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पुलिस आयुक्त प्रणाली और उत्तराखंड

उत्तराखंड देहरादून राजनीती

The Corner View

Chetan Gurung  

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने पुलिस आयुक्त प्रणाली को लागू कर दिया है। लखनऊ और नोएडा (वैसे गौतमबुद्ध नगर) में इसका पाइलट प्रोजेक्ट शुरू हो चुका है। ये सफल रहते हैं या सकारात्मक नतीजे दिखते हैं तो फिर कानपुर, इलाहाबाद, गोरखपुर, मेरठ, आगरा, वाराणसी और बरेली सरीखे जिलों में भी पुलिस आयुक्त बिठाए जाएंगे, ये तय है। क़व्वाल टाउन में तो पक्का। उत्तराखंड में भी IPS लॉबी काफी कोशिश करती रही है कि कम से कम तीन बड़े मैदानी जिलों (देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर) में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू हो जाए। खास तौर पर प्रेमदत्त रतुड़ी, कंचन चौधरी भट्टाचार्य और सुभाष जोशी जब DGP थे, तो वे इस कोशिश में लगे रहते थे कि पुलिस आयुक्त प्रणाली को किसी तरह राज्य में लागू कर दिया जाए।

IPS लॉबी की ये कोशिशें बाद में ठंडी पड़ गई, लेकिन अंदरखाने वे इस चाह को रखते जरूर हैं। खास तौर पर वरिष्ठ हो गए आईपीएस अफसरों की ये विशेष चाहत है। उत्तराखंड का कैडर कुछ ऐसा है कि एक बार एसएसपी की कुर्सी से हटे या प्रोन्नत हो गए तो फिर उनके पास आगे के लिए कोई कैरियर आकर्षण नहीं रह जाता है। DGP सिर्फ एक ने बनना है और पुलिस मुख्यालय की बाकी कुर्सियों का कोई मोल नजर नहीं आता है। सिर्फ निदेशक (सतर्कता) और इंटेलिजेंस चीफ की कुर्सी ही थोड़ा बहुत आकर्षण चुराती है। मजबूरी में। IPS लॉबी की पुलिस आयुक्त प्रणाली की चाह रखने की वजह ये है कि इससे उनके पास IGP या फिर ADGP हो जाने की सूरत में भी फील्ड पोस्टिंग और SSP से अधिक ताकतवर हो जाने का विकल्प उपलब्ध हो जाएगा।

SSP के पास पुलिस शक्तियाँ तो हैं, लेकिन CRPC में मजिस्ट्रेट को हासिल हक से वे बहुत दूर हैं। उनको लाठी चार्ज या गोलियां चलाने के लिए भी मजिस्ट्रेट के लिखित आदेश की दरकार होती है। धरना-प्रदर्शन और आंदोलन के लिए मंजूरी भी मजिस्ट्रेट ही देते हैं। भले कानून-व्यवस्था से जुड़ा मसला होने के कारण इनकी मंजूरी में पुलिस की भूमिका अहम होनी चाहिए। ऐसा IPS लॉबी का मानना है। 1994 में उत्तराखंड आंदोलन के चरम पर होने के दौरान PAC ने गोलियों की बारिश कर मसूरी में आंदोलनकारियों की लाशें बिछा दी थीं। इसके लिए उसने किसी की मंजूरी नहीं ली थी। बाद में उस वक्त के SDM (मसूरी) बीपी जसोला से जबरन दस्तखत कराए गए थे। ऐसा मुझे तब के एक PCS अफसर ने खुद बताया था। वह भी गोलीकांड के बड़ा देहरादून से घटनास्थल पर पहुंचे थे। बाद में वह IAS बने। कुछ ही वक्त पहले वह उत्तर प्रदेश में आयुक्त बन के रिटायर हुए। 

कहने का मतलब पुलिस आयुक्त प्रणाली का एक फायदा ये है कि अगर कभी गोली चलाने या लाठीचार्ज करने की नौबत आए तो पुलिस को मजिस्ट्रेट का मुंह न ताकना पड़े। उसकी गुजारिश न करनी पड़े। आदेश पर दस्तखत की अहमियत पर एक बहुत बड़ा मामला मुझे एक पूर्व मुख्य सचिव ने बताई। जिस वक्त अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाई जा रही थी, सुरक्षा बल कुछ नहीं कर रहे थे। शासन को तत्काल लिखित संदेश भेजा गया कि कार सेवक ध्वस्तिकरण में जुट गए हैं। क्या आदेश है? लखनऊ सचिवालय के एक वरिष्ठ नौकरशाह ने इसकी जानकारी मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को दी। उन्होंने लिखित आदेश दिया कि कार सेवकों को रोका जाए लेकिन बल प्रयोग कम से कम किया जाए। नतीजा ये हुआ कि मस्जिद ढह गई। कल्याण सरकार भी ढह गई। कल्याण के दस्तखत आदेश में नहीं थे। बदली सियासी फिजाँ से घबराए नौकरशाह हट चुके मुख्यमंत्री के पास गए। वे उस आदेश पर दस्तखत करने के लिए रिरिया गए, जो उन्होंने कम बल प्रयोग के बाबत दिए थे।

पूर्व मुख्य सचिव को ये बात खुद UP के ही उनके एक मित्र नौकरशाह ने बताई। ये भी जानकारी दी कि उस आदेश पर आज तक मुख्यमंत्री कार्यालय की मुहर नहीं लगी है। पुलिस आयुक्त प्रणाली में ये फायदा तो है कि कई बार आपातकाल की सूरत में पुलिस को सख्त फैसले करने के लिए न तो रुकना पड़ता है न ही उसको मजिस्ट्रेट के चक्कर लगाने पड़ते हैं। शस्त्र लाइसेन्स भी पुलिस ही जारी सकती है। ये मजिस्ट्रेट शक्तियाँ ही हैं, जो जिलों में भी प्रशासनिक अफसरों को पुलिस अफसरों से ऊपर रखती हैं। पुलिस को उनका मुंह ताकना पड़ता है। प्रशासनिक अफसर ही सरकार की नीतियाँ तय करते हैं। शासन में IAS अफसर ही हैं। वे कभी नहीं चाहेंगे कि उनकी शक्तियों का इस्तेमाल पुलिस अफसर करें या फिर लुत्फ लें। इस मामले में कोई भी नौकरशाह कोई समझौता  करने को राजी नहीं होगा। साल 2005 और 2007 के आसपास IPS अफसरों ने ख़ासी कोशिशें की थीं। वे चाहते थे कि राज्य में पुलिस प्रणाली कम से कम देहरादून में लागू कर के देख लिया जाए। सफल हुआ तो बाकी बड़े मैदानी जिलों में लागू हो जाए।

बाद में मुख्य सचिव बने सुरजीत किशोर दास यूं तो सरल किस्म के शरीफ इंसान हैं, लेकिन IAS लॉबी के साथ किसी किस्म की छेड़छाड़ या फिर उसकी शक्तियों पर IPS कैडर के दखल को उन्होंने सेवा के दौरान बर्दाश्त नहीं किया। उन्होंने कायदे से खामोशी संग IPS लॉबी को बैक फुट पर रख दिया था। उनके वक्त पुलिस मुख्यालय से दो कोशिशें तेजी से हुई थीं। एक तो पुलिस आयुक्त प्रणाली को लागू करना और दूसरा पुलिस महकमे के लिए एक अलग हेलिकॉप्टर की खरीद। दास ने दोनों को ही ठंडे बस्ते में डाल के IPS लॉबी की दाल गलने नहीं दी। एक बार उनके पास दो IAS अफसरों के खिलाफ घोटाले के मामले में सतर्कता जांच की फ़ाइल भी पुलिस मुख्यालय से आई थी। उसको भी उन्होंने ये कहते हुए खारिज कर दिया था कि IAS अफसरों को रोजाना सैकड़ों फाइलों को निपटाना होता है। कई बड़े फैसले लेने होते हैं। नीतियाँ बनाने के लिए मंथन करना पड़ता है। ऐसे में काम के बोझ के चलते किसी फ़ाइल में उनसे गलती की गुंजाइश रहती है। इतने भर में सतर्कता जांच बिठाना IAS लॉबी को हतोत्साहित करना होगा।

IAS लॉबी उत्तराखंड पुलिस एक्ट में पुलिस को जिलाधिकारी के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखने के हक में भी नहीं थी। पुराने एक्ट के मुताबिक ये जरूरी था कि किसी भी थाना या चौकी के प्रभारी की नियुक्ति या हटाने में जिलाधिकारी की मंजूरी ली जाए। नए एक्ट में ये अधिकार हटा दिया गया है। यही वजह है कि आज के दौर में SSP अब जिलाधिकारियों को बॉस की नजर से नहीं बल्कि पार्टनर की निगाह से देखते हैं। बोलते भी पार्टनर ही हैं। नौकरशाहों को लगता है कि पुलिस आयुक्त प्रणाली को अमल में लाया जाता है तो उत्तराखंड में जितना भी उनका असर पुलिस और कानून-व्यवस्था में है, वह एकदम ही खत्म हो जाएगा। साथ ही IPS लॉबी उन पर हावी होना शुरू हो जाएगी। IPS लॉबी को जब भी मौका मिलता है, वह IAS लॉबी के समकक्ष खुद को साबित करने की कोशिश करती रही है। प्रोटोकॉल के बारे में भी बेहद सचेत रहने वाले के प्रमुख सचिव (गृह) को मैंने एक फोटो सेशन में देखा है। जब DGP को VVIP के साथ दाएँ बैठने का सौभाग्य मिला था। उनके बॉस प्रमुख सचिव उनके पीछे की पंक्तियों में बाकी लोगों के साथ खड़े थे।

बेशक प्रमुख सचिव ने इसका मुद्दा इसलिए भी नहीं बनाया होगा कि DGP से उनके रिश्ते निजी तौर पर भी अच्छे थे, लेकिन उन्होंने इसका बुरा माना जरूर था। DGP बीएस सिद्धू को भी मुख्य सचिवों के साथ हमेशा बेतकल्लुफ़ी संग ही मिलते देखा। असलियत यही है कि नौकरशाहों को ये भी लगता है कि जब आज IPS लॉबी मौका मिलते ही उनको दरकिनार करने की कोशिश करती है तो मजिस्ट्रेट शक्तियाँ मिलने पर वह उनको और अधिक उच्छृंखल होते देखा जा सकेगा। ये नौकरशाहों को बर्दाश्त नहीं है। वे ये भी नहीं मानते हैं कि पुलिस आयुक्त प्रणाली सभी जगह कारगर है। या फिर पुलिस तंत्र तथा कानून-व्यवस्था इससे बेहतर होती है। पूर्व गृह सचिव विजेंद्र पाल के मुताबिक अगर मुंबई, पुणे और चेन्नई को ही पुलिस आयुक्त प्रणाली के लिए मॉडल माना जाए तो ठीक नहीं होगा। वहाँ की पुलिस शुरुआत से ही अच्छी मानी गई। उसके पीछे पुलिस आयुक्त प्रणाली की कोई भूमिका नहीं थी। दिल्ली में पुलिस आयुक्त प्रणाली है, लेकिन वहाँ कानून-व्यवस्था देखिये।

पूर्व मुख्य सचिव आलोक जैन के मुताबिक बहुत बड़े शहरों के लिए पुलिस आयुक्त प्रणाली कुछ हद तक ठीक हो सकती है। देश के महानगरों की आबादी एक करोड़ से अधिक है। उनकी तुलना 10 लाख की आबादी वाले देहरादून सरीखे शहरों से नहीं की जा सकती है। फिर जो एक्सपोजर और व्यापक अनुभव मजिस्ट्रेट के पास रहता है, उसका फायदा कई बार कानून-व्यवस्था को शांत रखने में भी मिलता है। उससे लोग बेहिचक मिलते हैं। इसका फायदा उनको फीड बैक लेने, लोगों संग व्यावहारिक रिश्ते रखने तथा प्रशासन चलाने में मिलता है। पुलिस आयुक्त प्रणाली से सिर्फ IPS कैडर के वरिष्ठ अफसरों को कुछ फायदा हो सकता है। जिनको पुलिस आयुक्त बनने का मौका मिल जाएगा। पुलिस आयुक्त प्रणाली में अगर वरिष्ठ IPS अफसरों को फायदा होगा तो PPS से IPS बने या फिर SSP रैंक के अफसरों को नुक्सान होगा। उनके लिए पुलिस आयुक्त बनने के अवसर एक किस्म से छिन जाएंगे।

SSP रहते अभी वे चारों बड़े जिलों का चार्ज ले रहे हैं। सच तो ये है कि अधिकांश जिलों में SP रैंक के अफसरों को SSP की ज़िम्मेदारी दी हुई है। देहरादून इन दिनों अपवाद है। यहाँ DIG अरुण मोहन जोशी को SSP की कुर्सी पर बिठाया हुआ है। ऐसा पहले भी हुआ है। ये कोई अजूबा नहीं है। सीनियर IPS निचली कुर्सी पर खुशी-खुशी बैठते रहे हैं। पूर्व DGP विजय राघव पंत और अजय जोशी कुमायूं के रेंज प्रभारी तब भी रहे, जब वे ADGP हो चुके थे। ये कुर्सी DIG की है। अरुण को उनकी तेज तर्रार कार्य शैली और हर वक्त सतर्क रहने के चलते शायद प्रोन्नति के बावजूद SSP की कुर्सी पर कायम रखा गया है। जब ADG या IGP पुलिस आयुक्त बनेंगे तो फिर SP-SSP-DIG रैंक वालों के लिए इन जिलों में पुलिस चीफ बनना तकरीबन ख्वाब हो जाएगा। उनके लिए तब सिर्फ पहाड़ के जिले ही रह जाएंगे।

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