किसी ने टाइपिंग टेस्ट नहीं दिया तो किसी का अनुभव प्रमाणपत्र फर्जी

यूपीआरएनएन ने कहा-कोई प्रमाणपत्र जारी नहीं किया

प्रो.अरविंद की बर्खास्तगी पत्र में भी नया आरोप कुछ नहीं

पहले ही खारिज कर चुका है हाई कोर्ट

छात्र भी पानी की मांग को ले कर जंग में कूदे

चेतन गुरुंग

टीएचडीसी-आईएचईटी टिहरी में हुई चार में से दो कार्मिकों की भर्तियों को ले कर कॉलेज प्रबंधन फंदे में फँसता दिख रहा है। साथ ही एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अरविंद कुमार सिंह को बर्खास्त करने के फैसले में भी उस पर संकट आना तय नजर आ रहा है। तकनीकी सहायक सोहनलाल पेटवाल और निदेशक के वैयक्तिक सहायक जितेंद्र सिंह पुंडीर उन चार लोगों में शुमार हैं, जिनका चयन तूफानी रफ्तार से हुआ था। देहरादून में डबल्यूआईटी में उनका रविवार के दिन चयन किया गया था। कॉलेज प्रबंधन आरटीआई में आज तक ये बता नहीं रहा कि इंटरव्यू बोर्ड और चयन समिति के सदस्य आखिर थे कौन?

इन चारों का चयन 9 जून को इसी साल हुआ था। उस वक्त कॉलेज के निदेशक गीतम सिंह तोमर थे। तोमर विवादित रहे। उनकी डिग्री और उनकी कार्यशैली को ले कर जम कर अंगुलियाँ उठी थीं। शासन के करीबी होने के बावजूद मुख्यमंत्री के निर्देश पर आखिर तोमर की कुर्सी से छुट्टी कर दी गई थी। जाते-जाते वह ये भर्तियाँ कर गए थे। खास बात ये रही कि चारों की चयन प्रक्रिया एक दिन में ही पूरी कर दी गई थी। इस रफ्तार के कारण बहुत बवाल चल रहा है।

पुंडीर का चयन इसलिए घेरे में है कि सूत्रों के मुताबिक पीए पद पर भर्ती के बावजूद उसका कोई टाइपिंग टेस्ट लिया ही नहीं गया। इस पद पर न्यूनतम योग्यता हिन्दी और अँग्रेजी में टाइपिंग अच्छी गति के साथ आना अनिवार्य था। साथ ही उसकी उम्र 44 साल है, जो राज्य सरकार के मानकों से अधिक है। पेटवाल ने आवेदन पत्र में यूपीआरएनएन में कार्य करने के 10 साल का अनुभव प्रमाणपत्र लगाया था।

आरटीआई में निगम ने बताया कि इस नाम का कोई कार्मिक उनके यहाँ कभी रहा ही नहीं। इन फर्जीवाड़ों के खुलासों के बाद अब सीधे यूटीयू और कॉलेज प्रबंधन के साथ ही सरकार और चयन तथा स्क्रीनिंग समिति पर भी अंगुली उठनी स्वाभाविक है। कॉलेज प्रबंधन से आरटीआई में ये भी पूछा गया है कि कार्मिकों की चयन समिति में कौन-कौन लोग शामिल थे? इसका भी जवाब टाला जा रहा है। इस पर ज्यादा हैरानी और शक जताया जा रहा है।

इन दोनों के साथ ही हितेन्द्र बिष्ट और हरेन्द्र मेहरा का भी चयन किया गया था। कॉलेज के नॉन टीचिंग स्टाफ का आंदोलन इस मुद्दे पर भी चल रहा है। वे इन भर्तियों की जांच विजिलेन्स से कराने और इसको तत्काल निरस्त करने की मांग खुद को हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक स्थायी करने की मांग के साथ कर रहे हैं। उन्होंने आज पीएम नरेंद्र मोदी और मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक को भी चिट्ठी इस संबंध में भेजी’। साथ ही पूर्व मंत्री मोहन सिंह रावत गाँववासी से भी आंदोलन के संबंध में बात कर सहयोग मांगा।

उनकी मांग है कि प्रभारी निदेशक केकेएस मेर को जल्दी हटाया जाए। उनके कारण कॉलेज तबाही की ओर है। मेर टिहरी आने को राजी नहीं है। यहाँ के स्टाफ को अपने स्थाई नियुक्ति वाले गोपेश्वर कॉलेज में फ़ाइल ले के बुलाया जा रहा है। आज ही कॉलेज के छात्रों ने भी हॉस्टल में पानी न आने के कारण धरना दिया। इस बीच मेर के दस्तखत से 30 अगस्त को जारी बर्खास्तगी का पत्र डॉ. सिंह को मेल से आज मिल गया।

पत्र में जो भी बातें लिखी गई हैं, वे सब बहुत पुरानी हैं। इन सभी को हाई कोर्ट ने बहुत पहले खारिज कर दिया था। इसके बाद ही डॉ. सिंह को बहाल करने का फरमान सुनाया था। कॉलेज के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स को सिर्फ उनके रुके हुए वेतन पर फैसला करना था। उसने नौकरी ही खा डाली। खास बात ये है कि बर्खास्तगी का बिन्दु एजेंडा में नहीं था। बीओजी के अध्यक्ष डॉ. डीपी कोठारी ने भी इसको स्वीकार किया। उन्होंने डॉ. सिंह ने अब इस बारे में हाई कोर्ट का रुख करने का फैसला किया है।

उनका कहना है कि बोर्ड ऑफ गवर्नर्स को सिर्फ वेतन के बारे में फैसला करना था, ये मेर ने बताया ही नहीं। ऐसा हुआ है तो ये गलत है। डॉ. अरविंद को हाई कोर्ट जा के स्टे आदेश ले आना चाहिए। उन्होंने नौकरी लेने का प्रस्ताव बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बताया। डॉ. सिंह के मुताबिक उनके मामले में कॉलेज प्रबंधन ने जो किया वह हाई कोर्ट की अवमानना है। वह इस मामले में फिर हाई कोर्ट जा रहे हैं।

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