The Corner View

चेतन गुरुंग

ये बात शायद 2003 के आ रही सर्दियों की है। नवंबर की जी खुश करने वाली, तन को सहलाने वाली गुलाबी ठंड थी। मुझे देहरादून में सुभाष रोड पर स्थित पुलिस मुख्यालय में पोर्च पर एक बेहद आकर्षक महिला मिलीं। तीखे नैन-नक्श और अपनत्व भरी मुस्कान के साथ। वह कुछ और वरिष्ठ पुलिस अफसरों के साथ खड़ी थीं। बाहर। लंच का वक्त हो चला था। सो आईपीएस अफसर लोग अपनी गाड़ी का इंतजार कर रहे थे। मैं सभी को पहचानता था। सिवाय उस आकर्षक महिला के। उन्होंने मेरी तरफ हाथ बढ़ाया। जैसे काफी पुरानी जान-पहचान हो। जैसे दो दोस्त मिलते हैं। मैंने अचकचाते हुए हाथ मिलाया कि न जाने कौन हैं? आईपीएस अफसर ही होंगी। इसका ख्याल तो आया, लेकिन जल्दी से दिमाग ने काम नहीं किया। खैर मैं कुछ देर बाद वहाँ से चला आया। किसी से पूछने का वक्त भी नहीं मिला कि वह महिला या अफसर कौन हैं?

इस बात को शायद एक महीना भी नहीं हुआ होगा। मैं सचिवालय में था। वरिष्ठ आईएएस अफसर सुरजीत किशोर दास (बाद में मुख्य सचिव और उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष भी रहे। उनकी पत्नी आईएएस विभा पुरी भारत सरकार में सचिव और बिजली मामलों में ओम्बड्समैन यानि लोकायुक्त भी रहीं) के साथ क्रिकेट और एक नामी अस्पताल को सरकार से मिल रही करोड़ों की इमदाद पर चर्चा कर रहा था। शायद बाबा रामदेव की इंसानी हड्डियाँ मिली होने वाली चूरन और उसकी जांच पर भी। दास क्रिकेट और सचिन तेंदुलकर के सबसे बड़े प्रशंसकों और कदरदान में शुमार होते हैं। दोपहर के भोजन के बाद का वक्त था। दास के साथ मैं घंटों बैठ जाता था। उनके पास कई बड़े और अहम महकमे थे तब। गृह महकमे के साथ ही तब वह चिकित्सा शिक्षा, स्वास्थ्य, राजस्व के भी प्रमुख सचिव हुआ करते थे। सो आईपीएस अफसरों का उनके दफ्तर में आते रहना सामान्य सी बात थी। अचानक मुझे अपनी पीठ की तरफ के दरवाजे से आवाज सुनाई दी। कुछ जानी-पहचानी सी। मैं अंदर आ जाऊँ सर? नारी कंठ सुन मैंने भी पलट के देखा। वही महिला थीं। जो पुलिस मुख्यालय में मिली थीं। सलवार सूट में। वह दास से भीतर आने की इजाजत चाह रही थीं।

दास बहुत नफासत पसंद नौकरशाह होते थे। सभी को बहुत सम्मान देना उनके मिजाज में शामिल था। उनको गुस्सा भी आता था, तो बच्चों जैसा। सो मातहत उनसे डरते कम थे। सम्मान अधिक करते थे। दास ने उस महिला को तुरंत बहुत अपनत्व के साथ कहा-अरे, आइये-आइये। वह मेरी साथ की सीट पर बैठीं। मुझसे फिर हेलो-हाय हुई। शेक हैंड हुआ। दास ने हम दोनों का आपस में औपचारिक परिचय कराया। मुझसे मिलवाते हुए उन्होंने कहा-ये कंचन चौधरी भट्टाचार्य हैं। आईजीपी। भारत सरकार से प्रतिनियुक्ति से लौटी हैं। उत्तराखंड काडर आवंटित हुआ है। पहले उत्तर प्रदेश काडर में थीं। उन्होंने आगे बताया-हम दोनों एक ही बैच (वर्ष 1973) के हैं। कंचन को मेरे बारे में बताया। उन्होंने बड़प्पन दिखाया। बोलीं-आपको मैं पहचानती हूँ। फिर हम दोनों बाद के सालों में पुलिस मुख्यालय में उनके दफ्तर में खूब मिले। उनके सहस्त्रधारा रोड स्थित निजी आवास पर भी।

जब वह देश की पहली महिला पुलिस महानिदेशक हुईं तो इसके पीछे दास की बहुत अहम भूमिका थी। पुलिस दारोगा भर्ती घोटाले की आंच ने पहले तो शानदार कैरियर वाले आईजीपी राकेश मित्तल, जो कंचन से वरिष्ठ थे, की बलि ली। वह मुअत्तल कर दिए गए थे। फिर डीजीपी प्रेमदत्त रतूड़ी एक रात हटा दिए गए। दोनों के खिलाफ सीबीआई जांच बैठ चुकी थी। नया डीजीपी बनाया जाना था। दास अपने साथ कंचन को ले के मुख्यमंत्री के पास पहुंचे। उनसे मिलवाया। ये होंगी अगली पुलिस प्रमुख। वह दौर था नौकरशाहों की इज्जत-प्रतिष्ठा का। मुख्यमंत्री एनडी तिवाड़ी थे। उन्होंने कंचन को पुलिस की कमान सौंप दी। देश भर की मीडिया में फिर कई दिनों तक कंचन छाई रहीं। देश की पहली महिला डीजीपी के तौर पर। मीडिया आकर्षण और सबसे बड़ी कुर्सी के बावजूद कंचन के व्यवहार में कभी भी कोई परिवर्तन नहीं दिखा। वह सदैव पूर्ववत ही सबसे मिलती रहीं। प्यार से स्नेह से वह लोगों की फरियाद सुनती थीं। माँ-बहन-अभिभावक-मित्र के अंदाज में लोगों से मिलती थीं। यकीन दिलाती थीं। मदद की। फिर उनकी समस्याओं पर कार्रवाई के लिए अफसरों को बोलती थीं। हुकुम वाला अंदाज कम ही होता था। कुछ आईपीएस अफसरों को ले कर वह काफी परेशान रहती थीं। मुझसे ये बातें शेयर करती भी थीं।

मेरे साथ उनके रिश्ते कैसे थे? कई बार मैं घर पर नहीं होता था। एक दिन माँ ने बताया कि आज तो `उड़ान’ सीरियल वाली की बहन आई थी। मैं चौंक गया। मैंने पूछा कौन आई थीं? उन्होंने बताया कि पुलिस की गाड़ी के साथ आई थीं। बता रही थीं कि चेतन से बात होती रहती है। आज इधर से गुजर रही थीं तो मिलने आ गईं। मेरी गैर हाजिरी में वह माँ के साथ खूब बातें करती रहीं। अपने और बहन कविता चौधरी के बारे में बताया। उड़ान मेरी माँ का बहुत ही पसंदीदा सीरियल हुआ करता था। कंचन से मिल के वह बहुत खुश थीं। बहुत उत्साह के साथ बताया कि वह फर्श पर ही मेरे साथ बैठ कर बात करती रही। उड़ान सीरियल में कविता ने उसकी ही भूमिका को निभाया था। वह उस दिन रिटायर हुईं, जिस दिन मेरा जन्मदिन था। रिटायर होने के बाद वह कभी देहरादून तो कभी कोलकाता, जहां उनके पति बड़ी कंपनी में उच्च पद पर थे, जाती रहती थीं। फिर लोकसभा चुनाव में हरिद्वार सीट से लड़ीं। जीत नहीं पाईं।

एक दिन एक छोटी सी विदेशी ड्रमर बच्ची के बारे में मैंने फेसबुक पर जिज्ञासा जताई। उन्होंने कमेन्ट लिखा और बताया कि उसका नाम नूर अमीरा स्याहिरा है। सबसे तेज ड्रमर है। काफी समय से उनसे न फोन पर न ही फेसबुक पर बात नहीं हुई थी। फिर एक दिन एक आईपीएस मित्र का व्हाट्सएप मैसेज मिला। कंचन चौधरी भट्टाचार्य नहीं रही बोल के। उनको याद किया जाएगा कि वर्दी के भीतर मानवता के भाव जगाने की कोशिश उन्होंने बेहतरीन की। बाद में ये गुण ज्योति स्वरूप पांडे में दिखे, जो सुभाष जोशी के बाद डीजीपी बने।

जाना डॉ.अश्विनी डोभाल का

मैं आम तौर पर डाक्टरों के पास कम ही गया हूँ। बीमारी ऐसी रही नहीं और छोटे-मोटे रोग या चोट खुद ही ठीक हो जाते हैं। कुछ वक्त के बाद। ईश्वर ने शरीर ऐसा ही दिया है। इसलिए गिने-चुने डॉक्टर ही करीबी दोस्त हैं। अश्विनी डोभाल उनमें शुमार थे। कई सालों से हम एक-दूसरे के प्रशंसक भी रहे। वह वाकई बेहद काबिल डेन्टिस्ट थे। मुख्यमंत्री और कई नौकरशाह-बड़े लोग उनके क्लाइंट थे। सादगी से रहना और बर्ताव करना उनकी खासियत थी। देहरादून में सचिवालय के सामने और टैगोर विला में चकराता रोड पर उनकी क्लीनिक थी। पैसों के मामले में वह बहुत सख्त नहीं थे। फीस वाजिब लेते थे। चेहरे पर हमेशा उनके मुस्कुराहट उनका ट्रेडमार्क थी।

ये विडम्बना है कि दो करीबी लोग कंचन चौधरी भट्टाचार्य और डॉ. डोभाल एक-दो दिन के अंतराल में दुनिया छोड़ गए। डॉ. अश्विनी के बेहद करीबी और काँग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना ने रोते हुए बताया-कुछ दिन पहले उनको डेंगू हो गया था। फिर ब्रेन हैमरेज। फिर अचानक सभी को छोड़ के चले गए। मुझे आज तक समझ नहीं आ रहा है कि दुनिया में आखिर अच्छे लोगों की जिंदगी इतनी कम क्यों रहती है। कंचन 72 और अश्विनी सिर्फ 54 साल के थे। दोनों को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि। 

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