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माफिया के ईशारे पर बदल गई सिंगटाली सड़क-पुल परियोजना!

उत्तराखंड देहरादून

गंगा-नयार के संगम पर प्रस्तावित सेतु निर्माण फैसला आखिर क्यों बदला?

नया रूट भू-वैज्ञानिकों के मुताबिक असुरक्षित-अनुपयुक्त

पूर्व नौकरशाह पांगती ने सरकार को लिया आड़े हाथ

Chetan Gurung

गंगा-नयार नदी के संगम व्यास घाट पर गंगा नदी के ऊपर प्रस्तावित सिंगटाली पुल निर्माण को सरकार ने क्या किसी के ईशारे पर टाल दिया? इस पुल के निर्माण से देहरादून से गढ़वाल-कुमाऊँ जाना बहुत आसान हो जाना है। गढ़वाल की नयार घाटी और कुमाऊँ के सल्ट के बीच कम से कम 150 से 200 किमी तक की दूरी सिमट जानी है। सरकार के इस पुल के निर्माण की जगह बदल दिए जाने के बाद ये महत्वाकांक्षी योजना अनंत काल तक लटक जाए तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए। अब अंदरखाने की कानाफूसी सरकार के लिए अच्छी नहीं है। जो बातें वायुमंडल में तैर रही है, उसके मुताबिक सिंगटाली के एक माफिया के रसूख के चलते सरकार ने पुल निर्माण की जगह बदल दी।

इसकी वजह ये बताई जा रही कि पूर्व में जिस जगह पुल के निर्माण का फैसला हुआ था, वहाँ सरकार के तकरीबन एक वर्ग किमी जमीन पर एक माफिया ने अवैध कब्जा जमाया हुआ है। अगर पुल का निर्माण उसके कब्जे वाली जमीन पर होता है, तो उसके कब्जे की बाकी जमीन के बारे में अंगुली उठ सकती है। वह ऐसा नहीं चाहता। सरकार में उसकी पहुँच कहे या फिर रुतबा कि सरकार ने न सिर्फ लोगों की इच्छा के खिलाफ जा के पुल निर्माण के लिए जगह बदल दी, बल्कि इस परियोजना से जुड़े शासनादेश को भी जारी कर दिया।

इस परियोजना को सिंगटाली-सतपुली परियोजना के तौर पर अधिक जाना जा रहा था। पूर्व वरिष्ठ IAS अफसर सुरेन्द्र सिंह पांगती ने `Newsspace’ से कहा-सरकार ने दबाव में आ के परियोजना में संशोधन कर दिया। पुल के लिए जिस जगह का चयन किया गया है, वह पूरी तरह अनुपयुक्त है। भू वैज्ञानिकों की राय ली गई है। उनका कहना है कि सिर्फ पूर्व में पुल के लिए चुना गया स्थल ही वैज्ञानिक नजरिए से भी एकदम सही था। अब जो स्थल निर्धारित कर फटाफट शासनादेश जारी किया गया है, वह फ्रेक्चर्ड चट्टानों से ताल्लुक रखता है। वहाँ पुल का निर्माण मुमकिन ही नहीं है।

पांगती के मुताबिक सरकार सिर्फ सरकारी जमीन कब्जाए बैठे उस माफिया के ईशारे पर काम कर रही, जो सिंगटाली में रिज़ॉर्ट का निर्माण कर लिया है। माफिया यहाँ से मनमानी कीमतों पर रिवर राफ्टिंग भी अंजाम देता है। नए स्थल पर पुल का निर्माण किया जाता है तो सिर्फ पैदल रास्ता ही बनेगा। वाहनों का रास्ता वहाँ से मुमकिन ही नहीं है। पूर्व में निर्धारित रूट पूरी तरह सुरक्षित है। नए रूट का न तो वैज्ञानिक परीक्षण कराया गया है न ही इसकी रूपरेखा बनाई गई है। विश्व बैंक की परियोजना अब राज्य सरकार के खर्च से बनेगी। ये सरकार के गलत फैसले के कारण हुआ है।

भू-वैज्ञानिकों का दावा है कि नए प्रस्तावित रूट पर पुल-सड़क का निर्माण हो ही नहीं सकता। अब नए सिरे से राज्य सरकार के खर्च से फिर सर्वेक्षण और खर्च का आगणन तैयार करना होगा। इसके लिए राज्य सरकार को ही अपनी जेब ढीली करनी होगी। ये आसान नहीं है। इस मामले को सरकार में माफिया तंत्र की मजबूत पकड़ और घुसपैठ को साबित करने के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसा तब हो रहा जब खुद स्थानीय लोगों ने तय किया है कि पुल का निर्माण पूर्व निर्धारित स्थल पर ही किया जाए।

सियासी दल UKD से वास्ता रखने वाले पूर्व नौकरशाह ने कहा कि PWD को सही परियोजना तैयार करने के लिए मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को आदेश जारी करना चाहिए। ये परियोजना 15.79 करोड़ रुपए की थी। अब नए सिरे से आगणन तैयार करना पड़ेगा।

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