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टीम बदहाल..CEO दिल्ली..सचिव है नहीं:उत्तराखंड क्रिकेट

उत्तराखंड खेल देहरादून

नहीं हो रहे भुगतान..खिलाड़ियों में नहीं जोश

बीच सीजन में उन्मुक्त से कप्तानी छीनने का राज क्या है?

सुप्रीम कोर्ट में नई बेंच के इंतजार में लटका CAU का भविष्य

Chetan Gurung

रणजी ट्रॉफी में बदहाली..CEO अमृत माथुर का दिल्ली ठिकाना बनाना और सचिव की खाली कुर्सी न भरने की साजिश..ये है उत्तराखंड क्रिकेट की लगाम थामे क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड का आलम। आलम ये है कि घोटाले और आरोपों से घिरी एसोसिएशन दो फाड़ में साफ-साफ बंट चुकी है। सुप्रीम कोर्ट में नई बेंच का निर्धारण न हो पाने के कारण CAU को मान्यता के बारे में सुनवाई शुरू नहीं हो पा रही है। बीच सीजन में जिस तरह उत्तराखंड मूल के उन्मुक्त चंद से रणजी टीम की कप्तानी छीन के यूपी मूल के तन्मय श्रीवास्तव को दी गई, उससे भी CAU के कर्ता-धर्ताओं पर अंगुली उठ रही है।

टीम के चयन में धांधली और घूसख़ोरी के आरोप शुरुआत से ही खूब लगे। पैसे ले के चयन के आरोप ही नहीं लगे, बल्कि ऑडियो भी सामने आए। नियुक्तियों में भी जम के गड़बड़ी सामने आई। खुद CEO अमृत माथुर की नियुक्ति के बारे में कोई ये नहीं बता पा रहा है कि उनकी नियुक्ति किसने की? किस प्रक्रिया से हुई। प्रशिक्षकों और चयनकर्ताओं तथा बाकी छोटी-मोटी मैनेजर किस्म की नियुक्तियों पर तो बात करनी ही बेकार है।

उत्तराखंड की मान्यता के लिए जब शोर मचाया जाता था तो दलील दी जाती थी कि यहाँ प्रतिभावान क्रिकेटरों की पूरी फौज है। इसमें शक नहीं कि पहाड़ से निकले लड़कों ने अपने खेल से देश में ही नहीं दुनिया में डंका बजाया। अब जब उत्तराखंड को BCCI की मान्यता मिल गई तो टीम का प्रदर्शन शर्मनाक चल रहा है। चयन सही होता तो उत्तराखंड का प्रदर्शन कहीं बेहतर होता। खिलाड़ी भी पसोपेश में हैं। उनके कई बॉस हो गए हैं। उनमें जोश-उत्साह भरने में एसोसिएशन पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है।

CAU से बाहर हो चुके माहिम वर्मा हो या फिर उनके पिता पीसी वर्मा, जो 75 पार वाले हैं, उत्तराखंड क्रिकेट में दखल का लोभ नहीं छोड़ पा रहे हैं। खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को उनकी सुननी पड़ रही। टीम के बदतर प्रदर्शन को ले के चयनकर्ता और खास तौर पर मुख्य चयनकर्ता ओबैद कमाल निशाने पर हैं। अंदरखाने की खबर ये है कि कमाल की राय के बिना ही बीच में टीम बदल दी जा रही। खिलाड़ी अंदर-बाहर किए जा रहे हैं।

मनमुटाव और सामंजस्य न होने के नतीजतन उन्मुक्त को ही कप्तानी से हटा दिया गया। उनके बारे में कहा जा रहा है कि वह कप्तानी और अंतिम एकादश के चयन के मामले में अधिक दबाव सहने को तैयार नहीं थे। इसके चलते ही उनकी जगह यूपी के वाराणसी के तन्मय को कप्तान बना दिया गया। ये हैरानी की बात है कि इतनी बड़ी खबर उत्तराखंड की मीडिया में खबर नहीं बनी। सच यही है कि उत्तराखंड क्रिकेट पूरी तरह यूपी लॉबी और यूपी मूल के लोग ही चला रहे हैं। एसोसिएशन के अध्यक्ष जोत सिंह गुनसोला सिर्फ रबर स्टैम्प हैं। जो यूपी लॉबी का हुक्म होता है, वही करने के लिए वह बाध्य हैं।

अध्यक्ष और सियासी होने के बावजूद गुनसोला इस कदर दबाव में हैं कि वह किसी से न तो मिल रहे न ही फोन रिसीव कर रहे। लोढ़ा कमेटी की सिफ़ारिशों के खिलाफ उनका अध्यक्ष बनना भी सुप्रीम कोर्ट की अवमानना है। गुनसोला पर इसलिए भी आक्षेप लग रहे कि सचिव की कुर्सी न सिर्फ महीनों से खाली है, और वह चुनाव नहीं करवा रहे बल्कि CEO पर भी उनका कोई नियंत्रण नहीं है। आरोप लग रहे हैं कि सचिव का चुनाव न कराने के पीछे उनकी मंशा सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक का इंतजार करना है।

कोर्ट से अगर UPCA-राजीव शुक्ला को राहत मिल जाती है तो शुक्ला फिर से BCCI उपाध्यक्ष की कुर्सी संभाल सकते हैं। तब माहिम को वह कुर्सी खाली करनी होगी। शुक्ला ने ही माहिम को उपाध्यक्ष बनवाया है। वहाँ से हटने पर माहिम को फिर CAU लौटना होगा। यहाँ सचिव की कुर्सी उनके लिए ही आरक्षित रखी गई है। वैसे माहिम को ले कर CoA अध्यक्ष विनोद राय ने पहले ही सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट दे दी थी कि वह BCCI में नहीं आ सकते हैं।

इसके बावजूद माहिम के BCCI में घुस जाने से सौरव गांगुली-जय शाह की जोड़ी पर शक जताया जा रहा है कि वे भी क्रिकेट में सफाई की दृढ़ इच्छा नहीं रखते हैं। दोनों ही कुर्सी संभालने के बाद सबसे पहले अपना कार्यकाल बढ़ाने में लग चुके हैं। इधर, गुनसोला और CAU के पास इसका जवाब नहीं है कि क्या कोई सीट किसी के नाम लिख दी जा सकती है? सचिव न होने पर संयुक्त सचिव अवनीश वर्मा को भी प्रभारी नहीं बनाया गया है। विजिलेन्स और पुलिस के अफसरों के साथ ही रजिस्ट्रार ऑफिस के अफसरों के मुताबिक CAU ने जितनी झूठी सूचनाएँ ऑन रेकॉर्ड दी हैं, वे जांच की सूरत में परेशानी का कारण बनने के पर्याप्त आधार हैं।

CAU के कामकाज को पूरी तरह एक किस्म से CEO माथुर ही संभाले हुए हैं। CAU में काबिल लोगों की कमी के चलते बोर्ड हो या फिर अन्य तरह के मामले, उनको ही सब कुछ देखना-संभालना पड़ रहा है। लिहाजा, वह दिल्ली ही अधिक बैठ रहे हैं। वहीं उन्होंने कैंप कार्यालय खोल लिया है। एसोसिएशन के किसी ओहदेदार की मजाल नहीं जो माथुर से कुछ जवाब तलब भी कर सके। माथुर पूर ऑल इंडिया सेवा के आला अधिकारी रहे हैं। BCCI के Director (Media) रह चुके हैं। उनकी हैसियत का एक भी शख्स CAU में दूर-दूर तक नहीं है।

यही वजह है कि उनको CAU दफ्तर बुलाने और बैठने तक की हिम्मत न गुनसोला न ही कोई अन्य ओहदेदार कर पाया है। जब भी कोई बात या विमर्श करना होता है, खुद अध्यक्ष और अन्य ओहदेदार उनके पास जाते हैं। उधर, कोषाध्यक्ष पृथ्वी सिंह नेगी ने दफ्तर आना छोड़ ही दिया है। वह गुनसोला-वर्मा के यूपी लॉबी के तिलिस्म से बाहर न निकलने और मनमानियाँ होने से बेहद खफा हैं। उनके पास एसोसिएशन की खर्चों से संबन्धित फाइलें भी नहीं आ रही हैं। खुद नेगी ने `Newsspace’ को ये तथ्य बताए।

CAU में घपलों और ढंग से काम न चलने के कारण टीम और एसोसिएशन के खर्चों का भुगतान भी नहीं हो रहा है। सूत्रों के मुताबिक प्रशिक्षकों और चयनकर्ताओं को भी भुगतान नहीं होने से वे परेशान हैं। कोषाध्यक्ष के पास फाइलें न आने और दस्तखत से उनके इन्कार करने के कारण भुगतानों में आगे भी दिक्कत आना तय है। उत्तराखंड की टीम इस साल भी सिर्फ अंडर-19 में ही अच्छा कर रही है। इसके पीछे उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव दिव्य नौटियाल की मेहनत छिपी है।

UCA के पास पिछले साल अंडर-19 का जिम्मा था। उसने इस टीम को तैयार किया और निखार लाने में सफलता पाई। भारतीय टीम के शिविर में उत्तराखंड के खिलाड़ी जगह बनाने और खेलने में सफल भी रहे थे। ये भी हकीकत है कि UCA और नौटियाल के कारण ही उत्तराखंड तथा अन्य राज्यों को BCCI मान्यता मिल सकी। वह सुप्रीम कोर्ट न जाते तो ये मुमकिन नहीं था। एक पूर्व वरिष्ठ क्रिकेटर के मुताबिक अब जब उत्तराखंड को मान्यता मिल गई है तो क्रिकेट की बागडौर अनाड़ी और अनुभवहीन हाथों में पहुँच गई। ये बहुत खेद जनक है।

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