बेदाग होने का फैसला भी छिपा के रखा गया

सरकार ने खुद ही आरोप लगाए और खुद ही बलहीन बोल दिया

त्रिवेन्द्र सरकार में शराब वालों की पौ बारह

दागी होने के बावजूद कुर्सी पर जमे अफसर

1000 करोड़ का झटका सरकारी खजाने को लगने की आशंका

चेतन गुरुंग

ऐसी नजीर कम ही मिलेगी कि सरकार पहले तो खुद ही आरोप लगाए, फिर जांच किए बिना ही अपने लगाए आरोपों को खुद ही ये बोलते हुए काट दे और जांच ही खत्म कर दे कि इनमें कोई दम नहीं था। आबकारी महकमे में पिछले वित्तीय वर्ष (2018-19) में सरकार को सैकड़ों करोड़ का घाटा आबकारी में हुआ था। साथ ही बैंक गारंटी घोटाला भी सामने आया था। जब इस मामले को वीकएंड टाइम्स ने जबर्दस्त तरीके से उठाया तो मुख्यमंत्री ने दो काम एक साथ किए थे। एक तो उन्होंने आबकारी नीति को ही पलट दिया था। इस रोल बैक के कारण सरकार की खिल्ली भी उड़ी थी। दूसरा काम घोटाले के आरोपों की जांच भी बैठा दी थी। उससे पहले देहरादून, हरिद्वार और चंपावत के जिला आबकारी अधिकारियों को निलंबित कर दिया था।

आरोप ये लगाए गए थे कि दुकानों से बैंक गारंटी या तो ली ही नहीं गई थी। या फिर फर्जी किस्म की बैंक गारंटी ली गई। इससे सरकार की साख तो दांव पर लगी ही साथ ही सरकार का पैसा भी बुरी तरह फंसा। कई शराब दुकानों के मालिकों ने ये कहते हुए पैसा सरकारी खजाने में जमा नहीं कराया कि उनको घाटा हो गया है। वे पैसा जमा करने की दशा में नहीं हैं। सरकार उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाई थी। साथ ही ये आरोप भी लगाए गए थे कि आबकारी नीति को कुछ खास लोगों को ध्यान में रखते हुए, उनके हिसाब से बनाया गया। सरकार ने नीति के कई बिन्दुओं को बदल दिया था।

इसके बाद भी आबकारी महकमे में खेल चलते रहे। देहरादून के मनोज उपाध्याय, हरिद्वार के प्रशांत कुमार और चंपावत के राजेन्द्र लाल को निलंबित करने के बावजूद उनकी खाली कुर्सियों पर किसी भी विभागीय अफसर को नहीं बिठाया गया। ये आरोप फिर लगे थे कि निलंबित अफसरों को हाई कोर्ट से स्टे लेने और फिर उसी कुर्सी पर बिठाने के आदेश लाने का इंतजार किया गया। ऐसा ही हुआ। तीनों हाई कोर्ट से आदेश ले आए और कुर्सी पर जम गए। प्रशांत को रूड़की में जहरीली शराब पी के हुई मौतों के बाद निलंबित किया गया। उपाध्याय और लाल आज भी वहीं जमे हैं।

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