जो सीएम माहौल भाँप नहीं पाए,झटका खा गए

चेतन गुरुंग

केंद्र में वाजपाई सरकार के दौरान बीसी खंडूड़ी का केंद्र में मंत्री के तौर पर खूब नाम हुआ करता था। उनको वही दर्जा हासिल था जो आज मोदी सरकार में नितिन गडकरी को है। खंडूड़ी की लोकप्रियता का आलम ये था कि जब उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ तो अन्तरिम सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर उनका नाम सबसे आगे चल रहा था। ब्राह्मण लॉबी में ही उनका विरोध शुरू हो गया तो खंडूड़ी की इच्छाओं पर पानी फिर गया। इस लॉबी से डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने विद्रोह का बिगुल बजाया। उनको ठाकुर नेता भगत सिंह कोश्यारी और बीसी के ही करीबी समझे जाने वाले केदार सिंह फोनिया का भी साथ मिला। नित्यानन्द स्वामी भी साथ आ गए। ये तय हुआ कि मुख्यमंत्री विधायकों में से ही बनाया जाए।

बीसी सांसद हुआ करते थे। सिर फुटव्वल इतना हुआ कि बीसी का नाम कट गया। विधायकों में स्वामी को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद स्वामी को बाहरी बता के निबटाने में बीजेपी के बाकी क्षत्रप जुट गए। स्वामी हट नहीं पा रहे थे। इस बीच एक दोपहरी मैं यूं ही विधानसभा पहुंचा। वहाँ सीढ़ियों पर कैलाश अग्रवाल मिल गए। स्वामी के एकदम खासमखास। घरेलू सदस्य किस्म के। मेरे स्वामी से रिश्ते अच्छे थे। कैलाश ने मुझे कहा कि गुरुंग साहब स्वामी जी का इंटरव्यू कर दीजिये। मैंने कहा वह तो रुद्रपुर जाने वाले थे आज। तब बताया गया कि किसी वजह से दौरा रद्द हो गया। अब दफ्तर में मुख्यमंत्री अकेले और तकरीबन खाली बैठे हैं। मैंने कहा ठीक है इंटरव्यू करता हूँ।मेरे पास छोटी कैसेट वाला नया टेप रिकॉर्डर हुआ करता था। वह ऑन किया।स्वामी का इंटरव्यू शुरू किया। शुरुआत सामान्य सवालों से। फिर उस मुद्दे पर आ गया जो उन दिनों हँगामा मचाए हुए था।

मैंने उनसे पूछा-आपको अगर हटा दिया जाए तो? स्वामी ने फौरन जवाब दिया-पार्टी को नतीजे गंभीर भुगतने पड़ेंगे। मैंने चौंका। इतना कड़क जवाब! कहीं कल मुकर  न जाएँ। खंडन न भेज दें। मैंने दुबारा पूछा। वही जवाब मिला। मेरे हाथ तगड़ा इंटरव्यू लग गया था। बिना प्लानिंग के ही। अगले दिन `अमर उजाला’ में पहले पेज पर छपा। सुबह मैं भगत सिंह कोश्यारी के सरकारी बंगले (आज के मंत्री प्रकाश पंत वाला सरकारी आवास) पर पहुंचा तो वहाँ मीडिया का जबर्दस्त जमावड़ा था। विधायक और मंत्री थे। फोनिया और चुफाल मुझे पोर्च में मिल गए। मुझसे हाथ मिलाया गर्मजोशी से। शाबास भी कहा। अंदर कोश्यारी पत्रकारों से घिरे इंटरव्यू दे रहे थे। मुझे देख के बोले ये आ गया आज का हीरो। फोनिया ने मुझे बताया कि स्वामी को हटाया जाएगा। इंटरव्यू ने दिल्ली में हंगामा मचा दिया है। मुझे इतना ज्यादा हँगामा होने की उम्मीद इंटरव्यू से नहीं थी। स्वामी को तत्काल दिल्ली तलब किया गया। इंटरव्यू पर सफाई मांगी। फिर रात तक खबर आई कि कोश्यारी मुख्यमंत्री बनेंगे।

पार्टी के भीतर इसी तरह के हालात के कारण ही बीजेपी पहला ही विधानसभा चुनाव 2002 में अप्रत्याशित रूप से हार गई। टिकटों का बंटवारा बिना सोचे समझे किया गया था। ये सोच के कि किसी को भी लड़ा दो जीत ही जाएगा बीजेपी के नाम पर। पाँच साल बाद फिर विधानसभा चुनाव होने वाले थे। खंडूड़ी ने इस बार कुछ अतिरिक्त कोशिश की। कोश्यारी-निशंक-फोनिया और वह मुख्यमंत्री बनने का लक्ष्य ले के उतरे थे मैदान में। खंडूड़ी ने बाजी मार ली। जिस दिन वह कुर्सी पर बैठे उससे पहले से उनके खिलाफ माहौल बन चुका था। उनको हटाने के लिए साजिशें-कोशिशें लगातार चलती रहीं। बीसी पर हाई कमान का यकीन बहुत था। खंडूड़ी ने भी गल्तियाँ की। अपने सचिव प्रभात सारंगी को अथाह शक्तियाँ दे डालीं। सरकार वही चलाते हैं, ऐसा संदेश निकालने लगा। सारंगी के खिलाफ सिर्फ बीजेपी में नहीं काँग्रेस में भी नाराजगी खूब रही। उनसे खुद लेफ्टिनेंट जनरल तेजपाल सिंह रावत तक नाराज रहने लगे। रावत ने ही बीसी के लिए धूमा कोट की सीट छोड़ी थी। इसी सीट पर उप चुनाव जीत के खंडूड़ी विधानसभा पहुंचे थे। बीजेपी को एक सीट फालतू मिली थी।

ऐसे में 2009 का लोकसभा चुनाव आ गया। असंतुष्टों ने भाँप लिया कि बीसी को हटाने का एक ही रास्ता है। चुनाव में पांचों सीटें हरवा दी जाए। ऐसा ही हुआ। जिस खंडूड़ी पर हाई कमान का बहुत यकीन था। उसने उनकी जगह निशंक को बैठा दिया। कोश्यारी एक बार फिर खाली हाथ रह गए। बीसी अपने खिलाफ माहौल का अंदाज ढंग से लगा नहीं पाए थे। चुनाव के बाद तकरीबन 30 विधायक उनके खिलाफ शिकायत करने हाई कमान के पास दिल्ली गए थे।मैंने रात को मुख्यमंत्री को फोन किया और इस पर उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाहिए। इस पर बीसी बोले ऐसा कुछ नहीं है। मैंने उनको कहा पुष्टि खुद ही कर लें। 30 मिनट बाद उनका फोन आया कि उनकी काफी विधायकों से बात हो गई है। वे अपने क्षेत्रों में ही हैं। हकीकत में वे दिल्ली और कुछ लोग चंडीगढ़ थे। मेरी उनसे बात हो रही थी। वे क्यों बीसी को सही जगह बताते। ज्यादा दिन नहीं लगे फिर। बीसी को हटने में।पार्टी ने तो उनको हटा दिया। न चाहते हुए भी।

आज त्रिवेन्द्र की स्थिति भी खंडूड़ी जैसी है कहा जाए तो गलत नहीं होगा। वह बीसी से ज्यादा ही मजबूत हैं। जबर्दस्त बहुमत की सरकार चला रहे। इसकी बावजूद असंतुष्टों की तादाद बढ़ती गई तो त्रिवेन्द्र को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। खंडूड़ी के पास फिर भी कुछ सलाहकार थे। त्रिवेन्द्र के पास अच्छे सलाहकारों का कतई अभाव है। फिर उनकी फितरत जल्दी से किसी पर यकीन करने या फिर उसकी बात मान जाने की भी नहीं है। ऐसे में देखना दिलचस्प रहने वाला है कि मौजूदा हालात को देखते हुए त्रिवेन्द्र और मजबूत होते हैं या फिर कोई नया चेहरा उनकी कुर्सी पर दिखाई देता है। 

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