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मंत्रिपरिषद विस्तार पर त्रिवेन्द्र को मोदी-शाह का ग्रीन सिग्नल!

उत्तराखंड देहरादून राजनीती

खुद बने रहो..खाली सीटों को भी भरो!

धामी की खुलेगी तकदीर! बनेंगे मंत्री!

मौका है खुद की टीम मजबूत करने का

धन सिंह का प्रमोशन मुमकिन

Chetan Gurung

ऐसा लग रहा है कि पीएम नरेंद्र मोदी और सरकार-संगठन की जान अमित शाह ने मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को दोनों तरह के संकेत दे दिए हैं। एक तो ये कि आपकी कुर्सी को कोई खतरा नहीं है। आगे बढ़ो। दूसरा-मंत्रिपरिषद की खाली कुर्सियों को अब भर डालो। दोनों की सुगबुगाहट इन दिनों वाकई तेज है। त्रिवेन्द्र के लिए ये सुनहरा पल है। खुद की पुरानी खामियों को पहचान और सुधार के आगे बढ़ने के लिए। साथ ही अपने विश्वासपात्रों के दस्ते का विस्तार करने का। खुद को मजबूत करने का। मंत्री लग रहा है अब कभी भी बनाए जा सकते हैं। सबसे सुर्ख-गरम चर्चा और निगहबानी इस पर भी है कि पुष्कर सिंह धामी इस बार मंत्री की शपथ लेते हैं या नहीं? ये भी मुमकिन है कि स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री और शक्तिशाली डॉ. धन सिंह रावत प्रोन्नत हो के मंत्री बन सकते हैं।

इसमें शक नहीं है कि त्रिवेन्द्र को मंत्रिपरिषद का आकार छोटा होने के कारण दिक्कत हो रही है। कामकाज की रफ्तार पर इससे बहुत ही नकारात्मक असर पड़ रहा है। नई योजनाओं को लाने और उनका सही तथा प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन उम्मीदों के मुताबिक नहीं हो पा रहा है। खुद मुख्यमंत्री के पास 55 के करीब महकमे हैं। इनमें ज़्यादातर बड़े और अहम महकमे हैं। खनन, ऊर्जा, पीडबल्यूडी, गृह, कार्मिक, सतर्कता, तकनीकी शिक्षा, पेयजल, वित्त, आबकारी ऐसे महकमे हैं, जिनको निरंतर और करीबी निगरानी की जरूरत होती है। मुख्यमंत्री के पास तमाम सरकारी ही नहीं पार्टी के काम भी होते हैं। उसके लिए ये तकरीबन नामुमकिन है कि वह हर महकमे को समान रूप से तवज्जो दे सके।

दूसरी ओर कई मंत्री तकरीबन मामूली काम लिए बैठे हैं। उनके पास या तो महकमे कम हैं या फिर उन महकमों में पर्याप्त काम नहीं है। यही वजह है कि उत्तराखंड में नौकरशाही बुरी तरह हावी हो गई है। कोई भी फ़ाइल तभी क्लियर हो पाती है, जब उसको नौकरशाह का समर्थन हासिल हो। मंत्रियों के लिए दूसरे महकमों में किसी समर्थक का काम करना दूर की बात है। अपने महकमे में ही वे काम आसानी से करवा लें, बड़ी बात है। एक महिला सचिव ने अपने दो मंत्रियों को दांतों चने चबवा डाले थे। एक और प्रभारी सचिव ने अपने मंत्री की एक सिफारिशी फ़ाइल को तब भी बुरी तरह मथ डाला, जब उसके सचिव भी चाहते थे कि काम हो जाए। मामला मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह तक पहुंचा।

ऐसे हाल में मंत्रियों के कमजोर होने से राज-काज भी ढीला हो रहा है। इस मोर्चे में तो अधिक सुधार की गुंजाइश दिख नहीं रही, पर मंत्रियों की खाली कुर्सियों को भर दिया जाता है, तो शायद तस्वीर में कुछ रंग खिल सकते हैं। खास सूत्रों के मुताबिक हाई कमान ने भी इस पहलू को समझ लिया है। त्रिवेन्द्र लंबे समय से खाली कुर्सियों को भर के मंत्रिपरिषद मजबूत करने की मंशा रखते हैं। अब जबकि विधानसभा चुनाव के लिए दो साल ही रह गए हैं, तो त्रिवेन्द्र के लिए ये बेहद जरूरी हो चुका है कि वह पार्टी के साथ ही खुद को भी निजी तौर पर सशक्त करें। पार्टी के दुबारा जीत के सत्ता में आने की सूरत में उनको इसका फायदा सियासी तौर पर मिल सकता है। खरी बात तो ये है कि मंत्रिपरिषद के विस्तार में बहुत देर हो चुकी है। अब और देर होना हाराकिरी होगी। त्रिवेन्द्र और बीजेपी दोनों के लिए।

नए लोगों को त्रिवेन्द्र मंत्रिपरिषद में जगह मिलनी है तो फिर वे चेहरे कौन होंगे? इनमें अगर सबसे बड़ा नाम कोई सामने आ रहा है तो वह खटीमा वाले पुष्कर सिंह धामी है। उनका समीकरण हालिया सालों में त्रिवेन्द्र के साथ बहुत अच्छा चल रहा है। महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी और संघ के साथ उनके रिश्ते शुरू से बहुत अच्छे रहे हैं। युवा होने के साथ ही व्यावहारिक समझे जाने वाले धामी को विस्तार में जगह नहीं मिलती है, तो ये बहुत बड़ी खबर होगी। नए चेहरों में चन्दन रामदास और स्वामी यतीश्वरानंद को भी दावेदारों में शुमार किया जा रहा है।

पुरानों की बात आती है तो बलवंत भौर्याल को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। आश्चर्यजनक रूप से अभी तक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल, हरबंस कपूर, मुन्ना सिंह चौहान के नामों पर चर्चा खास नहीं सुनी जा रही है। चुफाल, कपूर मंत्री रह चुके हैं। चौहान को बीजेपी में ज्ञान के मामले में तकरीबन वही दर्जा हासिल है, जो दिवंगत मंत्री प्रकाश पंत को हासिल था। उनका मंत्री बनना हैरत भरा कहा जाएगा। पंत की पत्नी और उनकी जगह विधायक बनीं चंद्रा पंत भी अगर मंत्रिपरिषद में जगह बना लेती हैं तो बहुत बड़ा आश्चर्य नहीं होगा। त्रिवेन्द्र इस मौके का इस्तेमाल टीम में बदलाव करने और तीन के अलावा अन्य नए चेहरों को भी मौका देने के लिए कर सकते हैं।

कम से कम दो मंत्री ऐसे हैं, जिनके स्थान पर वह अपनी टीम के दो लोगों को मंत्रिपरिषद में ला सकते हैं। चाहे तो वह और भी जगह बनवा सकते हैं। उनको रोकने वाला कोई नहीं दिखता है। त्रिवेन्द्र के पास मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड जरूर होगा। जिनको हाई कमान को दिखा के वह अपनी मर्जी की नई भर्तियाँ मंत्रिपरिषद में कर सकेंगे। ज़्यादातर मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड उनको कृपांक वाला भी नहीं दिखाते हैं। ये सभी जानते हैं। त्रिवेन्द्र उनको हटाने का हौसला दिखा सकेंगे या नहीं, सवाल सिर्फ इसका है। राज्यमंत्री धन सिंह के लिए ये मौका है, खुद को मंत्री पद पर प्रोन्नत होते देखने का। त्रिवेन्द्र की टीम में राज्यमंत्री होने के बावजूद धनदा के नाम से लोकप्रिय रावत का जलवा किसी भी पूरे मंत्री से अधिक है। उनको मोदी-शाह और संघ के बॉस मोहन भागवत तक निजी तौर पर अच्छी तरह जानते हैं।

इस सबके बीच ये भी साफ है कि त्रिवेन्द्र को जिस तरह मंत्रिपरिषद विस्तार के लिए ऊपर से ईशारे मिल रहे हैं, वह आगे भी उनके स्थायित्व और कुर्सी की गारंटी को मजबूती दे रहे हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाए जा रहे किसी शख्स को मंत्रिपरिषद विस्तार का हक नहीं दिया जाता है। ये देखने वाली बात होगी कि त्रिवेन्द्र इस हक का इस्तेमाल कितनी कुशलता से कर पाते हैं। किस तरह संतुलित समीकरण के साथ जल्द से जल्द मंत्रिपरिषद विस्तार कर इसका भरपूर सियासी फायदा उठाते हैं। त्रिवेन्द्र के बने रहने की सूरत में पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी पर कुमायूं के साथ ही ब्राह्मण चेहरे का ठप्पा लगना भी तयशुदा है।

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