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सौरव गांगुली:उत्तराखंड Cricket से नहीं वास्ता!

उत्तराखंड खेल देहरादून

तमाम घपले-घोटालों पर भी आँखें बंद

CoA की रिपोर्ट को ही पढ़ लेते BCCI chief

रणजी ट्रॉफी में धूल-धूसरित हो गई प्रतिभाओं से भरी टीम

सचिव की कुर्सी खाली रखने के पीछे साजिश!

Chetan Gurung

सौरव गांगुली जब BCCI के अध्यक्ष बने तो देश के खेल और खास तौर पर क्रिकेट प्रेमियों में उम्मीद जागी थी कि क्रिकेट को फायदा होगा। राज्य इकाइयों में जो गड़बड़ियाँ और घपले-घोटाले हो रहे, उनमें रोक लगेगी। उत्तराखंड को इकाई माना जाए तो गांगुली इस मोर्चे पर न सिर्फ नाकामयाब हुए हैं, बल्कि उन पर अंगुली उठाने के लिए पर्याप्त आधार उपलब्ध हो गए हैं। इस बात पर हैरानी जताई जा रही है कि उत्तराखंड में क्रिकेट सिर्फ घोटाला और बहुत बड़ी निराशा साबित हो रहा है। यहाँ न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट और लोढ़ा कमेटी की जम कर अवमानना चल रही है, बल्कि क्रिकेटरों में भारी हताशा का आलम है। उत्तराखंड क्रिकेट से जुड़े विवाद का मामला इतनी जल्दी सुप्रीम कोर्ट पहुँच जाना दुर्भाग्य है।

उत्तराखंड क्रिकेट के लिए महज इतना कहना काफी होगा कि खुद विनोद राय की अगुवाई वाली CoA ने सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट दी है कि यहाँ चुनाव बहुत गड़बड़ अंदाज में हुए। उत्तर प्रदेश और राजीव शुक्ला के असर में चुनाव हुए। ये भी कहा गया कि CAU के माहिम वर्मा को BCCI में चुना नहीं जा सकता है। ऐसा हुआ तो ये हितों का टकराव होगा। BCCI ने इस पूरी रिपोर्ट को ठेंगे पर रख दिया। माहिम को शुक्ला अपनी जगह BCCI उपाध्यक्ष की कुर्सी पर ले आए। कल अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके हक में आता है तो माहिम की जगह वह फिर उपाध्यक्ष बन जाएंगे।

गांगुली अध्यक्ष बन गए लेकिन उत्तराखंड जैसे नए राज्यों को साफ-सुथरा माहौल देने की कोशिश करने के बजाए अपना कार्यकाल बढ़ाने में जुट गए। उनके सामने उत्तराखंड को ले कर कई सवाल हैं, लेकिन उन पर कोई काम नहीं कर रहे। क्या वह जवाब दे सकते हैं कि उत्तराखंड को ले कर उनकी क्या राय है? यहाँ CEO अमृत माथुर, प्रशिक्षकों,चयनकर्ताओं की नियुक्तियाँ किस प्रक्रिया के अंतर्गत हुई? यहाँ जो CAU के चुनाव हुए, उसकी जांच क्यों नहीं कराई जा रही कि उसमें क्या-क्या घपले हुए? कैसे आजीवन सदस्यों को वोटिंग की भनक तक नहीं लगने दी गई। कैसे अंजान लोग वोट डाल गए। जिलों में किन पृष्ठ भूमि के लोगों को अहम जिम्मेदारियाँ दी गईं?

टिहरी के राजीव भण्डारी तो जेल की हवा खा चुके हैं। हल्द्वानी के लीला काण्डपाल को एंटी करप्शन में डाला। लीला खुद भ्रष्टाचार के मामले मेंज जांच झेल रहे हैं। टीम के चयन को ले के भरपूर अंगुली उठी। पैसे ले के टीम चुनने के आरोप लगे। ऑडियो तक सामने आए। माहिम वर्मा BCCI में उपाध्यक्ष बन गए, जबकि उन्होंने झूठे तथ्य रजिस्ट्रार ऑफिस को दिए थे। उन्होंने न सिर्फ खुद को सरकारी अधिकारी बताया था, बल्कि बिना CAU के सदस्य बने ही एसोसिएशन के अहम दस्तावेजों पर धड़ल्ले से दस्तखत किए। इनकी जांच कर कार्रवाई की बात सरकारी एजेंसियां कर रही हैं। ताज्जुब है कि BCCI-गांगुली ने अभी तक इस पर कोई कदम नहीं उठाया है।

रणजी ट्रॉफी में उत्तराखंड की दुर्दशा हैरान करती है। जिस राज्य में प्रतिभाओं और बुनियादी सुविधाओं की भरमार हो, उसका इतना बदतर प्रदर्शन CAU के ओहदेदारों को जवाब देने के लिए निश्चित रूप से बाध्य करता है। एसोसिएशन के अध्यक्ष जोत सिंह गुनसोला मीडिया और दुनिया से चेहरा छुपाते चल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट और लोढ़ा कमेटी के मुताबिक गुनसोला अध्यक्ष बन ही नहीं सकते हैं। वह काँग्रेस के विधायक रहे हैं। आज भी सक्रिय राजनीति में हैं। उनकी इकलौती योग्यता राजीव शुक्ला के विश्वासपात्र होना है। शुक्ला के ही नंबरदारों में माहिम और उनके पिता PC वर्मा को शुमार किया जाता है। वही लोग उत्तराखंड क्रिकेट को पर्दे के पीछे से चला रहे हैं।

CAU के कोषाध्यक्ष पृथ्वी सिंह और उपाध्यक्ष संजय रावत गुनसोला-वर्मा लॉबी से बेहद खफा हैं। कोषाध्यक्ष के पास फाइलें आती ही नहीं। वह भी दफ्तर अब जाते नहीं। माहिम के BCCI जाने के बाद CAU सचिव की कुर्सी साजिश के तहत खाली है। सचिव पर नई नियुक्ति नहीं की जा रही है। इसका जिम्मा भी किसी को दिया नहीं जा रहा है। क्रिकेट संचालन की सर्वोच्च संस्था एपेक्स काउंसिल का विधिवत गठन ही नहीं किया गया है। दो दर्जन समितियों के गठन के बारे में सोच भी नहीं है।

BCCI और गांगुली पर सवाल खड़े होना लाजिमी है। क्या वे उत्तराखंड के बारे में कुछ नहीं जानते हैं? दुनिया की सबसे अमीर क्रिकेट संस्था इतनी बदहाल है? या एशों-आराम में खोये हैं, साहेब लोग? BCCI जो पैसा उत्तराखंड को दे रहा है, वह क्रिकेट के विकास के लिए है। हो क्या रहा है? CAU का दफ्तर कहीं है। इसके CEO माथुर का दफ्तर कहीं। दोनों साथ क्यों नहीं बैठ सकते? महंगे होटल में कमरे ले के दफ्तर खोलने के पीछे क्या तुक है? अब तो माथुर दिल्ली में भी दफ्तर खोल चुके हैं। वहीं बैठने भी लगे हैं। CAU जुबान तक नहीं खोल पा रहा है। उसके सरदार तो खिलाड़ियों और बुनियादी सुविधाओं के लिए तय पैसे से पाँच सितारा होटलों और हवाई सफर का लुत्फ ले रहे हैं। क्रिकेट खिलाड़ियों के साथ फैन की तरह फोटो खिंचवा रहे हैं। सपरिवार।

ऐसे लोगों के हाथों में उत्तराखंड क्रिकेट का भविष्य है। जिलों में क्रिकेट लीग या टूर्नामेंट कैसे कराएं, इसका कोई ब्लू प्रिंट उनके पास नहीं है। बाबू लोग ट्रायल ले रहे। अपने हिसाब से नाम बदल देते हैं। फुटबाल वाले क्रिकेट में घुस गए हैं। पूरा UP चला आया है उत्तराखंड। यहाँ के पुराने और शानदार खिलाड़ी उनके बस्ते-फोन उठा के चल रहे। BCCI को कुछ दिख नहीं रहा। तो मिस्टर. गांगुली आपसे भी देवभूमि को कोई उम्मीद नहीं रह गई है। अपना कार्यकाल बढ़ा के 3 साल करने में जान लगाओ। मौज तो तभी है न।

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