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त्रिवेन्द्र के कोप को झेलेंगे सरदार-सूबेदार!

राजनीती

सतपाल-निशंक पर आरोप नहीं लेकिन क्लीन चिट भी नहीं दी

हाई कमान के लाडले CM की कुर्सी हिलाना नहीं आसान

अस्थिरता के गुनहगारों पर कार्रवाई इतनी भी आसान नहीं 

सियासी इनपुट्स तलाशने में नाकाम रही हैं खुफिया एजेंसीज

Chetan Gurung

त्रिवेन्द्र सिंह रावत की चला-चली की हवा एक बार फिर तूफानी वेग से उड़ी। कुछ पल तो ऐसे भी लगे मानो चंद घंटों के भीतर नए मुख्यमंत्री शपथ भी ले सकते हैं। पिछले कुछ दिनों में हर घंटे नहीं, मिनटों के हिसाब से बदलाव की चर्चा की सुनामी आती रही। मुख्यमंत्री के तौर पर संभावित नाम भी कुकुरमुत्ते की तरह फटाफट बिना बारिश-मेघ गर्जना के उग आए। सतपाल महाराज और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक को त्रिवेन्द्र के प्रमुख उत्तराधिकारी के तौर पर पेश किया जा रहा था। अजय भट्ट का नाम भी इस बीच लिया जाने लगा। बदलाव की हवा अभी भी पूरी तरह नहीं थमी है। अलबत्ता, अब ये सर्र-सर्र कर रही। आँधी-तूफान नहीं रह गई है। अब ये जवाब तलाशे जा रहे कि क्या अपने खिलाफ साजिश-तिकड़म रचने वालों पर त्रिवेन्द्र जवाबी हमला कर उनको ठंडा करने की कोशिश करेंगे? ध्यान देने वाली बात ये है कि वह खंडन नहीं कर रहे हैं कि BJP के ही कुछ सूबेदार-सरदार साजिश के तहत फेरबदल की इस इस भीषण सुनामी के लिए जिम्मेदार हैं। सियासी तौर पर इसको बहुत अहम कहा जा सकता है।

इसमें शक नहीं कि त्रिवेन्द्र को सत्ताच्युत करना उतना ही मुश्किल कहा जा सकता है, जितना आसान उनके लिए मुख्यमंत्री बनना था। हकीकत ये है कि ये कुर्सी उनके लिए चुनाव नतीजों से पहले ही सुरक्षित थी। उनको सिर्फ चुनाव जीतना भर था। PM नरेंद्र मोदी और उस वक्त के पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उनका नाम पहले ही तय कर लिया था। लोकसभा चुनावों में भले मोदी का जलवा था। फिर भी राज्य की सभी पाँच सीट बीजेपी के हाथ आ गई थी। विधानसभा उपचुनाव तथा स्थानीय निकाय चुनाव में भी बीजेपी का परचम फहर गया था। इसके बाद शीर्ष कमान के लिए त्रिवेन्द्र को तीन साल बाद हटा देना कहीं से भी तर्क संगत नहीं लगता है।

त्रिवेन्द्र की कार्य शैली निपट सीधी-सादी और रूखी कही जा सकती है। वह काले को काला, सफ़ेद को सफ़ेद कहने की प्रतिष्ठा रखते हैं। जो मौजूदा दौर में नहीं चलता है। उनका ये अंदाज पार्टी के ही कुछ अलमबरदारों को माफिक नहीं बैठ रहा। खुद की सियासत को बचाए रखने और शिष्यों को बनाए रखने के लिए वे मुख्यमंत्री में बदलाव चाह रहे। नेतृत्व परिवर्तन की बयार बहने के पीछे उनको ही माना जा रहा है। मुख्यमंत्री कूटनीतिक-राजनीतिक ज्यादा होते हैं। त्रिवेन्द्र बिना लाग-लपेट के बोलते हैं। मंत्रियों को कस के रख रहे हैं। एक मंत्री के कुछ विवादित फैसलों की फाइल उन्होंने हाल ही में बदल डाली है।

त्रिवेन्द्र विरोधी लॉबी को लगता है कि कोशिशें और शोर मचा के वे शीर्ष कमान और लोगों के दिमाग को एक बारगी हिला जरूर सकते हैं। नेतृत्व परिवर्तन के बारे में सोच के लिए विवश कर सकते हैं। राजनीतिक अस्थिरता का फायदा हो सकता है, उनको मिले। हवा ये बही कि त्रिवेन्द्र हटाए जाते हैं तो सतपाल महाराज उनकी जगह ले सकते हैं। बीजेपी की विचारधारा मुख्यमंत्री-प्रदेश अध्यक्ष को ले के जातीय सोच वाली नहीं रही है। ऐसे में ये भी उड़ने लगी कि केन्द्रीय मंत्री डॉ. निशंक एक बार फिर सत्ता की कमान संभालने आ सकते हैं। यानि, प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत-मुख्यमंत्री दोनों ब्राह्मण हो सकते हैं। डॉ. निशंक देहरादून-हरिद्वार आए तो इतनी अधिक मशहूरी-चर्चा मिली गोया वह शपथ ग्रहण करने आ गए हैं। ये अभी चल ही रहा था कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट का नाम उछल गया।

त्रिवेन्द्र ने एक न्यूज़ चैनल को दिए ताजा इंटरव्यू में कुछ सच्चाई को साफ़गोई से माना। मसलन पार्टी के ही कुछ लोग मुख्यमंत्री बदलने की अफवाह के पीछे हो सकते हैं। उन्होंने कहा-`पार्टी के भीतर के कुछ लोग इस तरह के काम में लगे रहते हैं। जिनको लगता है कि उनको अवसर मिल सकता है। दावेदार सोचते हैं खुद को। जिनको लगता है कि उनको फायदा हो सकता है। ऐसी चर्चाओं से विकास कार्यों को नुकसान पहुंचता है। निचले स्तर के कर्मचारियों पर ऐसी अफवाहों से प्रभाव पड़ता है। मुझे हटाने की अफवाह शुरू से चलती रही है। कुछ लोगों का काम ही यही है’। उन्होंने पूछे जाने पर भले सतपाल महाराज या निशंक पर ये आरोप तो नहीं लगाया कि वे उनको हटाना चाहते हैं, लेकिन दोनों को कोई क्लीन चिट भी नहीं दी।

ये जब लग रहा है कि मुख्यमंत्री बदलने या त्रिवेन्द्र हटाए जाने की चर्चा महज अफवाह है। ऐसे में अब अगली चर्चा मंत्रिपरिषद में फेरबदल और नए चेहरों की भर्ती हो सकती है। त्रिवेन्द्र के समान निशंक भी मोदी-शाह-संघ की गुड बुक्स में माने जाते हैं। महाराज हिन्दुत्व का चेहरा है। दोनों तथ्यों से त्रिवेन्द्र अच्छे ढंग से बावस्ता है। शायद इसी वजह से उन्होंने साफ कह दिया है कि शिकायत करना उनकी फितरत नहीं है। ये जरूर कहा कि उनके पास खुफिया इनपुट्स आते रहते हैं। सियासी मामलों में। वह खुद भी लेते हैं। कहने का मतलब उन्होंने विरोधियों को आगाह कर दिया कि वह सब जानते हैं। उनके खिलाफ कौन क्या साजिश-खेल रच रहा?

ऐसे माहौल में ये सवाल उठना लाजिमी है कि मंत्रिपरिषद फेरबदल में क्या त्रिवेन्द्र कुछ ऐसा कर सकते हैं, जो उनके विरोधियों को कठोर संदेश दे सके? इस बीच जिस तरह सोशल मीडिया ने फेरबदल को ले के बवंडर मचाया। मुख्यमंत्री के सलाहकार लाचार दिखे। उससे एक बार फिर साबित हुआ कि त्रिवेन्द्र के पास काबिल नवरत्नों की भारी कमी है। इस मामले में मुख्यमंत्री रहने के दौरान और अभी भी निशंक ही नहीं सतपाल तक कहीं आगे हैं। अचानक ही सोशल मीडिया में टिड्डियों की तरह छा गए। ये सिर्फ मजबूत निजी टीम के बूते मुमकिन हुआ। सोशल मीडिया की ताकत और अहमियत को दोनों ने बहुत बेहतर ढंग से इस्तेमाल किया। त्रिवेन्द्र इस मामले में पूरे संसाधनों के बावजूद पिछड़े।

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