बार लाइसेन्स जारी करने में भी खुला खेल फर्रुखाबादी

स्पेशल ऑडिट से क्यों बच रही सरकार?

देहरादून में दुकानों के नवीनीकरण में भी जम कर धांधली

बिना पैसे जमा किए फिर सौंप दी दुकानें

कई दुकानों पर आज भी करोड़ों बकाया

चेतन गुरुंग

देहरादून आबकारी महकमे का सबसे बड़ा राजस्व स्रोत है। सरकार को सबसे ज्यादा राजस्व मिलने की उम्मीद यहीं से होती है। ऐसा माना जाता है कि देहरादून में DEO वही बन पाता है, जिसकी अंटी में माल ज्यादा होता है या फिर माल के साथ सियासी दम और शराब माफिया संग बढ़िया कदमताल। ऐसे में देहरादून में ही सरकार को राजस्व संग्रह में अरबों की चोट लग जाना बहुत बड़ी साजिश और घोटाले को इंगित करता है। इन दिनों आबकारी मुख्यालय से आए अफसरों की टीम को जिस तरह एक के बाद एक घोटालों और अनियमितता के निशान या सुबूत, जांच में मिल रहे हैं, उससे वे खुद बेहद हैरान हैं। सरकार को सिर्फ देहरादून से ही 500 करोड़ का फटका लगता दिख रहा है।

अभी तक की जांच में कई हैरान करने वाले तथ्य सामने आए हैं। देहरादून की कई ऐसी दुकानों को आज भी चलने दिया जा रहा है। जो पिछले साल की डिफ़ाल्टर हैं। उन दुकानों के मालिकों या कंपनियों ने सरकार को बकाया राजस्व दिया ही नहीं है। आबकारी एक्ट के मुताबिक ऐसों को न तो दुकान दुबारा दी जा सकती है न ही आगे धंधा करने दिया जा सकता है। हुआ इसके उल्टा। ऐसे कई अनुज्ञापियों (दुकानदारों) को न सिर्फ नियम-कानून-प्रावधान विरुद्ध राहत दी गई, बल्कि भरसक मदद की गई कि वे आगे भी सरकार को खूब चूना लगाएँ। खूब माल बटोरें।

ये इसलिए साफ हो रहा है कि उन्हीं दुकानदारों को देहरादून में फिर से दुकानें नवीनीकरण में सौंप दी गई। बजाए RC जारी कराने या फिर मुकदमा करने के। इतना बड़ा खेल और ऐसी करोड़ों की मुनाफे वाली राहत शराब महकमे में कोई अफसर किसी को यूं ही दे देगा, इस पर बहस भी करनी बेकार है। इतना ही नहीं, कई दुकानों का मूल्यांकन और कीमत निर्धारण बहुत ही कम किया गया। मासिक लाइसेन्स फीस भी नहीं ली जा रही है। बैंक गारंटी और प्रतिभूतियों को जमा किए बगैर करोड़ों का टर्न ओवर हासिल करने का मौका दुकानदारों और माफिया तंत्र को दिया जा रहा है। उनको शराब की निकासी की मंजूरी DEO से मिल रही है।

मुख्यालय से आए संयुक्त आयुक्त BS Chauhaan और उपायुक्त रमेश चौहान अभी जांच को कुछ दिन और जारी रखेंगे। ऐसा सूत्र बता रहे हैं। अहम सवाल ये भी है कि सरकार का रुख ये सब तथ्य सामने आने के बावजूद जिम्मेदार और दागी अफसरों के प्रति अभी तक सख्त नहीं दिख रहे हैं। देहरादून के DEO मनोज उपाध्याय तो सवालों के घेरे में है ही, एक संयुक्त आयुक्त पर भी आरोप है कि उसकी ही देख-रेख में आबकारी नीतियाँ बनाई जा रही हैं। फौरी फैसले लिए जा रहे हैं। सरकार को अरबों का नुक्सान पहुंचाया जा रहा है। सरकार की खिल्ली उड़ रही है।

आबकारी मंत्रालय भी संभाल रहे मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के पास इतना वक्त नहीं दिख रहा कि महकमे में चल रहे खेल-साजिश पर नकेल कस सके। करीबी सूत्रों के मुताबिक उस्ताद अफसरों ने मुख्यमंत्री दरबार में भी सेंध लगा डाली है। ये बात अलग है कि मुख्यमंत्री ने कुछ मामलों में सख्ती दिखाई है। करीब 25 बार के लाइसेन्स जारी करने की फ़ाइल उनके पास है। जो सुना है कि मुख्यमंत्री अभी दस्तखत करने के मूड में नहीं हैं। इन बार लायसेंस फ़ाइल में भी खूब खेल हुए हैं। सभी जानते हैं कि ऐसे लाइसेन्स कैसे जारी होते हैं। मुख्यमंत्री इन फाइलों को रोक भी सकते हैं।

सरकार अगर 132 शराब दुकानों को बंद कर अरबों का घाटा सह सकती है तो फिर इतने अधिक बारों को मंजूरी देने की जरूरत भी क्या है? इनसे होने वाले घाटे को भी सहा जा सकता है। इससे सरकार की छवि देवप्रयाग हिल टॉप कांड के बाद थोड़ी बेहतर होगी। ये भी बात उठ रही है कि सरकार को पिछले साल भी जांच रिपोर्ट दे के बताया गया था कि देहरादून में क्या खेल और घोटाले हुए। फिर क्यों उन पर कदम नहीं उठाए गए। किसी जिम्मेदार पर कार्रवाई नहीं हुई?

अब ये साजिश चल रही कि तराई जिलों में शराब की दुकानों का उठान न होने का जिम्मा मुख्यालय से जिलों में उठान के लिए भेजे गए अफसरों पर डाला जाए। इसके लिए भी विवादित संयुक्त आयुक्त को दोषी ठहराया जा रहा है। खास बात ये भी है कि तमाम घोटालों और बदनामियों के बावजूद सरकार उससे अहम ज़िम्मेदारी वापिस लेने को राजी नहीं दिख रही है। वह देहरादून, हरिद्वार, उधम सिंह नगर, नैनीताल, पौड़ी, टिहरी, अल्मोड़ा का पिछले दो सालों का स्पेशल ऑडिट कराने को भी क्यों नहीं तैयार हो रही? इस पर भी सवाल है।

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