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सर्वे या त्रिवेन्द्र के खिलाफ लॉबी विशेष की बिसात बिछाई शुरू!

उत्तराखंड देहरादून राजनीती

आखिर कर क्या रहे त्रिवेन्द्र के सलाहकार:ABP सर्वे

मुखिया की बजाए अपनी सीट पक्की करने में व्यस्त सलाहकार

Chetan Gurung

हाल ही में ABP न्यूज़ चैनल ने या ये कहा जा सकता है कि आनंद बाजार पत्रिका, जो इस चैनल का भी स्वामी है, ने एक सियासी सर्वे दिखाया। इसमें उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को लोकप्रियता-कामयाबी के मामले में इतना नीचे बल्कि शून्य से भी नीचे दिखाया गया। हर तरह के हालात में एक जैसे ही दिखने वाले मुख्यमंत्री पर इसका कोई असर पड़ेगा भी या नहीं, कहा नहीं जा सकता है, लेकिन इस सर्वे के पीछे बीजेपी की ही एक मजबूत लॉबी के हाथ को देखा जा रहा है। सियासी गलियारों में कानाफूसी है कि विरोधी लॉबी अपनी बिसात बिछा के पासा फेंकने में जुट चुका है। इस बीच ये सवाल गर्मी के साथ उठ खड़ा हो रहा है कि आखिर त्रिवेन्द्र के सलाहकार या मीडिया प्रबंधन से जुड़े सिपहसालार कर क्या रहे?

देश में मीडिया हाउस और खास तौर पर हिन्दी-अँग्रेजी न्यूज़ चैनलों की विश्वसनीयता खत्म ही है। हर चैनल के अपने विशेष दर्शक-श्रोता हैं। जिसको जो अपनी विचारधारा के माफिक-मुफीद लगता है, वह उसी चैनल को देखता है। ऐसे ही एनकर्स-पत्रकार भी उनकी अपनी पसंद के हैं। ये मीडिया घराने चुनाव के दौरान सर्वेक्षण रिपोर्ट खूब पेश करते हैं। ये उनकी आदत में शुमार हो चुका है। एकाध चैनलों का सर्वे कभी-कभी अनुमान के आसपास बैठ जाता है तो चीख-चीख के एंकर्स और मीडिया घराने आसमान सिर पर उठा लेते हैं। हमने पहले ही कह दिया था किस्म का।

जब गलत निकाल जाता है तो खामोशी से ऐसे मुंह सिल लेते हैं, मानो उनका सर्वेक्षण नाम की चिड़िया से कोई वास्ता कभी रहा ही नहीं। चैनलों के सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता का आलम ये है कि जिसकी चुन्नी (जिसने माल दिया) उसकी मुन्नी (हक में सर्वेक्षण)। इसके बावजूद आम लोगों में माहौल बनाने में ऐसे सर्वेक्षण कुछ हद तक सफल रहते भी हैं। भले उसका नतीजा बहुत अच्छा न हो। ABP न्यूज़ का सर्वेक्षण भी जिसकी चुन्नी उसकी मुन्नी किस्म की मानी जा रही है।

ऐसा इसलिए कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के मौसम में अचानक ही त्रिवेन्द्र को लपेटे में ले लिया गया। सूत्रों के मुताबिक त्रिवेन्द्र से जुड़ा सर्वेक्षण बाद में शामिल किया गया। ऐसा क्यों हुआ इस पर अब सियासी समीक्षकों के साथ ही सरकार में मुखिया के चंद विश्वासपात्रों में मंथन का दौर शुरू हो गया है। खास बात ये है कि उत्तर प्रदेश, जो आए दिन तमाम किस्म के विवादों और कानून-व्यवस्था के कारण बदनाम हो चुका है, वहाँ के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को त्रिवेन्द्र के मुक़ाबले कहीं ऊपर और आगे दर्शाया गया।

जो प्रदेश और मुख्यमंत्री दुनिया में नकारात्मक कारणों से सुर्खियों में हो, वह ऐसा नतीजा सर्वेक्षण में कैसे हासिल कर गया? ये चौंकाने के लिए पर्याप्त है। त्रिवेन्द्र के सगे और एकदम मीत भाई भी ये दावा नहीं कर सकते हैं कि वह तेज-तर्रार किस्म के मुख्यमंत्री हैं। इसके बावजूद ये कहा जा सकता है कि सकारात्मक कार्यों-योजनाओं में रफ्तार भले न हो लेकिन मुख्यमंत्री सचिवालय को दलालों से मुक्त करने में उनकी अहम भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। वे किसी भी किस्म के अनैतिक दबाव में आने वालों में नहीं हैं। ऐसा माना जाता है।

कुछ विवादों को अलग किया जाए तो उन पर बहुत बड़े किस्म के आरोप निजी तौर पर नहीं हैं। अलबत्ता, ये जरूर कहा जा सकता है कि नौकरशाही का मौजूदा दस्ता उनके बहुत काम नहीं आ रहा है। इस मोर्चे में त्रिवेन्द्र को जरूर बहुत मेहनत करने की दरकार है। भीतरखाने की खबर है कि त्रिवेन्द्र को कुर्सी से हटाने के लिए पार्टी में एक से ज्यादा धड़े लगातार खामोशी संग सक्रिय हैं। सत्ता में तीन साल जिस तरह त्रिवेन्द्र ने बिना तनाव के गुजार दिए, उससे वे बेचैन हैं। अब जब दो साल ही बचे हैं तो सूत्रों का कहना है कि अब ये धड़ा अपनी चालों को तेजी से चलने में जुट गया है।

ABP न्यूज़ सर्वेक्षण की त्रिवेन्द्र को ले के तैयार रिपोर्ट इसी चाल का हिस्सा कहा जा रहा है। त्रिवेन्द्र अगर सर्वेक्षण में पिछड़ गए तो इसके लिए उनके सलाहकार और मीडिया टीम को भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। सूचना महकमा करोड़ों का विज्ञापन और कारोबार मीडिया हाउस को दे रहा है। वह इससे अधिक कुछ नहीं कर सकता है। मीडिया प्रबंधन का जिम्मा निजी और छिपी हुई टीम करती है। सलाहकारों की पूरी ज़िम्मेदारी होती है। त्रिवेन्द्र के पास भी ये टीम भरी पूरी है। ये बात अलग है कि योगी की टीम ABP न्यूज़ सर्वेक्षण में अपने आका को ऊपर ले आने में सफल रही। सर्वेक्षण का सारा खेल सेटिंग-गेटिंग का समझा जा रहा है। इसमें टीम त्रिवेन्द्र एक बार फिर असफल साबित हुई।

ये कहा जा रहा है कि इस टीम को ऐसे किसी सर्वेक्षण के बारे में पहले से न तो भनक रही, न ही ऐसा कोई सर्वेक्षण अपने मुख्यमंत्री के हक में कराने में ही कामयाब रहे हैं। मुख्यमंत्री के एक करीबी के मुताबिक जो काम सलाहकारों-मीडिया प्रबंधन से जुड़े लोगों का है, वे अपनी भूमिका तरतीब से नहीं निभा पा रहे हैं। त्रिवेन्द्र की प्रतिष्ठा या आदत ऐसी नहीं है कि वह अपने बूते मीडिया को साध सके। इस काम में पूर्व के तकरीबन सभी मुख्यमंत्री माहिर थे।

मेजर जनरल (वेटरन) बीसी खंडूड़ी भी इसमें कहीं बेहतर थे। उनको ले के मंत्रियों-नौकरशाहों में भी खौफ रहता था। फिर भी ये सच है कि उनके पास मीडिया प्रबंधन के लिए शानदार टीम थी। जो भीतर ही भीतर काम करती थी। दिवंगत उमेश अग्रवाल तथा अनिल गोयल उनके लिए जम के काम करते थे। त्रिवेन्द्र के पास ऐसी जुझारू टीम का अभाव है। इसका सियासी फाइदा उनके विरोधी ले उड़ने की फिराक में हैं। त्रिवेन्द्र के सलाहकार अपनी सीट पक्की करने में ही व्यस्त हैं।

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