी ही लॉबी से हैं। गुनसोला खुद इसी लॉबी का हिस्सा हो चुके हैं। जो ये लॉबी चाहती है, वही होता है। प्रशिक्षकों-चयनकर्ताओं-मैनेजरों की नियुक्तियों से ले के ग्राउंड-स्टेडियम के चयन तक में यही लॉबी फैसले कर रही है।

बीसीसीआई ने हाल ही में कई राज्यों को खर्चों का भुगतान किया। इसमें देहरादून के तनुष क्रिकेट एकेडमी को 55 लाख रुपए का भुगतान हुआ है। जो चौंकाता है। एकेडमी के मालिक संजय गुसाईं हैं। उनका बेटा तनुष उत्तराखंड टीम से खेल रहा है। यहाँ मामला साफ-साफ हितों के टकराव का है। फिर भी तनुष एकेडमी में मैच खेले जा रहे हैं। देहरादून में अच्छे क्रिकेट ग्राउंड की कमी नहीं है। फिर क्यों तनुष ग्राउंड का चयन? क्या CAU ये सब जान-बूझ के कर रही? उसको नियम पता नहीं है, ऐसा तो सोचा भी नहीं जा सकता। एसोसिएशन में क्या चल रहा, ये इससे भी पता चल जाता है कि उसने अकाउंटेंट दिनकर जोशी को बर्खास्त कर दिया है। जोशी को बीसीसीआई ने सीधे नियुक्त किया था।

कोषाध्यक्ष नेगी ने ये तो माना कि जोशी उनके मातहत था, लेकिन इस बात से साफ इंकार किया कि इस कर्मचारी को हटाने से पहले उनसे भी सहमति ली गई। बहरहाल, इन सभी पर फिर विस्तार से चर्चा होगी। फिलहाल, रणजी ट्रॉफी में उत्तराखंड के बदतरीन प्रदर्शन के लिए मरसिया पढ़िये। जिम्मेदारों से जवाब तलब किया जाए। उनको कुर्सी छोड़ने के लिए कहा जाए। लाल बहादुर शास्त्री ने रेल हादसे पर मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उनसे प्रेरणा लेंगे? एसोसिएशन वाले। उस शख्स को भी तलाश किया जाए जिसने मेहमान खिलाड़ियों की नायाब खोज की।

उससे सवाल किया जाए कि आखिर क्या देख-सोच के वह ऐसे मेहमान खिलाड़ियों को ले आया? जिनका प्रदर्शन जीरो से कम नहीं तो ज्यादा भी नहीं।  कोई पूछें उससे कि मेहमान खिलाड़ियों से कोई खुफिया डील तो नहीं हुई थी न? या किसी के दबाव में उनको टीम में लिया? जवाब तो देना ही चाहिए। एसोसिएशन के लंबरदारों-ओहदेदारों को। वे अभी तो सिर्फ पाँच सितारा होटलों और मुफ्त हवाई सफर का लुत्फ ले रहे हैं, जिसके लिए उनको लाया नहीं गया था। अभी तक वे न प्लेयर्स एसोसिएशन न ही दो दर्जन से अधिक की समितियों का गठन कर पाए हैं। न ही लोकपाल की ही नियुक्ति की है। लोकपाल रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज या हाई कोर्ट जज हो सकते हैं। उनका होना अनिवार्य है। CAU क्यों लोकपाल नियुक्ति से डर रहा?

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