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नौकरशाही से हारे विक्टोरिया क्रॉस विजेता गजे घले

एक नाली जमीन तक को तरसे दूसरे विश्वयुद्ध के नायक

अपना घर तक नहीं बना पाए

साल-2000 में अल्मोड़ा के सैनिक क्वार्टर में ली आखिरी सांस

डीएम से ले के सीएम-पीएम तक ने नहीं की कोई मदद

बेटे चाहते हैं फ़ौजियों के लिए विश्राम घर

चेतन गुरुंग

दूसरे विश्व युद्ध (1939-1945)के दौरान जब ब्रिटिश फौज कई मोर्चों पर जूझ रही थी। बर्मा के चिन हिल्स में वह दुश्मनों को ध्वस्त करती जा रही थी। यहाँ गजे घले गुरुंग अपने अप्रतिम शौर्य-वीरता के बूते दुश्मन जापानी फौज को मुंह की खिला रहे थे। प्लाटून कमांडर हवलदार गजे ने यहाँ हैंड टू हैंड युद्ध भी किया। मोर्चा फतह किया। ब्रिटिश सरकार ने अपने सबसे बड़े वीरता पुरस्कार विक्टोरिया क्रॉस से उनको अलंकृत किया। इस जाँबाज विक्टोरिया क्रॉस विजेता को पहले भारत और उत्तर प्रदेश सरकार ने फिर अब उत्तराखंड सरकार ने भी बिसरा दिया है।

नेपाल में बारपाक नाम की जगह है। गुरुंग बाहुल्य इलाका है। वही जहां कुछ साल पहले जब भीषण भूकंप आया था। सैकड़ों की जान चली गई थी। वहीं वह पैदा हुए थे। फिर ब्रिटिश-भारत फौज में भर्ती हो गए थे। भारत आजाद हुआ तो उनकी फलटन 2/5 गोर्खा राइफल्स यहीं रह गई। इसके बाद गजे ने हिंदुस्तान की सरजमी को अपनी मातृ भूमि बना लिया। यहीं की नागरिकता ले ली। आज भले हम उत्तराखंड में पलायन की फिक्र करते नहीं थक रहे, लेकिन गजे ने हिंदुस्तान में सिर्फ और सिर्फ अल्मोड़ा को ही अपना आशियाना बनाया। वह चाहते तो इंग्लैंड में आराम से उनको नागरिकता मिल सकती थी। शानदार जीवन गुजार सकते थे। उनको हिंदुस्तान की मिट्टी से प्यार हो गया था।

1965 में भारतीय फौज से रिटायर होने के बाद वह अल्मोड़ा में ही स्थाई तौर पर बस गए। फौज के क्वार्टर में परिवार के 11 लोगों के साथ रहे। कितना मुश्किल रहा होगा। फौज के सूबेदार मेजर के लिए। परिवार को पालना। बाद में वह ऑनरेरी कैप्टेन बने। गजे के साथ विडम्बना जबर्दस्त रही। इसके लिए सरकारें (केंद्र-राज्य), प्रशासन और मीडिया भी जिम्मेदार रही। जब तक वह जीवित रहे, न मीडिया और न ही सरकारों ने उनको कोई तवज्जो दी। वह जीवित विक्टोरिया क्रॉस विजेता थे। आखिरी सांस उन्होंने साल-2000 के 28 मार्च में ली। उन्होंने भारत को ही इस कदर अपना देश माना कि फिर नेपाल कभी-कभी ही जाना हो पाया उनका। वहाँ की किताबों-कहानियों में जरूर उनकी बहादुरी को बहुत सम्मान दिया जाता है। घले अल्मोड़ा में कैंट बोर्ड के चुनाव भी लड़े और जीत के मेम्बर बने।

1994 में जब उत्तराखंड राज्य के लिए आंदोलन शुरू हुआ फिर तेज हुआ। ब्रिटिश और भारत सरकार की सेवा कर चुके गजे घले अल्मोड़ा में आंदोलन का नेतृत्व करने वालों में शामिल थे। सरकारों की जमीन पर आज भी जम के अवैध कब्जे हो रहे हैं। मंत्री-विधायकों-नौकरशाहों और माफिया तत्वों के नाम इसमें आते रहते हैं। नेताओं की सिफ़ारिश या फिर नौकरशाहों की इच्छा से ऐसे लोगों को जमीन आवंटित होती रही हैं, जिनमें से अधिकाश इसके पात्र नहीं हैं। गजे घले को उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद जमीन नहीं मिली। वह चाहते थे कि उनको भी एक नाली जमीन सरकार से मिल जाए। इसके लिए उन्होंने डीएम से ले के सीएम-पीएम तक गुहार लगाई। चिट्ठियाँ लिखीं।

फौज के अफसरों और एनडी तिवाड़ी-हरीश रावत ने भी सरकार और प्रशासन को गजे की वीरता और देश के प्रति सम्मान को देखते हुए कृषि भूमि आवंटित करने की सिफ़ारिश की। कुछ नहीं हुआ। उनके बेटे केशर घले, जो अब दिल्ली में रहते हैं, के मुताबिक सरकारों ने सदा उपेक्षा की। उनके पिता के पास न कोई संपत्ति थी न ही पैसा। रिटायर होने के बाद जो पैसा मिला वह परिवार को पालने-पोसने में ही खत्म हो गया। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। ब्रिटिश सरकार से कुछ पैसा नहीं मिलता था। नेपाल ने उनको भारत का मान लिया था। वहाँ की सरकार ने क्यों मदद करनी थी। भारत की सरकारी मशीनरी ने उनको कभी अपना नहीं माना। गजे घले ने आखिरी सांस जब ली तो अल्मोड़ा के फौजी क्वार्टर में।

केशर के मुताबिक-`हमारे पास अपना घर ही नहीं था। फील्ड मार्शल और सेना प्रमुख रहे एसएचएफ़जे मानेकशॉ पिताजी का बहुत सम्मान कर थे। एक दिन उन्होंने पिताजी से पूछा-क्या दिक्कत है? जमीन और अपना घर न होने की दिक्कत बताई गई उनको। मानेकशॉ ने फरमान जारी किया-जब तक जीवित हैं, गजे घले फौजी क्वार्टर में रह सकेंगे’। ऐसा ही हुआ। केशर के भाई इंग्लैंड में बहनें नेपाल में हैं। वह खुद गृह मंत्रालय से रिटायर हो के दिल्ली रह रहे हैं।

उनकी तमन्ना है कि पिताजी की अल्मोड़ा में पूर्व फ़ौजियों या फिर फौज में भर्ती होने के लिए आने वालों के लिए सस्ते विश्राम गृह के निर्माण की इच्छा को पूरा किया जाए। इसके लिए सरकार से जो एक नाली जमीन मिलनी थी, उसको हासिल करना चाहते हैं। उत्तराखंड सरकार से वह बात करना चाह रहे हैं, लेकिन वह समझ नहीं पा रहे हैं कि किस्से प्रभावी ढंग से बात की जाए। अल्मोड़ा के नौजवान जिलाधिकारी नितिन भदौरिया से वह फोन पर संपर्क में रहते हैं। कुछ महीने पहले वह अल्मोड़ा गए थे। पिताजी की प्रतिमा की स्थापना समारोह में। तब डीएम से मिल कर अपनी और दिवंगत पिता की इच्छा के बारे में उन्होंने चर्चा की थी।

उनको इस पर भी मलाल है कि पिताजी का नाम उत्तराखंड सरकार भी विक्टोरिया क्रॉस विजेताओं के जिक्र के दौरान कभी नहीं लेती। जो उत्तराखंड में रहते थे। आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने से पीछे नहीं हटे। सरकार के रेकॉर्ड में सदा गबर सिंह नेगी और दरबान सिंह नेगी का नाम ही विक्टोरिया क्रॉस विजेताओं में दर्ज रहा। केशर चाहते हैं कि सरकार उनके पिता को भी दोनों विक्टोरिया क्रॉस विजेताओं के साथ रेकॉर्ड में शामिल करे और सम्मान दें। साथ ही फ़ौजियों-पूर्व फ़ौजियों-उनके आश्रितों के विश्राम गृह निर्माण के लिए जल्द से जल्द जमीन मिल सके। उम्मीद है कि सरकार विक्टोरिया क्रॉस विजेता गजे घले को सम्मान देगी। उनकी इकलौती इच्छा पूरी करेगी।

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