Home उत्तराखंड देहरादून पुलिस-मैंने तो दिया जीरो

देहरादून पुलिस-मैंने तो दिया जीरो

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आसान से दिखने वाले हिट एंड रन को खोल नहीं पाई

मामला दबाने की कोशिश कर रही

सिडकुल-सहस्त्रधारा रूट पर दिखती रहती है भागी कार

Doon ट्राफेलगर-उप्पल टावर से मिल सकता है सुराग

चेतन गुरुंग

राजधानी पुलिस का ये टेस्ट-ट्रायल भी हो गया। कल दिन-दहाड़े मेरी गाड़ी को तबाह कर एक स्विफ्ट डिजायर भाग जाती है। चंद मिनटों में पुलिस को खबर कर दी जाती है। जिस दिशा में गाड़ी गई। कलर (सिल्वर ग्रे) भी। सब बता दी जाती है। राजपुर थाना SO से ले के DGLO Ashok Kumar तक। परिवहन सचिव शैलेश बगौली ने पता चलते ही RTO को फटाफट ड्यूटी पर लगाया। उनका आभार। 100 नंबर को भी बता दिया जाता है।

पता चला गाड़ी UP-11-9484 सहारनपुर में रजिस्टर्ड थी। 2008 के बाद इसका कुछ नहीं है। किसी रियासत अली के नाम पर है नंबर। खैर अब FIR कराऊंगा। अभी सुबह-सुबह नारी मुक्ति संग्राम के सेनापति नागेंद्र भाई का फोन आया। उनका दफ्तर कैनाल रोड पर ही है। जहां गाड़ी भागी थी। उन्होंने बताया-ये गाड़ी वह आए दिन देखते रहते हैं। कैनाल रोड से जो रास्ता सिडकुल की तरफ जाता है। उधर से आती-जाती है। दून ट्राइफलगर या फिर उप्पल टावर (अब शायद दून रेसिडेंसी या कुछ और नाम) की हो सकती है।

कल दो लड़के उसको चला रहे थे। नागेंद्र ने बताया-उन्होंने किसी महिला को भी चलाते देखा है। कार को। रजिस्ट्रेशन भले UP का है, पर कार वाले लोकल हैं। आसपास कैनाल रोड पर मिस्त्रियों की कतार है। उन्होंने बोला है-आज मिस्त्रियों से भी पता कर के बताता हूँ। पुलिस पर तो रत्ती भर यकीन नहीं मुझे। बहुत खराब अनुभव है। आसपास इतने CCTV हैं। क्या मुश्किल है कार का पता करना। मिस्त्रियों से ही पूछताछ कर लेते।

जिस रफ्तार से गाड़ी आई। प्रत्यक्षदर्शी बता रहे थे, और जैसे लहरा के मेरी कार ठोंकी। उससे साफ था कि ये जान बूझ कर किया गया। या फिर चलाने वाले बेहद नशे में थे। दोनों ही अपराध की श्रेणी में आते कि नहीं? तो हजारों पुलिस जो लोगों को जांच के नाम पर तंग-उत्पीड़न कर रही। कागज दिखाओ। नशा तो नहीं किया बोल के। उनके हाथ ऐसे लोग तो चढ़ नहीं रहे। बस चालान करवा लो उनसे। पुलिस का खजाना भरवा लो।

मामला दबाने में अलग जुटी पुलिस। रात को एक राष्ट्रीय दैनिक के क्राइम रिपोर्टर का फोन आया। भाई साहब मैंने आपकी पोस्ट पढ़ी। आपकी कार के साथ हुआ हादसा पढ़ा। फोटो देखी। राजपुर थाने का प्रभारी तो माना कर रहा। ऐसा कुछ हुआ नहीं। कमाल है। घटना से ही मुकर गया बंदा। रत्ती भर भी डर नहीं थाना स्टेशन ऑफिसर को। कानून और सरकार का। क्या कोई हत्या-डकैती हो जाए तो बिना FIR उसको जुर्म मानने से पुलिस इंकार करेगी? तलाशना-जांच करना-मुलजिम को पकड़ना तो दूर।

FIR भी करा दूँगा आज। कल की घटना के बाद पहले तो फरार गाड़ी वालों को तलाशने में, फिर वर्क शॉप में, फिर ऑफिस और दूसरे कार्यों में रात तक व्यस्त रहा। नए SSP अरुण मोहन जोशी को मैं पहली बार मुख्य सचिव (तब सुरजीत किशोर दास थे) के दफ्तर में मिला था। उनका पूरा बैच आया था। कॉल ऑन के लिए। जोशीला और उत्साही। सख्त भी। बाद में कभी-कभार मुलाक़ात हुई। एकाध बार फोन पर बात। अब वह देहरादून के यातायात सुधार में लगे हैं।

इस फेर में जुर्म के खिलाड़ियों को राहत न दे दे पुलिस। अभी तो यही सोच रहा हूँ। एक आसान से दिखने वाले केस को खोलने में अभी तक कामयाबी तो पाई नहीं। उल्टा नकारने की कोशिश कर रही पुलिस। देखते हैं आगे आज क्या करती है पुलिस? आप बताइये-कितने नंबर देंगे आप उत्तराखंड-देहरादून पुलिस को? इस मिसाल के बाद। मैंने तो शून्य दिया है।

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