देवभूमि के मिजाज को समझना होगा त्रिवेन्द्र जी

चेतन गुरुंग

बीजेपी और काँग्रेस के ज़्यादातर रसूख वाले या फिर अहम कुर्सियों तथा जिम्मेदारियों को देख रहे लोगों को लंबे समय से जानता हूँ। तकरीबन तीन दशकों से। अपने सामने ही उनमें से ज़्यादातर को सियासत में कदम रखते, कमजोर, पिलपिले,शक्तिशाली और फिर तकरीबन विदा होते देखा है। भले पेशेवर तौर पर मैंने उनके साथ कभी शायद ही रियायत बरती। निजी तौर पर मैंने रिश्ते खराब भी नहीं होने देने की कोशिश की। अब इसमें आप क्या कर सकते हैं अगर सामने वाला मुंह फुला के बैठ जाए। अपनी किसी बात को न मानने के नाम पर।

ये मेरा सौभाग्य है कि प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री दिवंगत नित्यानन्द स्वामी से भी मधुर रिश्ते थे और आज के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत से भी अच्छी-पुरानी वाकफियत है। `अमर उजाला’ में पत्रकारिता के दौर में मैंने कई मौकों पर हो सकता है दोनों को नाराज या नाखुश किया। स्वामी को तो खास तौर पर मेरे कारण सियासी तौर पर बहुत नुकसान हुआ। मुझे इस पर सिर्फ दुख होता है, खेद नहीं। दुख इसलिए कि स्वामी मेरी पत्रकारिता के शुरुआती दिनों से ही उन राजनेताओं में थे। वह मुझ पर यकीन भी खूब करते थे। मुख्यमंत्री थे तो कुछ बड़ी खबरें खुद ही दी मुझे।

मुझे याद है। जब होटल द्रोण में 8 नवंबर 2000 की शाम बीजेपी विधायक दल की बैठक में उनको नेता चुना गया था। कुछ घंटे बाद उनको उत्तराखंड की पहले अन्तरिम सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेनी थी। बैठक समाप्त हुई। लॉबी में उन्होंने मुझसे कहा कि गुरुंग साहब मैं अपने घर (पार्क रोड पर छोटा सा) जा रहा हूँ। क्या आप वहाँ आ सकते हैं? बात करनी है। मैं उनसे घर पर बंद कमरे में डेढ़ घंटे तक बात और इंटरव्यू करता रहा। इसी दौरान मुझको पता चला कि मंत्रियों के नाम फ़ाइनल हो चुके हैं। मेरे सामने ही उनको अटल बिहारी वाजपाई, मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण आडवाणी समेत कई दिग्गज बीजेपी नेताओं की ओर से बधाई कॉल आईं। वह मैदानी मूल के बहाने पार्टी में ही अंतर्विरोध के शिकार हुए। रही-सही कसर उनके मुझे दिए इंटरव्यू ने पूरी कर दी थी।

इसके छपने के अगले दिन ही उनको कुर्सी से हटा दिया गया था। फिर भगत सिंह कोश्यारी (अब महाराष्ट्र के राज्यपाल) ने उनकी जगह ली थी। कोश्यारी कब किसको क्या बोल दें और कब किसी भी बड़े नेता की कब उतार दे, कोई नहीं अंदाज लगा सकता। उत्तराखंड में वही इकलौते नेता हैं, जो केंद्रीय नेताओं के आगे कभी नहीं दबे। अलबत्ता, उनमें मेल जोल रखने और सभी को अपनत्व भरे अंदाज से बांधे-जोड़े रखने की अद्भुत कला आज भी है। उनके शपथ ग्रहण समारोह में जैसी भीड़ उत्तराखंड से पहुंची, वह अद्भुत है।

काँग्रेस ने जब साल 2002 में बीजेपी को अप्रत्याशित रूप से विधानसभा चुनाव में मात दी तो हरीश रावत को निराश कर पार्टी हाइकमान ने घिसे हुए दिग्गज नेता एनडी तिवाड़ी की पैराशूट लेंडिंग मुख्यमंत्री के तौर पर करा दी थी। तिवारी का केन्द्रीय मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर इतना व्यापक कार्यकाल और अनुभव था कि किसी भी बड़े से ले के मँझोले मीडिया घराने के मालिकानों को वह सीधे नाम से जानते थे। ये बात अलग थी कि वे इसका जिक्र पत्रकारों से इस कदर मिठास और प्रेम को जताने वाले अंदाज में करते थे कि कभी नहीं लगता था कि दबाव बनाने की कोशिश कर रहे।

तिवाड़ी के राज में सभी खुश थे। भाजपाइयों के जितने उल्टे-सीधे काम उनके कार्यकाल में हुए उतने तो फिर कभी अपनी पार्टी के राज में भी नहीं हुए। ये उनका अंदाज ही था कि बीजेपी मित्र विपक्ष के नाम से बदनाम हो गई थी। नौकरशाह भी तब बहुत शानदार और उत्तर प्रदेश से जबर्दस्त अनुभव ले के आए हुए थे। मजबूत मुख्यमंत्री और अनुभवी नौकरशाहों की ऐसी जुगलबंदी प्रदेश ने फिर कभी नहीं देखी। बीसी खंडूड़ी जब सियासत में आए ही थे और सांसद बनने के बाद देहरादून पहली बार आए तो पीडबल्यूडी गेस्ट हाउस, जो धारा पुलिस चौकी के सामने था, जहां आज शॉपिंग कॉम्प्लेक्स है, में मैंने उनका पहला इंटरव्यू किया था।

दिल के साफ लेकिन कान के कच्चे थे। उनकी प्रतिष्ठा समय के पाबंद और कड़क मुख्यमंत्री की थी। सियासत में होने के बावजूद वह सियासत अच्छे से नहीं समझते थे। एक बार मुझे याद है। लेफ्टिनेंट जनरल (वेट) तेजपाल सिंह रावत उनसे नाराज हो गए थे। रावत ने ही खंडूड़ी के लिए विधायक की सीट खाली की थी। काँग्रेस छोड़ के बीजेपी में आए थे। फिर उपचुनाव जीत के पौड़ी से सांसद थे। खंडूड़ी से मिलने का वक्त मांग रहे थे। मिल नहीं रहा था। अब ऐसे विरले मुख्यमंत्री कहाँ मिलेंगे जो सांसद, सेना के बड़े पूर्व अफसर को, जिन्होंने विधायकी और पार्टी तक उनके लिए छोड़ी हो, को मिलने तक का वक्त न दें। फिर भी खंडूड़ी पर ये आरोप नहीं लगा सकते कि उनसे हर तबका नाखुश रहा। बल्कि हटने के बाद जब वह दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो एकदम नए अवतार में थे।

डॉ.रमेश पोखरियाल निशंक मुख्यमंत्री की कुर्सी से खंडूड़ी को बीच में ही हटा दिए जाने के बाद उनकी जगह बैठे तो उन्होंने अपनी छवि ऐसे मुख्यमंत्री की बनानी पसंद की, जो लोगों के लिए सुलभ हों। निशंक काम कराने की कोशिश भी करते थे। लोगों के कहने पर अफसरों को फोन कर भी देते थे। पत्रकारों में छोटे-बड़े का भेद तो नहीं करते थे, लेकिन अगर प्रमुख मीडिया हाउस से जुड़े हैं तो वह खुद ही फोन कर के हालचाल पूछते रहते थे। घर भी पहुँच जाया करते थे। त्रिवेन्द्र सिंह रावत से मेरी पहली मुलाक़ात 1993 या 94 में हुई थी। तब वह शायद पार्टी के गढ़वाल के महामंत्री (संगठन) थे। फिर मुलाकातें होती रहीं। किसी बात की अधिक परवाह करने वाले वह कभी नहीं रहे।

उत्तराखंड बना तो कृषि मंत्री बने। बदलाव फिर भी नहीं आया। फिर इस सरकार में मुख्यमंत्री बने तो भी जस के तस ही हैं। वे न तो खंडूड़ी की तरह खौफ पैदा कर रहे, न ही निशंक की तरह आत्मीयता दिखाना पसंद करते हैं। न ही किसी के लिए तत्काल फोन ही किसी अफसर को कर डालना उनकी फितरत है। यही वह कारण है, जो आज पार्टी में कुछ झंडाबरदार उनसे खुश नहीं हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्थानीय अफसरान भी उनसे खुश नहीं दिखते हैं। त्रिवेन्द्र संघ के दिग्गज कृष्ण गोपाल की गुड बुक्स में हैं। मोदी-शाह के साथ ही। सो उनका कोई बाल बांका नहीं कर सकता। ये वह भी जानते हैं और उनकी पार्टी में मौजूद खार खाए बैठे लोग।

त्रिवेन्द्र को आगे भी लंबी पारी बतौर मुख्यमंत्री खेलनी है। समीकरण उनके हक में हैं ही। सो उनको निशंक न सही खंडूड़ी तो बनना ही होगा। खंडूड़ी काम भले न कर पाए उतना, जितनी उम्मीद लोग लगाए बैठे थे, लेकिन आश्वासन और फोन के सहारे दो कार्यकाल मुख्यमंत्री का हासिल करने में सफल रहे। केंद्रीय मंत्री भी रहे उससे पहले। वह कोटद्वार विधानसभा चुनाव में हार गए। बीजेपी सरकार से बाहर हो गई तो सिर्फ इसलिए कि उनके पास सियासी सलाहकार अच्छे-काबिल और दिलेर नहीं थे। जो सच बोल सके। त्रिवेन्द्र इस हकीकत को जरूर जानते होंगे। बस वे कब प्रदेश के मिजाज को समझते हैं,उस पर अमल करते हैं, ये देखना होगा।

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