शराब महकमे में जिसकी लाठी,उसकी भैंस कब तक?

आबकारी आयुक्त ने सफाई मांगी भी तो कुछ नहीं हुआ

मजबूत लॉबी हर तरह से सरकार को पहुंचा रही चोट

चेतन गुरुंग

शराब महकमे में जितना लिखो-जितनी नजर मारो..उतना कम है। मीडिया की नजर से खुद को छिपाने में इस महकमे के अफसर हमेशा कामयाब रहते हैं। ये किसी की समझ में नहीं आता कि बड़े-बड़े और करोड़ों-अरबों के घोटालों पर कैसे उनकी पारखी नजर नहीं जाती। चंद लाख के मामलों को सनसनीखेज बनाने वाले अखबार और पत्रकार कैसे शराब वालों के आगे चुप्पी साध जाते हैं। इस तरह की खबरों के लिए newsspace है। देहरादून के जिला आबकारी अधिकारी मनोज उपाध्याय ने जो खेल पिछले और इस साल खेले, सभी को पता है। अल्मोड़ा में जिला आबकारी अधिकारी दुर्गेश्वर त्रिपाठी पहले नैनीताल में डीईओ थे। इस बात को ले कर हैरानी होगा स्वाभाविक है कि करोड़ों का राजस्व नुक्सान पहुंचाने के दागी को कैसे लगातार दूसरा कार्यकाल फील्ड का मिल गया।

खास तौर पर ये देखते हुए कि जीरो टालरेंस वाली त्रिवेन्द्र सरकार है। इसके बावजूद त्रिपाठी न सिर्फ मलाईदार पोस्टिंग पा गए, नैनीताल कार्यकाल के खेल सामने आने के बावजूद बने हुए हैं। पिछले आबकारी आयुक्त दीपेन्द्र चौधरी ने त्रिपाठी को चिट्ठी लिख के सफाई मांगी थी। क्यों न तुम्हारे खिलाफ कार्रवाई की जाए। त्रिपाठी ने नैनीताल पोस्टिंग के दौरान तीन जगहों की दुकानों के मालिकों (अनुज्ञापियों) से बैंक गारंटी ही नहीं ली। न ही कैश वाली दूरी प्रतिभूति (सिक्योरिटी) जो कि अनिवार्य है, ली। बस उनको करोड़ों का धंधा करने दिया जाता रहा। सरकार के खजाने में पैसा आया ही नहीं।

कुछ मामले फर्जी बैंक गारंटी के भी सामने आए। बिना सिक्योरिटी के शराब की निकासी भी कराते रहे। जिस आबकारी इंस्पेक्टर हरीश जोशी ने डीईओ को आगाह किया कि राजस्व और बैंक गारंटी ली जाए, उसको ही परेशान किया गया। विडम्बना देखिये। जोशी को परेशान किया गया कि वह दुकानदारों पर पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराएं। उसने स्थानीय लोगों का हवाला देते हुए और डीईओ की लापरवाही को प्रमुख मानते हुए ऐसा करने से माना कर दिया। इस पर उसको मुख्यालय से अटैच कर दिया। फिर संबद्धिकरण का मामला उछला तो नैनीताल में जिला प्रवर्तन में भेज दिया। ये मामला दबा रहता। वह तो त्रिपाठी की बदली अल्मोड़ा होने के बाद डीईओ बन कर आए पवन कुमार सिंह ने पैसा दबा के बैठे दुकानदारों पर दबाव बनाया। तब जा के कुछ जेल गए। कुछ दुकान छोड़ भागे। मामला उछला।

गज़ब ये है कि जिस डीईओ त्रिपाठी ने छह करोड़ के करीब राजस्व सरकार के डुबोए, वह आज भी अल्मोड़ा में डीईओ का लुत्फ ले रहा है। आबकारी आयुक्त के स्पष्टीकरण मांगे जाने के बावजूद कोई कार्रवाई उस पर नहीं हुई। इस सबके पीछे सिर्फ एक ही वजह है। वह है महकमे को अपने हिसाब से चला रही लॉबी का सदस्य होना। इस लॉबी का मुखिया वह संयुक्त आयुक्त है, जिसने पिछले साल और इस साल सरकार की अरबों की लुटिया डुबोई। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के दरबार में उसकी पैठ वैसी नहीं है, जैसे पहले के मंत्रियों के यहाँ थी। इसलिए इस बार ये लॉबी दिक्कत में अब जा के दिख रही है। देखा जा रहा है कि मुख्यमंत्री इस लॉबी को ध्वस्त कर महकमे को पटरी पर लाने में किस तरह सफल रह पाती है।

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