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यूं बदल गए थे CM, लाख विरोध के बावजूद जिंदाबाद रहे NDT

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हैरतअंगेज रहा है उत्तराखंड में सरकार का मुखिया बदलना या बचना

Chetan Gurung

नित्यानन्द स्वामी से करीबी और बहुत हद तक कहूँ तो आत्मीय रिश्ता था। तब से। जब वह विधान परिषद सदस्य थे। फिर उप सभापति और सभापति बने। बात कर रहा हूँ। UP काल की। यानि, साल 2000 से पहले की। उत्तराखंड बना तो एक दिन उन्होंने घर बुला के बताया-गुरुंग साहब, मेरी संभावना बहुत अच्छी है। बस फलां-फलां (नाम बताए थे, पर मैं लिखना नहीं चाहता) खुद के फेर में मेरी टांग खींच रहे। ये संदर्भ राज्य के पहले अन्तरिम सरकार के मुख्यमंत्री से जुड़ा है। स्वामी ही CM बने। पहला इंटरव्यू उन्होंने मुझे ही दिया। खुद घर बुला के। शपथ ग्रहण करने से कुछ घंटे पहले। पार्क रोड स्थित छोटे से साधारण निजी आवास पर।

फौरन ही उनको हटाने में BJP की एक बड़ी लॉबी जुट गई। तब आज के महाराष्ट्र राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी, केंद्रीय मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक, अब सियासी संन्यास ले चुके पूर्व मंत्री केदार सिंह फोनिया समेत अन्य लोग शामिल थे। स्वामी सब जानते थे। उनको पूरा यकीन था। वह नहीं हटेंगे। वह कहते थे-अंतरिम सरकार में भी कहीं मुख्यमंत्री हटते हैं? एक दिन उनके विश्वासपात्र और निजी स्टाफ (अब मरहूम) में शुमार कैलाश अग्रवाल की गुजारिश पर मैंने स्वामी का इंटरव्यू किया। विधानसभा स्थित मुख्यमंत्री कार्यालय में। वह छपा। हंगामा हुआ। वह अगले दिन दिल्ली तलब हुए। फिर CM के तौर पर कोश्यारी का नाम घोषित हुआ। स्वामी को अपने जाने का यकीन बामुश्किल हुआ था। इंटरव्यू के बारे में अलग से कभी चर्चा करूंगा।

साल 2002 में देश के प्रधानमंत्री के सशक्त दावेदार माने जाने वाले काँग्रेस के दिग्गज ND Tiwari पैराशूट CM बन के आए। इस कुर्सी का ख्वाब देख रहे एक और शक्तिशाली सूबेदार हरीश रावत केन्द्रीय कमान की इस चाल से सन्न रह गए। ONGC के KDMIPE सभागार में मौसम खराब होने के कारण शपथ ग्रहण समारोह हुआ था। वहाँ मौजूद लोगों को याद होगा। रावत के मुंह लगे और उनके लिए जां निसार करने वालों ने समारोह में कैसा उत्पात मचाया था। वे NDT को उनके सामने ही भला-बुरा बोल रहे थे। कुछ की आँखों में पराजय के आँसू थे। विरोध करने वालों में राजीव जैन सबसे मुखर थे। रावत के चेलों, जिनमें कई कैबिनेट और राज्य मंत्री शामिल थे, ने फिर ND को सुकून से काम करने नहीं दिया। ND ने साबित कर दिखाया कि क्यों उनको सियासत में सबका उस्ताद कहा जाता है। वह सामने-सामने अपशब्दों को सुनते हुए भी मुस्कुराते हुए विरोधियों का स्वागत करते थे। उनको तमाम शानदार विशेषणों-अलंकारों से नवाजते हुए खुश करने की कोशिश करते थे। उनके हर उल्टे-सीधे काम फुर्ती से करते थे। उनका ही कमाल था कि BJP को उन्होंने मित्र विपक्ष के तौर पर बदनाम कर डाला था। मतलब ये कि पूरी मोहब्बत के साथ कत्ल कर दिया था।

रावत खेमा लगातार खुशफहमी में रहा कि ND जा रहे हैं। पाँच साल गुजर गए। ND गए जरूर, लेकिन साथ में काँग्रेस सरकार भी ले गए। बीजेपी ने अगली सरकार बनाई। कई मौकों पर खुद ND ने तारीख दी कि वह इस्तीफा दे रहे हैं। एक बार आज के PCC अध्यक्ष प्रीतम सिंह (तब कैबिनेट मंत्री), विधायक प्रदीप टम्टा, मदन बिष्ट और रणजीत रावत मुझे अपने साथ CM आवास (ओल्ड एनेक्सी-आज का नया CM आवास) ले गए थे। मुझे उन्होंने बताया-`आज CM (वैसे उन्होंने कुछ दूसरा लफ्ज इस्तेमाल किया था) ने इस्तीफा देने का वादा किया है’। ND ने खूब आवभगत की इस दल की। तमाम मुस्कान बिखेरी। एक घंटे बाद विदा कर दिया। न उन्होंने इस्तीफे की बात की। न सुनने की आस ले के गए दल ने ही कोई बात उनसे इस बाबत करने की हिम्मत की। एक बार कड़ाके की सर्द रात में 12 बजे काँग्रेस विधायक किशोर उपाध्याय ने फोन कर के बीजापुर गेस्ट हाउस बुलाया। काँग्रेस के 35 ओहदेदार इस्तीफा दे रहे। CM के विरोध में। CM यहीं हैं। उनसे इस्तीफा मांगेंगे।

दो बजे मध्य रात ND कक्ष से निकले तो वह बिना कुछ बोले अपनी फ्लीट की ओर बढ़ गए। किशोर हिचकते हुए सिर्फ इतना बोल पाए। पंडित जी, कुछ लोग आपसे मिलना चाहते हैं। ND ने बेपरवाह अंदाज में, उनकी ओर देखे बिना सिर्फ इतना कहा-कल आवास पर मिलें। ND उत्तराखंड इतिहास के पहले और इकलौते CM थे, जो पाँच साल कुर्सी पर रहे। ND जैसे ही BC Khanduri भी पैराशूट से उतरे। पैसिफिक होटल में कल्याण सिंह की मौजूदगी में कोश्यारी समर्थकों ने बवाल काटा। कुछ काम नहीं आया। खंडूड़ी को हटाने का खेल शुरू से शुरू हो गया। एक बार फिर कोश्यारी-निशंक की संयुक्त अगुवाई में अंदरूनी सत्ता समर छिड़ गया। एक रात मैंने खंडूड़ी से पूछा था-जनरल साहब, आपके 30 विधायक क्या चंडीगढ़-दिल्ली हैं? आपको पता है?

उन्होंने कुछ देर बाद फोन कर के बताया। आपकी सूचना सही नहीं है। मेरी सभी विधायकों से बात हो गई। वे अपने क्षेत्र में हैं। 3-4 दिन बाद ही आत्म विश्वास के शिखर पर बैठे BCK हट गए। कोश्यारी फिर निराश हुए। इस बार निशंक ने CM की गद्दी संभाली।  निशंक के दांव से नाखुश कोश्यारी और रुष्ट BCK इस बार एक हो गए। विधानसभा चुनाव को जब छह महीने रह गए तो हर एक मुतमईन था। अब कुछ नहीं होगा। एक दिन सुबह निशंक बहुचर्चित अंत्योदय विकास योजना के लिए हेलिकॉप्टर से टिहरी गए। मैंने सुबह उनसे बात की थी। फिर मैं यमुना कॉलोनी में बिशन सिंह चुफाल, जो तब BJP के प्रदेश अध्यक्ष थे, के आवास पहुंचा। तकरीबन 4 घंटे रहा। वहाँ से निकला तो दिल्ली से एक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल के वरिष्ठ संवाददाता ने फोन पर छूटते ही कहा-सर, निशंक गए। मैंने साफ करने को कहा तो उसने बताया। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बदलाव का फैसला BJP हाई कमान ने ले लिया है। अभी-अभी बैठक खत्म हुई है। आडवाणी-सुषमा स्वराज (अब मरहूम) बैठक से निकल गए हैं। उनसे पुष्टि कर ली है।

उसने ये भी बताया कि फिर से BCK को CM बनाने का फैसला हुआ है। निशंक को मैंने फोन किया। वह टिहरी ही थे। उनको यकीन नहीं हुआ। बिना चर्चा के, वह भी ऐन विधानसभा चुनाव के वक्त ऐसा कौन सी पार्टी करती है। उनको दिल्ली बुला लिया गया। खंडूड़ी फिर सपनों के पूरा होने के माफिक मुख्यमंत्री बने। एक बार फिर काँग्रेस राज आया तो विजय बहुगुणा ने हरीश रावत को निराश कर CM की गद्दी संभाली। आधा कार्यकाल गुजरने और हटने तक रावत खेमे ने उनको जीने नहीं दिया। बहुगुणा को उम्मीद फिर भी नहीं थी कि वह हटाए जाएंगे। उनकी शारीरिक भाव-भंगिमाओं में पूरा आत्मविश्वास झलकता था। वैसे वह किसी को परेशान करने वाले या फिर अपनी ही चलाने वालों में नहीं थे। सिर्फ हरीश की महत्वकांक्षा उन पर भारी पड़ी। उनको जब तक साजिश-खेल समझ आई, तब तक गद्दी खिसक चुकी थी। कई विधायकों-मंत्रियों ने उनके साथ विश्वासघात भी किया था। रावत भी CM की गद्दी पर सुकून से कुछ ही वक्त बैठ सके। इस बार उनके लिए संकट काँग्रेस से ज्यादा BJP बनी। उसने काँग्रेस के विधायकों को तोड़ कर सरकार गिराने की साजिश रची।

बहुगुणा ने कई विधायकों के साथ कमाल के फूल की सवारी चुन ली थी। वह साजिश के एक बड़े अलमबरदार थे। हरीश की हिम्मत और जीजीविषा ने BJP को आखिर सुप्रीम कोर्ट में ठंडा कर दिया। वह अपनी गिरी सरकार को फिर से उठाने और CM बनने में सफल रहे। काँग्रेस सरकार की विदाई के बाद BJP सरकार के मुखिया त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ भी पार्टी में एक धड़ा सुतली बम की तरह सुलग रहा है। ये बात अलग है कि उस पर बार-बार पानी गिर जा रहा है। इस बार फिर हो-हल्ला-शोर खूब किया जा रहा है। इतिहास गवाह है कि जब भी ऐसा आलम-नजारा रहा, CM की गद्दी गई नहीं, सुरक्षित रही। तख्त तभी खिसका-छिना, जब कुछ भी होने का अंदेशा किसी को नहीं था। त्रिवेन्द्र को हक में शायद एक समीकरण बहुत मजबूत है। उनके हटने से मोदी-शाह का जलवा भी संगठन में प्रभावित हो सकता है।

ये बात भी उठ सकती है कि मोदी-शाह के गलत चयन के कारण तीन साल बेकार हो गए। ऐसा संदेश दोनों और संगठन-संघ परिवार कभी नहीं चाहेगा। उत्तराखंड से सुलगी चिंगारी फिर UP-हरियाणा को भी भस्म कर सकती है। बस यहीं त्रिवेन्द्र बहुत मजबूत दिखाई देते हैं। वह खुशकिस्मत हैं कि उनके पास बहुमत का भंडार है। टूट-विभाजन से नुक्सान की आशंका नहीं है। आला कमान का भरोसा बना हुआ है। बाकी सियासत है। कब पलटी मार जाए, ये चित्रगुप्त-ब्रह्मा भी नहीं जानते हैं।

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1 comment

Dr A K Singh February 15, 2020 at 5:19 pm

आपकी पोस्ट पढ़कर आनंद एस जाता है। आपका पूरा व्यक्तित्व दिखाई पड़ने लगता है। बिल्कुल साफ सुथरी छवि है व जो भी पोस्ट डालते हैं बहुत ही शशक्त व निरपेक्ष भाव से। पढ़कर आनंद आ जाता है। इतनी शशक्त छवि के साथ खड़े रहकर और किसी भी दल से संबद्ध न रहकर आप ने एक विशिष्ट पत्रकार की छवि को बनाए रखा है। यहां तक कि आपने बड़े बड़े प्रस्तावों को सहज भाव से ठुकरा कर पहाड़ में ही बने रहने का संकल्प वो भी देहरादून को केंद्र में रखकर लिया, आदरणीय है। मैं इस बात से बहुत ही ज्यादा प्रसन्न रहता हूं कि मैं सदा सर्वदा आपके विषय में दूसरों से सुनता हूं और जब आपसे बात करके पुष्टि कर लेता हूं तो मेरा आनंद बहुत बढ़ जाता है। आपकी लेखनी ऐसे ही चलती रहे जिसमें समाज कल्याण के भाव स्पष्ट रूप से भरे रहें जैसा कि आपकी पोस्टों में हमेशा रहता है। किसी भी क्षेत्र में चाहे वह क्रिकेट हो, शराब, किट्टी, भू माफिया, क्षात्र वृत्ति घोटाला,राजनीति, तकनीकी शिक्षा… इत्यादि सभी क्षेत्रों में आपने अपने लेखनी के माध्यम से एक नया आयाम दिया है। …….

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