बाबरी मस्जिद पर मौलाना शाहबुद्दीन ने क्या कहा जानिए।

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तंनजीम ऊलमा-ए-इसलाम के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना शाहाबुद्दीन रजवी ने बाबरी मस्जिद के मुकदमे के सन्दर्भ में कहा कि इस्लाम में मस्जिद की बुनियादी हैसियत है, पैग़म्बरे इस्लाम ने जब नमाज पढ़ने का अपने अनुयायियों को हुक्म दिया और सबसे पहले नमाज़ पढ़ने के लिए जो मस्जिद बनाई गई वो खुद पैग़म्बरे इस्लाम ने बनाई और उसका नाम “मस्जिदे कुबा” रखा और उसी दिन से लोग मस्जिद में इकट्ठा होकर सामूहिक तौर पर नमाज पढ़ने लगे, वैसे पाक साफ सुथरी जमीन पर कोई भी व्यक्ति कहीं भी नमाज़ पढ़ सकता है इसकी इजाजत शरीयत में दी है।

मौलाना ने आगे कहा कोई भी मस्जिद बिरान हो जाए, टूट जाए, खण्डंर बन जाएया गैरों के जरिए शहीद हो जाए तो भी वो जगह इस्लाम की रोशनी में मस्जिद ही रहेगी । ये बात जरूर इस्लाम में वाज़ह(स्पष्ट) किया है कि मस्जिद पाक, साफ, सुथरी जमीन पर ही बनाईं जा सकती है, कब्जा की हुई जमीन या सरकारी जमीन पर मस्जिद नहीं बनाई जा सकती है।

बाबरी मस्जिद में एक अरसे से नमाज़ नहीं हो रही है। तो इसका मतलब यह नहीं है, कि अब वो जगह इबादत के लायक नहीं रही। जिस जगह पर सैकड़ों साल भी अगर नमाज़ न हो तो भी वो मस्जिद के हुक्म में रहेगी। ये समझना के अब जगह मस्जिद के हुक्म के दाखिल नहीं है या मस्जिद इस्लाम के बुनियादी ढांचों में शामिल नहीं है तो ये सब ग़लत फैमी और इस्लाम के वसूलों की जानकारी न होने पर मबनी(आधारित) है। मस्जिद हमेशा मस्जिद ही रहेगी इसका हुक्म बदला नहीं जा सकता है।

हमारे फाजिल जजों को इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम पर अध्धयन करके फैसला लेना चाहिए, नमाज़ के लिए जगह का मुकर्रर करना या मस्जिद तामीर करके सामूहिक तौर पर नमाज़ पढ़ना ऐसा ही है जैसे इन्सान के जिस्म के लिए”रुह” का होना जरूरी है। दूसरे सम्प्रदाय के लोग भी अपनी पूजा, अर्चना के लिए मंदिर, गुरुद्वारा,चर्च जैसे स्थान स्थापित करते हैं। इसीलिए मस्जिद भी इस्लाम का अभिन्न अंग है।

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