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त्रिवेन्द्र को जिसे चाहे उसको मंत्री बनाने की पूरी छूट!

उत्तराखंड देहरादून राजनीती

मंत्रिपरिषद विस्तार में जातीय समीकरण नहीं अहम!

नए BJP में समीकरण-अनुभव नहीं चेहरे को तवज्जो

UP-HP में ठाकुर CM-अध्यक्ष हैं मिसाल

Chetan Gurung

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत आखिरकार मंत्रिपरिषद का विस्तार करने जा रहे हैं। ऐसा शोर उफान पर है। दिल्ली दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा नए पार्टी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से उनकी मुलाक़ात ने इस हवा को और तेज किया है। बल्कि ये कहा जाए कि आँधी ला दी है, गलत नहीं होगा। अब ये कब तक होगा कोई नहीं जानता। इतना अलबत्ता, कहा जा सकता है कि विस्तार में शायद जातीय समीकरण और अनुभव ज्यादा मायने न रखे। ये बीजेपी का नया ट्रेंड भी कहता है। इसके बजाए 2022 के विधानसभा चुनाव में फतह का फैक्टर अहमियत रखेगा। ये बिल्कुल साफ है कि त्रिवेन्द्र को पूरी छूट मिलेगी। वह जिसको चाहे उसको अपनी टीम में शामिल करें।

BJP की नई थ्योरी में कुछ भी मुमकिन है। मंत्रिपरिषद में कौन से चेहरे चमत्कृत करते हुए प्रवेश करेंगे। कौन निराश होंगे। किसी की छुट्टी भी होगी कि नहीं। कोई नहीं जानता। ये कौन जानता था कि त्रिवेन्द्र उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बनेंगे। वह भी पूरी हनक के साथ। वह बहुत बाद में बतौर दावेदार उभरे थे। उनसे आगे कई नाम चल रहे थे। त्रिवेन्द्र बिना किसी लॉबिंग के सरकार के सरताज चुने गए थे। ये भी कौन जानता था कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनाए जाएंगे। दूर न जाए तो किसको उम्मीद थी कि म्यूजियम में रख दिए गए समझे जा रहे भगत सिंह कोश्यारी को महाराष्ट्र सरीखे राज्य में राज्यपाल बना दिया जाएगा।

ये भी कि नाकाम मान के मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाए गए डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक केंद्र में मानव संसाधन मंत्रालय संभालेंगे। ये भी कि महाराष्ट्र में देवेन्द्र फड़नवीस मुख्यमंत्री बनाए जाएंगे। जिनको सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं था। एक बात और। जातीय समीकरण गुजरे जमाने की बात हो गई दिख रहा। योगी के UP में स्वतंत्रदेव सिंह को पार्टी अध्यक्ष बना दिया गया है। यानि, CM-अध्यक्ष दोनों ठाकुर। हिमाचल प्रदेश का भी आलम यही है। वहाँ मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर हैं। अध्यक्ष राजीव बिंदल।

मतलब ये कि ठाकुर-ब्राह्मण वाला समीकरण दूर-दूर तक नहीं। पार्टी आलाकमान को शायद अच्छे से समझ आ गया है कि चुनाव में वोट डालते समय लोग जाति का नहीं पार्टी की नीतियों और उपलब्धियों को ध्यान में रखता है। ये वह पहलू हैं, जो त्रिवेन्द्र को दबाव मुक्त करेंगे कि नए मंत्री बनाते समय उनको जातिगत समीकरणों की फिक्र नहीं करनी है। ऐसे में वह काबिल और अपने भरोसेमंद को ही मंत्रिपरिषद विस्तार में जगह देना चाहेंगे। जो संभावना सबसे अधिक लगती है, वह राज्यमंत्री डॉ. धन सिंह रावत का प्रोन्नत हो के पूर्ण मंत्री बनना है।

डॉ. रावत पार्टी की रीढ़ भी माने जाते हैं। संगठन में भी उनके पैरोकार बहुत हैं। मोदी-अमित शाह के वह प्रिय समझे जाते हैं। नड्डा भी उनको ले कर खास लगाव रखते हैं। संभावित मंत्रियों के तौर पर अचानक कई नाम उभरे हैं। इनमें सबसे आगे खटीमा वाले पुष्कर सिंह धामी हैं। कुछ लोग ये कह कर शंका जता रहे हैं कि उधम सिंह नगर से तीन मंत्री मुमकिन कैसे होंगे? उनको पार्टी की नई थ्योरी शायद समझ नहीं आई होगी। UP-HP में ठाकुरों को सरकार-संगठन का तख्तो-ताज एक साथ सौंपा जाना साफ करता है कि अब कुछ भी मुमकिन है।

धामी के हक में अन्य हर किस्म के समीकरण भी हैं। पिथौरागढ़ के मूल निवासी होने से वह युवा और पहाड़ का कोटा भी पूरा कर देते हैं। वैसे इसकी कोई गारंटी नहीं है कि उधमसिंह नगर से जो दो मंत्री हैं, उनमें से एक की छंटनी नहीं होगी। त्रिवेन्द्र ऐसा करना चाहे तो रोकने वाला कौन है? मंत्री के दावेदारों के तौर पर हरिद्वार वाले स्वामी यतीश्वरानन्द, कुमायूं के चन्दन रामदास, बलवंत भौर्याल, सुरेन्द्र सिंह जीना, देहरादून के मुन्ना सिंह चौहान और खजानदास के नाम भी शामिल हैं। पिथौरागढ़ की चंद्रा पंत भी चौंका सकती हैं। त्रिवेन्द्र के पास मंत्रिपरिषद के लिए तीन कुर्सी उपलब्ध है।

वह चाहे तो पुराने लेकिन असरहीन या फिर सिर दर्द साबित हो रहे मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं। इससे मंत्रिपरिषद में और रिक्तियाँ निकाल आएंगी। इनमें वह अपने पसंद के और अधिक नामों को बिठा सकेंगे। हवा तो ये भी है कि मुख्यमंत्री ने मोदी-नड्डा और शक्तिशाली मंत्री तथा पूर्व अध्यक्ष अमित शाह से सहमति ले ली है। उनसे इस बारे में मशविरा कर लिया है। पार्टी की नई थ्योरी में अनुभव भी बहुत बड़ा मानक शायद ही होगा। सिर्फ फतह की संभावना को ही देखा जाएगा।

मंत्रिपरिषद विस्तार की चर्चा दावानल की तरह इसलिए भी फैल रही है कि त्रिवेन्द्र खुद टीम पूरी करना चाहते हैं। उनके पास अभी 55 के करीब मंत्रालय हैं। इतने महकमों की फाइलों को रोज देखना,पढ़ना और दस्तखत करना ही बहुत बड़ी दिक्कत है। फिर इस बारे में बैठकें भी करनी होती हैं। नए मंत्री बनने से वह अपने कामकाज का बोझ हल्का कर सकेंगे। अब तो सिर्फ ये देखना बाकी है कि त्रिवेन्द्र अपनी टीम का आकार कितनी जल्दी बढ़ाते हैं। किन चेहरों को शामिल करते हैं। कितने पुरानों को बाहर की राह दिखाते हैं। दिखाते भी है या नहीं। संभावना तो है कि इस सब में अब अधिक देर नहीं होगी।

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