Home उत्तराखंड शराब के अफसरों पर ये मेहरबानियाँ क्यों त्रिवेन्द्र जी?

शराब के अफसरों पर ये मेहरबानियाँ क्यों त्रिवेन्द्र जी?

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संयुक्त आयुक्त और देहरादून-अल्मोड़ा के डीईओ पर क्यों कुर्बान सरकार?

दागियों ने आखिर कौन सी जड़ी-बूटी सरकार को सुँघाई है?

राजधानी में चार महीने बाद भी 10 करोड़ का राजस्व छोड़ा हुआ है

कमाल है..न बैंक गारंटी, न प्रतिभूति न ही लाइसेन्स फीस ली

चेतन गुरुंग

शराब महकमे का आलम गज़ब का है। चाहे जितना लूट सके लूट लो। सरकारी खजाने को। कलेक्टर से ले के मुख्यमंत्री के दरबार तक गज़ब की खामोशी छाई रहती है। गाल भर बजा के रह जा रही सरकार। क्या सरकार को नहीं पता कि शराब महकमे में कैसे और कितने बड़े स्तर पर करोड़ों-अरबों के घोटाले हो रहे हैं। दो सालों से तो ये सीधे लाईम लाइट में आ रहे हैं। पिछले साल और इस साल आबकारी नीति पर सरकार को कदम वापिस खींचने पड़े। किसी भी सरकार के लिए रोल बैक बहुत शर्मनाक होता है। ये करना पड़ा जीरो टालरेंस वाली त्रिवेन्द्र सरकार को। सिर्फ और सिर्फ शराब महकमे के चंद उस्ताद किस्म के अफसरों और मास्टर माइंड उस संयुक्त आयुक्त के कारण, जो आज भी सरकार और शासन के आला अफसरों की आँखों का तारा है।

पिछले साल बैंक गारंटी और प्रतिभूति घोटाला व्यापक स्तर पर सामने आने से  सरकार की फजीहत भी उतने ही व्यापक स्तर पर हुई थी। माना गया था कि इसके बाद सरकार इस साल बहुत सतर्क रहेगी। अफसरों की भी हिम्मत नहीं होगी कि फिर से खेल कर सरकारी खजाने को अरबों का चूना लगाया जाए। इस साल भी वही सब खेल फिर हुए। वही अफसरों के नाम फिर आए। एक का भी बाल बांका अभी तक नहीं हुआ है। ये बात जरूर है कि आला अफसर कह रहे हैं कि इस बार मुख्यमंत्री सख्त कार्रवाई करने वाले हैं। ये कार्रवाई कब होगी? क्यों उनको अपने घोटालों और खेल पर लीपा-पोती करने दिया जा रहा है? क्यों उनको इतने मौके दिए जा रहे हैं।

आखिर ये क्यों नहीं पूछ रही सरकार कि देहरादून, अल्मोड़ा, हरिद्वार और उधम सिंह नगर में बैंक गारंटी और प्रतिभूति की क्या दशा रही? क्यों इस साल भी वही खामियाँ सामने आ रही, जो पहले के सालों में आईं। कैसे नैनीताल में डीईओ रहने के दौरान सरकार को छह करोड़ का झटका देने वाले दुर्गेश्वर त्रिपाठी और देहरादून में फिर से बैंक गारंटी और प्रतिभूति घोटाला करने वाले डीईओ मनोज उपाध्याय पर इनायतों की बारिश के साथ ही दो बेहद विवादित इंस्पेक्टर संजय रावत और शुजात हुसैन को मलाईदार सर्किल मिला हुआ है? शुजात की उर्दू अनुवादक से इंस्पेक्टर बन जाने और कैसे आयोग वालों के रहते वह सर्किल में है, की कहानी सरकार पता नहीं करना चाहती?

इस साल फिर देहरादून में प्रतिभूतियाँ जमा नहीं हुई हैं। सरकार और मुख्यमंत्री (जो महकमे के मंत्री भी हैं) के बार-बार कहने पर भी। जब इसका खुलासा मैंने किया तब जा के सरकार में खलबली मची है। सोमवार को आखिरी तारीख थी। ये जमा करने की। जो बची हुई थी। जो छिपा के बचाई गई थी। जाहिर है खेल कर के। सवाल ये है कि आखिर कानून के खिलाफ और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस की नीति को तोड़ कर, सरकार की आँखों में धूल झोंक कर इतना बड़ा घोटाला फिर करने की हिम्मत कैसे हो गई? मेरे पास पूरा आंकड़ा है। देहरादून का। 2 दिन पहले तक 10 करोड़ रुपए की पहली और दूसरी प्रतिभूति सरकार के खजाने में पहुंची नहीं थी। हद से हद दुकान उठने के 30 दिन के भीतर जमा हो जानी चाहिए थी। जो चार महीने बाद भी जमा नहीं हुई थी।

राजस्व वसूली की कलेक्टर को भी परवाह नहीं रही। सरकार ने भी इसका न तो हिसाब लिया न ही कठोर कार्रवाई की चेतावनी ही दी। देहरादून में तो गज़ब का आलम। 45 फीसदी देशी शराब की दुकानों की लाइसेन्स फीस तक जमा नहीं है। ये फीस तो दुकान मिलते ही तत्काल देनी होती है। इतनी मेहरबानियाँ डीईओ और आला अफसरों ने यूं ही कर दी होगी? इतने कानून यूं ही ताक पर रख दिए होंगे? मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत और सरकार का भय है भी कि नहीं? शराब वाले अफसरों को? फिलहाल, सरकार शराब वाले मामले में भी खूब निशाने पर है। चाहे डिस्टलरी या बॉटलिंग प्लांट का मामला हो या फिर दुकानों को कानून तोड़ के देने का। आबकारी नीति में झोल डालने का।

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