बोले-डॉ. अरविंद को बर्खास्त करने से पहले बोर्ड के सम्मुख बुलाना चाहिए था

कुलपति-निदेशक साजिश के आरोप के घेरे में

एक ही आरोप में तीसरी बार नौकरी छीनी

सीएम त्रिवेन्द्र पर नजरें टिकीं कि क्या कदम उठाते हैं

चेतन गुरुंग

बोर्ड ऑफ गवर्नर्स (THDC-IHET, टिहरी) ने अध्यक्ष डॉ. DP कोठारी को अंधेरे में रख के प्रो. अरविंद कुमार सिंह को बर्खास्त करने का फैसला किया। डॉ. कोठारी ने खुद बताया कि वह इस बात से इत्तफाक नहीं रख रहे कि प्रो. सिंह को बर्खास्त करने का कदम सही है। उन्होंने Newsspace से साफ कहा-मुझे ऐन बैठक में बताया गया कि प्रो. सिंह को बर्खास्त करने का फैसला होना है। मैंने शुरूआत में इसका समर्थन नहीं किया। फिर जब ACS (तकनीकी शिक्षा) ओमप्रकाश ने कुछ आनाकानी के बाद प्रस्ताव पर दस्तखत कर दिए तो मुझे भी करना पड़ा। प्रस्ताव की मंजूरी पर UTU के कुलपति और कॉलेज के प्रभारी निदेशक KKS मेर जिद पकड़े हुए थे।

प्रो. सिंह को बर्खास्त कर लगता है बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने खुद के लिए कई संकटों को बुलावा भेजा है। खास तौर पर ये देखते हुए कि डॉ. कोठारी ने कह दिया कि न सिर्फ उनको इस बारे में पहले कुछ बताया गया और न ही ये प्रस्ताव बैठक के एजेंडे में ही शुमार था। अब उनका व्हाट्स एप मैसेज भी विरल हो रहा है। इसमें उन्होंने गोपेश्वर और टिहरी कॉलेज के निदेशक की कुर्सी संभाले बैठे मेर से पूछा है कि `क्या ये सच है कि कमेटी और कोर्ट जजमेंट ये कहता है कि हमारा (BoG) काम सिर्फ डॉ.अरविंद के वेतन पर फैसला करना भर था?

डॉ. कोठारी ने मैसेज में कहा है कि वह पहले कोर्ट जजमेंट और कमेटी की रिपोर्ट को पढ़े। उसके बाद अंतिम फैसला (डॉ.अरविंद की बर्खास्तगी पर) करें। सादर-कोठारी। इसका मतलब ये हुआ कि बैठक में अध्यक्ष को गुमराह किया गया। उनको डॉ. अरविंद के मामले में पूरी तरह गुमराह किया गया। ये न सिर्फ गहरी साजिश है, बल्कि बोर्ड बैठक में लिए गए फैसले पर अंगुली उठाती है। साथ ही ये भी साफ करता है कि जब अध्यक्ष ही फैसले और प्रस्ताव पर खुद को अंधेरे में रखने का एक किस्म से आरोप लगा रहे हैं, तो फैसले पर अमल का कोई औचित्य नहीं रह जाता है।

ऐसा साफ तौर पर जाहिर हो रहा है कि बोर्ड बैठक बुलाने का मकसद किसी बड़ी और अहम भावी योजना पर चर्चा करना नहीं था। सिर्फ डॉ. अरविंद को बर्खास्त करना और 16 विवादित लोगों को तनख्वाह जारी करना था। हैरानी की बात ये है कि बोर्ड के सम्मुख कई अहम प्रस्तावों को लाया नहीं गया। जो जरूरी समझा जा रहा था। मसलन, THDC प्रबंधन के रहते क्यों कॉलेज गेस्ट हाउस के निर्माण पर करोड़ों खर्च किए जा रहे हैं? क्यों 12 लोगों को बिना किसी नवीनीकरण के साल भर से ज्यादा समय तक कॉलेज में रखा ही नहीं गया, बल्कि तनख्वाह भी उनको मिलती रही। चार लोगों को हाल के महीनों में जिस तरह एक ही दिन में चुन कर जॉइन कराया गया, उसकी प्रक्रिया पर जांच क्यों नहीं की गई? ऐसे निदेशक को कॉलेज में रखने की जरूरत ही क्या, जो दो महीने में सिर्फ चार दिन कॉलेज आया। जुलाई की तनख्वाह तक दे पाने में नाकाम रहा। कॉलेज में असंतोष फ़ेल गया।

मेर को गोपेश्वर का निदेशक बनाने पर भी अंगुली उठाई जा रही है। निदेशक बनाए जाते वक्त वह एसोसिएट प्रोफेसर थे। प्रोफेसर नहीं, जो कि योग्यता का पैमाना है। इसके साथ ही प्रो. अरविंद के प्रति कुलपति चौधरी और मेर के रिश्ते बहुत खराब समझे जाते हैं। चौधरी का अपने प्रतिनिधि को न भेज खुद बैठक में आने पर ही कई सवाल उठाए जा रहे हैं। उन पर नागपुर में NIT निदेशक रहने के दौरान की गई भर्तियों में धांधली के आरोप भी हैं। इसके बावजूद उनका कुलपति चुना जाना और हाई कोर्ट में खुद को डॉ. नरेंद्र चौहान बताना भी विवादों में रहा है।

Newsspace के पास ऐसे ऑडियो रेकॉर्ड्स भी हैं, जो बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक किस तरह हुई और किस तरह साजिशन डॉ. अरविंद को बर्खास्त करने का फैसला लिया गया, उसका खुलासा होता है। सूत्रों के मुताबिक ओमप्रकाश भी इतने कड़े फैसले को लेने के हक में नजर नहीं आ रहे थे। चौधरी-मेर की जिद के कारण ही उन्होंने प्रस्ताव पर दस्तखत किए। डॉ. कोठारी इस हक में थे कि इतना बड़ा और अहम फैसला लेने से पहले एक बार डॉ. अरविंद को भी क्यों न सुन लिया जाए। बोर्ड के इस फैसले को हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती देने और साजिशकर्ताओं के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग को ले कर प्रो. अरविंद तैयारी कर रहे हैं।

इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत क्या निर्देश अफसरों और बोर्ड के सदस्यों को देते हैं, ये देखना खास होगा। रावत ही तकनीकी शिक्षा के मंत्री भी हैं। ऐसा समझा जा रहा ही कि बोर्ड के सदस्यों, खास तौर पर मेर और कुलपति को बैठक के तकरीबन सभी फैसलों पर आने वाले दिनों में तकलीफ़ों का सामना करना पड़ सकता है। प्रो. अरविंद ने कहा कि उनको एक ही आरोप (अनुशासनहीनता) में तीसरी बार सीधे बर्खास्त किया गया। वह 12 बार अदालत में जीत चुके हैं। अगर बोर्ड ने फैसले पर अमल नहीं रोका तो वह सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे। अवमानना का मुद्दा बनाएँगे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here