प्रदूषण मुक्ति या सरकार का वसूली अभियान!

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जांच केन्द्रों से रजिस्ट्रेशन और हर सर्टिफिकेट पर मोटा हिस्सा

बिना तैयारी के एमवी एक्ट लागू होने से भगदड़ का आलम

सर्टिफिकेट लेने के लिए सुबह से रात तक गाड़ियों की कतार

मर्सिडीज हो चाहे एक्टिवा, सबसे बराबर वसूली

छह महीने में गाड़ी दौड़ें या गैराज में हो, सर्टिफिकेट जरूरी  

चेतन गुरुंग

नया मोटरयान कानून सिर्फ और सिर्फ लोगों के लिए संकट और सरकार के लिए कमाई का बेहतरीन जरिया बन के रह गया है। इस फैसले के लिए सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक को याद कर सकते हैं। ऐसा लगता है ये कानून देश की गिरती अर्थ व्यवस्था को संभालने की नाकाम कोशिश है। भारी-भरकम जुर्मानों से सरकारी खजाने की खस्ता हालत को दुरुस्त करने की दिशा की ओर कदम। अगर देहरादून में ही देखा जाए तो यहाँ प्रदूषण मुक्त सर्टिफिकेट देने के नाम पर ही किस कदर सरकार लूट-मार मचा रही। सरकार न सिर्फ प्रदूषण जांच केंद्र वालों से बल्कि जांच करा रहे लोगों से भी अपना हिस्सा वसूल रही।

ये सवाल जरूर उठाया जाना चाहिए कि सरकार को प्रदूषण जांच केंद्र और अवाम आखिर पैसे किस बात के दें? इसको ऐसे समझें। अगर आपने प्रदूषण जांच केंद्र स्थापित करना है तो इसके लिए पहले फार्म खरीदें। उसकी कीमत चुकाएँ। फिर 25 हजार रुपए रजिस्ट्रेशन फीस के दें। सिक्योरिटी के तौर पर। फिर मशीन खरीदें। जो तकरीबन 3 लाख के करीब की आती है। फिर सर्टिफिकेट जारी करने की फीस दे। चार से आठ हजार रुपए तक। ये सवाल उठना लाजिमी है कि प्रदूषण जांच केंद्र तो सरकार की प्रदूषण मुक्त हवा में सहयोग ही कर रहा है। नहीं तो सरकार खुद क्यों नहीं लगा लेती मशीन? वैसे तो देश का पर्यावरण साफ रखने के कार्य को मुफ्त ही किया जाना चाहिए। सरकार को ही इसमें आगे आना चाहिए।

इसमें भी सरकार वसूली कर रही। प्रदूषण जांच केंद्र लोगों से 70 रुपए ले रहा है। एक वाहन को सर्टिफिकेट देने के एवज में। इसमें से सरकार उससे 20 रुपए ले रही। सरकार ये पैसा उससे क्यों ले रही? जमीन अपनी। मशीन अपनी। श्रम अपना। अभियान सरकार का। काम गैर सरकारी लोग कर रहे। वसूली सरकार कर रही। बिना कुछ किए। जीएसटी अलग ले रही। प्रदूषण जांच का प्रावधान भी गज़ब का है। एक गाड़ी चाहे छह महीने में 40 हजार किमी चले (नेताओं-मंत्रियों की तो खूब चलती है) या फिर 2000 किमी (इनकी तादाद अधिक है)। सर्टिफिकेट दोनों के बराबर अवधि के लिए मान्य।

इसका तर्क सरकार को देना चाहिए कि 40 हजार किमी और दो हजार किमी चलने वाली गाड़ी की प्रदूषण वाली स्थिति एक जैसी कैसे हो सकती है? क्यों न प्रदूषण मुक्त प्रमाणपत्र तय दूरी के आधार पर जारी किया जाना चाहिए? ट्रक-मर्सीडीज़-जगुआर-ऑडी-बीएमडबल्यू-एक्टिवा को फीस के मामले में एक ही श्रेणी में कैसे रख सकते हैं? पहले तो ये प्रदूषण मुक्त पर्यावरण से जुड़ा मामला है। लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए मुफ्त जांच केंद्र होने चाहिए। नहीं तो गाड़ी के हिसाब से शुल्क रखा जाता।

प्रदूषण जांच केन्द्रों की तादाद भी मुट्ठी भर हैं। प्रदेश में गाड़ियों की तादाद 36 लाख के करीब है। उत्तराखंड में 90 प्रदूषण जांच केंद्र हैं। देहरादून में भी गिने-चुने स्थानों (30) पर केंद्र हैं। इसलिए ब्रह्म मुहूर्त से ले के रात तक गाड़ियों की लाइन वहाँ लगी हुई है। देहरादून में बिंदाल पुल पर और उसके पीछे गढ़ी-डाकरा कैंट जाने वाली मॉल रोड तक गाड़ियों की प्रदूषण जांच और सर्टिफिकेट हासिल करने के लिए लगी लंबी लाइन को इन दिनों रोज देखा जा सकता है। सरकार कुछ नहीं तो प्रदूषण जांच केंद्र अपना भी खोल देती। लोगों का कीमती वक्त बचता इससे।

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