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DEO-इंस्पेक्टर के आगे शरणागत सरकार!

उत्तराखंड देहरादून

एक को सस्पेंशन-चार्जशीट नहीं..दूसरे की फर्जी भर्ती बरकरार

जांच रिपोर्ट में फँसने के बाद अब ऑडिट रिपोर्ट का इंतजार क्यों?

दागियों पर BJP के सूबेदारों का जबर्दस्त वरदहस्त

Chetan Gurung

देहरादून के जिला आबकारी अधिकारी (DEO) मनोज उपाध्याय और इसी महकमे के इंस्पेक्टर शुजआत हुसैन के आगे शक्तिशाली समझी जाने वाली त्रिवेन्द्र सरकार शरणागत क्यों? उपाध्याय को दो-दो जांच में दोषी पाए जाने के बावजूद सरकार की हिम्मत नहीं हो रही कि सस्पेंड कर चार्जशीट थमा दी जाए। महकमे के ही इंस्पेक्टर शुजआत हुसैन पर हाई कोर्ट में इस स्वीकारोक्ति के बावजूद सरकार कोई फैसला आज तक नहीं ले पाई है। हुसैन की नौकरी पर खुद सरकार ने अंगुली उठा दी है। उपाध्याय पर तमाम आरोपों के बाद अब सरकार ने DEO कार्यालय का ऑडिट भी शुरू कर दिया है। ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या अब ऑडिट रिपोर्ट को अनुकूल बता के उपाध्याय को बचाने की कोशिश तो नहीं की जा रही!

उपाध्याय के खिलाफ विभागीय जांच दो बार हो चुकी है। एक बार संयुक्त आयुक्त ने और दूसरी बार अपर आयुक्त ने जांच की। दोनों की रिपोर्ट इस कदर घातक है कि उनको पढ़ने के बावजूद कोई कार्रवाई न होने का मतलब साफ है। सरकार जीरो टालरेंस के नारे को भूल के..तमाम बदनामियां सह के भी इस मामले में कोई कार्रवाई न करने के लिए भीषण दबाव में है। लोग अब ये जानना चाह रहे हैं कि आखिर पीडबल्यूडी के इंजीनियरों पर फरसा ले के टूट पड़ने वाले मुख्यमंत्री क्यों शराब वालों पर इस कदर मेहरबान हो रहे हैं? वह भी तब जब उनकी ताकत और आला कमान पर प्रभाव से हर कोई वाकिफ है।

अंदरखाने की खबर ये है कि बीजेपी के कुछ ऐसे नाम शराब के अफसरों के लिए छतरी बने हुए हैं, जिनकी पैठ मुख्यमंत्री कार्यालय में बहुत गहरी है। इनमें से एक जहां चुनी गई अहम सीट पर है तो दूसरे को हाल ही में मलाईदार राजनीतिक कुर्सी दी गई है। साग-सब्जी-फल-ठेकों वाली। शासन के अफसर भी उनके आगे नतमस्तक हैं। ऐसी भी खुसर-पुसर है कि देहरादून के DEO दफ्तर पर ऑडिट शुरू कर दिया गया है। इसके बारे में भी ये कहा जा रहा है कि ये कहीं जांच रिपोर्ट में फँसने के बाद बचाने की कोशिश का हिस्सा न हो। ऑडिट में मिलीभगत कर क्लीन चिट दे के विभागीय जांच रिपोर्ट को दबा न दिया जाए।

इंस्पेक्टर शुजआत भी महकमे के उन कर्मचारियों में हैं, जो विवादों से गहरा नाता रखते हैं। जो महकमे के लिए सिर दर्द साबित होते रहे हैं। अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने शुजआत की नियुक्ति को ही हाई कोर्ट में चुनौती दी है। अदालत में सरकार ने खुद माना है कि उसकी नियुक्ति गलत है। उर्दू अनुवादक को गढ़वाल-कुमायूं-बुंदेलखंड छोड़ के भरण-पोषण के लिए मुलायम सरकार ने यूपी विभाजन से पहले 25 साल पहले एक साल के लिए रखा था। साथ ही लिपिक संवर्ग में रखा था।

शुजआत की अहम बात ये है कि वह देहरादून (गढ़वाल) में तैनाती हासिल करने में सफल रहे। अहम पहलू ये कि ढाई दशक बाद भी वह न सिर्फ नौकरी में हैं बल्कि लिपिक से इंस्पेक्टर बन गए। राजधानी के सेक्टर-1 के। जो सबसे मलाईदार समझा जाता है। त्रिवेन्द्र ने PWD इंजीनियरों पर कहर बरसाने के बाद WIC क्लब के मालिक सचिन उपाध्याय के खेल को भी खत्म करते हुए, SIT जांच बिठा दी। सचिन आज गिरफ्तार भी हो गए। ये हैरान करता है कि शराब वाले न जाने कौन सा मंत्र फूँक दे रहे। जो सरकार को एकदम शक्तिहीन कर दे रहे।

ऐसा न होता तो DEO उपाध्याय और इंस्पेक्टर शुजआत इस कदर चैन की बंशी न बजा रहे होते। दोनों दंड भुगत रहे होते। सरकार को ये तो साफ करना ही चाहिए कि आखिर दोनों के खिलाफ कार्रवाई न कर पाने के लिए उसके सामने कौन सी पहाड़ सी मजबूरी है। जीरो टालरेंस नारा दांव पर है। आखिर अपुष्ट ऑडियो पर सचिवालय के संयुक्त सचिव और आबकारी के ही महिला इंस्पेक्टर पर कार्रवाई करने वाली सरकार अपनी ही जांच रिपोर्ट को कैसे तहखाने में दबा सकती है?

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