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किसी को घी घना,किसी को मुट्ठी भर चना:उत्तराखंड नौकरशाही

उत्तराखंड देहरादून

मनीषा पवार को मुख्य सचिव ग्रेड का इंतजार

दीपेंद्र,सुरेन्द्र,विनोद,विनय को प्रोन्नति कब?

Chetan Gurung

उत्तराखंड नौकरशाही में मौजूदा दौर जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला है। जिसकी जितनी पकड़ उसको उतनी तवज्जो। सियासी आकाओं में जिसकी पकड़ नहीं, वह नजरों से ही दूर और उपेक्षा का शिकार। मनीषा पवार सरीखी आला तो दीपेंद्र चौधरी, सुरेन्द्र नारायण पांडे, विनोद कुमार सुमन और विनय शंकर पांडे प्रोन्नति और ढंग की पोस्टिंग तक के लिए तरस रहे।

उत्तराखंड में ये परिपाटी अन्य राज्यों से इतर नहीं रही कि जिसकी चलती है, वह सरकार में खूब चलता है। चाहे वह सियासी हो चाहे नौकरशाही की दुनिया से। ND तिवाड़ी राज में उनके OSD लोगों (आर्येन्द्र शर्मा, संजय जोशी) की जबर्दस्त चलती थी। BC Khanduri राज में नौकरशाह प्रभात कुमार सारंगी का डंका था। विजय बहुगुणा का दौर आया तो साकेत बहुगुणा और हरीश रावत ने सत्ता संभाली तो रंजीत रावत ने मनचाहे-मनमाने काम किए, कराए।

उस दौर में जिस नौकरशाह ने भी हस्तिनापुर में कदम मजबूत किए, वह छा गया। कई IAS अफसर रहे, जो वक्त से पहले न सिर्फ प्रोन्नति पाने में सफल रहे, बल्कि इच्छा के मुताबिक महकमे लेते रहे। ऐसे नौकरशाहों को वे कुर्सियाँ मिलीं, जो उनको नहीं दी जा सकती थी, या फिर वे उसके काबिल नहीं थे। तब मानकों को तोड़-मरोड़ दिया गया था। किसी नौकरशाह को भगवान जैसा बनाया गया तो किसी को ज़मींदोज़ करने में भी कसर नहीं छोड़ी गई।

मौजूदा जीरो टालरेंस-इंसाफ के राज में भी ऐसी मिसालें जारी हैं। देहरादून के कलेक्टर आशीष श्रीवास्तव को फिलहाल मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत का सबसे विश्वासपात्र और उनकी नजरों में सबसे काबिल कहा जा सकता है। स्मार्ट सिटी के CEO, VC-MDDA और अपर सचिव (मुख्यमंत्री) की कुर्सी भी साथ-साथ रहना इसको साबित करता है। ये उनके लिए अब चुनौती होगी कि किस तरह इन सभी जिम्मेदारियों का निर्वहन एक साथ कर पाते हैं।

वैसे ऐसा ही दौर एक वक्त मीनाक्षी सुंदरम का था। आज ये काबिल नौकरशाह खामोशी संग अपना काम कर रहे हैं। शायद अपने वक्त का इंतजार कर रहे। जिन नौकरशाहों को इन दिनों दरकिनार सरीखा किया हुआ है, उनमें आला नौकरशाह मनीषा पवार और 1997 बैच के RK Sudhanshu भी शामिल हैं। सिर्फ 23 साल की उम्र में IAS सेवा में आईं मनीषा की प्रोन्नति मुख्य सचिव ग्रेड में हो जानी चाहिए थी। पहले ऐसी मिसालें कई बार सामने आईं, जब DPC (प्रोन्नति की प्रक्रिया) पहले ही कर दी जाती थी, और प्रोन्नति के मानक बाद में पूरे होते थे।

उत्तराखंड में मुख्य सचिव ग्रेड में दो कैडर पद मंजूर हैं। इनके विपरीत दो एक्स कैडर पद मिलते हैं। इसके बावजूद राज्य सरकार चाहे तो केंद्र की मंजूरी के बगैर भी प्रोन्नति दे सकती है। यूपी में मायावती शासन में शशांक शेखर सिंह को कैबिनेट सचिव बना दिया गया था, जो कैडर में ही नहीं था। न ही शशांक किसी सेवा में ही थे। वह एक विमान पाइलट थे। न कि नौकरशाह। ऐसे कई मौके उत्तराखंड में ही आए, जब प्रमुख सचिव और सचिव पद पर एक्स कैडर पोस्ट भी नहीं थी। फिर भी वे सरकार ने भरे।  

1990 बैच की मनीषा पवार अभी उत्तराखंड IAS एसोसिएशन की अध्यक्ष भी हैं। उम्मीद है कि वह कम से कम अपनी निजी लड़ाई तो लड़ ही सकती हैं। सुधांशु को तेज तर्रार नौकरशाह की प्रतिष्ठा हासिल है, लेकिन लंबे वक्त से उनको ऐसी ज़िम्मेदारी नहीं मिली है, जिसमें वह अपनी काबिलियत-क्षमता दिखा सके। इसी तरह 2007 बैच के चार IAS (SCS) दीपेंद्र,सुरेन्द्र,विनोद और विनय को न तो प्रभारी सचिव बनाया गया है न ही उनकी विधिवत प्रोन्नति ही की गई है।

कहा जा रहा है कि उनकी प्रोन्नति के लिए भी DOPT और UPSC से मंजूरी मांगी जा रही है। ये ऐसे पद नहीं है कि राज्य सरकार को इसके लिए इतना परेशान होना पड़े। अगर इतना ही नियम-कायदा देखा जाता तो न ही IFS (वन-विदेश सेवा), न IDAS और न ही ITS को सचिव बनाया जाता। IFS (वन) अशोक पई तो प्रमुख सचिव भी बने। इस मामले में IPS जरूर बदनसीब रहे हैं। वे कभी भी अपर सचिव से ऊपर की कुर्सी नहीं पा सके।

जिस निदेशक (ITDA) में अभी वरिष्ठ IPS (1997 बैच) अमित सिन्हा हैं, उस पर कई जूनियर अफसर बैठ चुके हैं। अभी कई नौकरशाह ऐसे हैं, जिनके पास अभी भी काम ढंग का नहीं है। महाराष्ट्र से स्टेट डेपुटेशन पूरा कर के लौटे सचिव कुर्वे तथा हरिद्वार के कलेक्टर की कुर्सी से हटे दीपेंद्र को अभी भी काम नहीं मिला है। न ही सचिवालय में दफ्तर ही मिला है। वैसे सचिन-दीपेंद्र को मौजूदा राज में सरकार के करीबियों में शुमार किया जाता है। इसलिए उम्मीद है कि दोनों को बेहतर महकमे ही मिलेंगे।

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