Home सम्पादकीय बिल्डर्स की रखैल बनते खूबसूरत पहाड़

बिल्डर्स की रखैल बनते खूबसूरत पहाड़

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मेरा नजरिया

चेतन गुरुंग

दो दशक पुराना वाकया है। राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज का गोल्डन जुबली समारोह था। सेना के अधिकार क्षेत्र वाले गढ़ी से सटे इस कॉलेज में भारत-पाकिस्तान के साथ ही इंग्लैंड के भी कई पूर्व और बुजुर्ग सेना अधिकारियों तथा अन्य पूर्व स्कूली छात्रों को निमंत्रित किया गया था। इनमें जनरल विश्वनाथ शर्मा थे, जो रिमकोलियन (स्कूल के पूर्व छात्रों की संस्था) के अध्यक्ष थे। थल सेना प्रमुख रह चुके थे। और भी कई पूर्व और मौजूदा भारतीय सेना के अधिकारी सपत्नीक उत्साह पूर्वक समारोह में आए हुए थे। समारोह की असल रौनक बढ़ाई पाकिस्तान से आए हुए पूर्व सैन्य अधिकारियों ने। जो रिमकोलियन थे। इनमें प्रमुख जो थे, उनमें साहिबजादा याक़ूब खान भी शामिल थे। जो पाकिस्तान के चर्चित विदेश मंत्री रहे थे।

अन्य पाकिस्तानियों में पाकिस्तान के पूर्व एयर चीफ असगर खान और लेफ्टिनेंट जनरल गुल हसन थे। वह पाकिस्तानी फौज के आखिरी कमांडर इन चीफ थे। भारत-पाकिस्तान-ब्रिटिश संयुक्त फौज के चीफ के बेटे और इंग्लैंड में लॉर्ड (नाम याद नहीं अब) भी लोगों के कौतुहल का केंद्र थे। मैंने सभी से न सिर्फ मुलाक़ात की बल्कि उनके इंटरव्यू भी किए। जो तब `अमर उजाला’ में, जिसमें मैं नौकरी किया करता था, खूब छपे। रोजाना पहले पन्ने पर सभी संस्करणों में छपने का सुख वही बता सकता है, जो छपे।

साहिबजादा हो चाहे गुल हसन और असगर खान, वे खुश इस बात पर थे कि देहरादून की जो यादें उनके जेहन में स्कूली दिनों के दौरान की थीं, वह इस शहर में पाँच दशक बाद पहुँच के भी वैसी ही थीं। स्कूल के आसपास का नजारा वैसा ही था। जैसा उनके पढ़ाई के दौरान होता था। खास तौर पर कॉलेज के बाहर जो रास्ता गढ़ी-डाकरा और कैंब्रियन हाल स्कूल की ओर जाता है। साहिबजादा ने यादों में खोते हुए कहा था-देखिए हुजूर, आज भले दोनों मुल्क आपस में अच्छे रिश्तों के लिए नहीं जाने जाते, तीन जंगें दोनों में हो चुकी हैं। फिर भी हकीकत ये है कि मेरी मीठी यादों से ये स्कूल और देहरादून कभी नहीं निकला। मेरी ख़्वाहिश थी कि एक बार इस स्कूल को जीते जी देख सकूँ। इस शहर को एक बार फिर जी भर के निहार लूँ। अच्छा लगा। जी खुश हुआ। शहर तकरीबन वैसा ही है। गुल हसन-असगर की राय भी जुदा नहीं थीं।

मुझे ये सब इसलिए याद आया कि अभी जब मैं मसूरी जा रहा था तो राजपुर रोड से जो रास्ता मसूरी के लिए मुड़ता है, उसका हाल देख के हैरान रह गया। कदम-कदम पर जहां घने जंगल और पेड़ों की कतारें-हरियाली हुआ करती थीं, वहाँ अब शानदार बंगले, हाउसिंग सोसाइटी और रेस्तरां खुल चुके हैं। पूरे रास्ते ढाबे और ठेलियों में खाने-पीने का सामान बिकता दिखा। लगा कि मसूरी अब देहरादून जू से शुरू हो गया है। पर्यटन सीजन और गर्मी का मेल होने के साथ ही बच्चों के स्कूलों की छुट्टियों के कारण रास्ते में मसूरी से पहले घंटों जाम झेला। हरियाली का कत्ल कर जो इमारतें बनी हैं, उसको अगर विकास कहते हैं तो सरकार और उसके योजनाकारों के दिमाग पर तरस किया जा सकता है। हैरानी होती है कि आखिर मसूरी देहरा विकास प्राधिकरण क्या कर रहा है?

मसूरी में सुप्रीम कोर्ट ने नए निर्माणों पर रोक लगाई है। सिर्फ मरम्मत कर सकते हैं। वह भी मंजूरी ले के। वहाँ एक से एक नई इमारतें दिख रही हैं। बेशक वे कभी पुरानी रही होंगी, लेकिन उनको मरम्मत के नाम पर पूरी तरह नया बना दिया गया। ये साफ दिखता है। मसूरी मोड़ के बाद सीधा आगे बढ़ें तो राजपुर रोड के दोनों ओर बड़ी-बड़ी इमारतें यहाँ भी दिख रही हैं। मसूरी रोड पर तो जंगल-मंगल के करीब दोनों ओर गहरे नालों में जबरदस्त प्लॉट काट के माफिया लोग बेच रहे हैं। एक रेस्तरां देखा `मुखिया का ढाबा’। वहाँ खाना खा रहे थे तो खिड़की से नीचे झांक लिया। पूरा नदी और जंगल साफ कर स्विमिंग पूल और न जाने क्या-क्या निर्माण होता दिखा। ऐसे ही ओल्ड राजपुर में प्रसिद्ध चाइनीज फूड रेस्तरां ऑरचर्ड के नीचे झाँका तो वहाँ भी नदी और घाटियां काट के पत्थरों की चट्टान लगाई जा रही। नदी क्षेत्र को समतल कर प्लॉट काट के बेचे जा रहे।

मसूरी तो तबाह हो चुकी है। मॉनसून के बावजूद वहाँ गर्मी थी और होटल में एसी चलाने पड़े। वक्त आ गया है कि सरकार को चेतना होगा। पर्यटन के बहाने पहाड़ों की खूबसूरती को बिल्डर्स की रखेल बनने से रोकना ही होगा। ये क्या कि वे जब चाहे तब अफसरों-नेताओं की जेब गरम कर नैसर्गिक सौंदर्य के साथ घातक छेड़छाड़ करें। औली में जब दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जुमा को तख्त से उतारने के बाद भागे सहारनपुर के गुप्ता बंधुओं के दोनों बेटों की शाही शादी हुई तो दो काम प्रमुखता से हुए। औली-उत्तराखंड को वह प्रचार मिला, जो सरकार अरबों खर्च के भी आज तक नहीं पा सकी।

दूसरा ये कि एक अछूते और खूबसूरत औली का एक किस्म से अमीरों ने कदमों और मल-मूत्र से मान मर्दन किया। उसको अस्वच्छ जितना कर सकते थे, किया। तमाम हेलिकॉप्टर्स ने कई दिन लगातार उड़ानें भर के ध्वनि प्रदूषण किया। प्रदूषण मापने की विधि को अपनाया जाए तो वहाँ ये मिल तो जाएगा ही, भले पहले शून्य था। वहाँ अस्थाई निर्माण शादी के नाम पर हुए। एक आशंका ये भी थी कि शायद हाई कोर्ट इस शादी पर रोक लगा दे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत औली और अन्य सौंदर्य ओढ़े पहाड़ी स्थलों को शादी के लिए प्रमुख केंद्र के तौर पर स्थापित करना चाहते हैं। सो सरकार के कारिंदों ने इस शादी के आयोजन को सफल बनाने के लिए खुद को झोंक दिया।

इसमें हर्ज नहीं है कि उत्तराखंड के पास जब आय के संसाधन सीमित हैं। खर्च बहुत ज्यादा है। आय बढ़ाने के और उपाय कम हैं, तो पर्यटन आय के स्रोत बढ़ाने में काम आएगा। स्विट्जरलैंड और ज्यादा दूर न जाओ तो नेपाल और भूटान की अर्थ व्यवस्था पर्यटन पर बहुत अधिक निर्भर है। इसके बावजूद दोनों देश इस बात का भरपूर ख्याल रखते हैं कि जो लोग पर्यटन के लिए आते हैं, वे गंदगी न फैलाएँ और वानिकी तथा पारिस्थिकी को बाधित न करें।

सरकार को इस दिशा में कुछ सख्त रुख तो अपनाना ही होगा। ऐसा उपाय अख़्तियार करना होगा, जिसमें पर्यटन तो बढ़े लेकिन पहाड़ों और वहाँ की कुदरती सुंदरता बरकरार रहे। अभी नहीं चेते तो एक दिन देहरादून और उत्तराखंड की पहाड़ियाँ सिर्फ नखलिस्तान हो जाएँगी। फिर पछताने के सिवाय कोई विकल्प नहीं होगा। कभी देहरादून का दिन का तापमान गर्मियों में 35 पार करता था तो हल्ला हो जाता था। अब 41 पहुँच जाता है। सरकार ध्यान नहीं देगी तो ये बहुत करीबी सालों में 45 को स्पर्श करेगा।

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